इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट. ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा और मनमाना फैसला लेने के आरोप. वोट चोरी के विपक्ष के आरोप. बचाव में चुनाव आयोग के बदले भाजपा का सामने आना. 10 अक्टूबर के प्रदर्शन के दबाने के लिए अभूतपूर्ण सुरक्षा इंतजाम. पुलिस की बर्बरता. इन सबने मिलकर ऐसा माहौल बना दिया कि अब पूरा विपक्ष एक साथ खड़ा हो गया है और दिल्ली की सड़कों पर लोगों का हुजूम है.
पुलिस के भी कड़े इंतजाम हैं, सड़कों पर पुलिस की तैनाती बताती है कि वह इस बार कितना ज्यादा अलर्ट है. कोई गलती नहीं. वो मवाली भी गायब हो गए, जो प्रदर्शनकारियों के साथ मारपीट करते दिखे थे. मोदी सरकार खामोश है. विपक्ष की एकजुटता ने सरकार को बेचैन कर दिया है.
यह सब एक व्यक्ति की वजह से हुआ, उस व्यक्ति का नाम मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार है. वही ज्ञानेश कुमार, जिन्होंने कुछ माह पहले कहा था- हम वोट डालने वाले लोगों व महिलाओं का वीडियो जारी कर उनके सम्मान के साथ समझौता नहीं कर सकते. राहुल गांधी को देश से माफी मांगनी पड़ेगी. अब ज्ञानेश कुमार चुप हैं. देश भर में चुनाव आयोग की आलोचना हो रही है. विपक्ष जो अक्सर टूटा व बिखड़ा हुआ नजर आता था. वह एक साथ खड़ा हो गया है.
चुनाव आयोग को स्वतंत्र संस्था माना जाता है. लेकिन जब उसके मुखिया पर ही एकतरफा फैसले और मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी के आरोप लगें. साथ ही पूरा विपक्ष सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालकर याचिका दायर कर दे, तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति पर नहीं, पूरी व्यवस्था पर खड़ा हो जाता है.
मोदी सरकार के लिए अब यह सिर्फ “विपक्ष का शोर” कहकर टालने वाली बात नहीं रह गई. मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया बदलने के बाद से चुनाव आयोग पर राजनीतिक प्रभाव के आरोप लगातार लग रहे है. अब जब विपक्ष एकजुट होकर सड़क पर उतर आया है और लोग भीड़ के रूप में जुट रहे हैं, तो जवाब देने की जिम्मेदारी सरकार और आयोग दोनों पर है. आरोपों को खारिज करना आसान है, लेकिन सड़कों पर खड़ी भीड़ को नज़रअंदाज करना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है.
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