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महिला दिवस मुबारक! उम्मीद की जाये कि...

  • ‘..तो कोई महिलाओं को नौकरी पर नहीं रखेगा’
  • यही तर्क तो कोई मातृत्व अवकाश पर भी दे सकता है

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श्रीनिवास

महिला दिवस अब एक दिन (आठ मार्च) का प्रतीकात्मक अवसर नहीं रहा. ऐसे आयोजनों का सिलसिला सप्ताह और पखवारे तक जारी रहता है! यह बेशक महिलाओं की जागरूकता और उनकी बढ़ती अहमियत का एक सबूत है. मगर अफसोस कि समाज की स्त्री संबंधी धारणा में बहुत बड़ा बदलाव आ गया है, ऐसा नहीं लगता. विगत 14 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने देशभर में पीरियड्स (मासिक धर्म) के दौरान छुट्टी की पॉलिसी बनाये जाने से सम्बद्ध एक याचिका खारिज कर दी है. इस फैसले पर देश और समाज की बहुत विपरीत प्रतिक्रिया हुई है, ऐसा आभास नहीं हुआ. मीडिया के लिए भी यह एक और खबर बन कर रह गयी. यानी समाज कोर्ट के फैसले से सहमत है!

 


याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी सुर्खियों में रही- (यदि ऐसा कानून बना तो)  'कोई भी महिलाओं को नौकरी पर नहीं रखेगा.' इस तर्क से तो गर्भधारण की उम्र की किसी महिला को भी कोई नौकरी पर नहीं रखना चाहेगा. फिलहाल तमाम राज्यों में प्रसव के पहले और बाद में महिला कर्मचारियों के लिए सवैतनिक मातृत्व अवकाश का प्रावधान लागू है. सबसे पहले वर्ष 1961 में, भारत सरकार ने मातृत्व लाभ अधिनियम पेश किया था, कानून भी बना. 2017 में इसे संशोधित कर, दो बच्चों के लिए प्रसूति सुविधा 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दी गई और दो से ज्यादा बच्चे के लिए 12 सप्ताह की गयी. 

 


विदेशों में तो पिता को भी पत्नी और नवजात संतान की देखभाल के लिए अवकाश की सुविधा मिल जा रही है. इसके पीछे मान्यता यह है कि संतान के जन्म में दोनों की भूमिका है, तो नवजात शिशु के लालन-पालन में पिता का भी दायित्व है.सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के आलोक में स्वाभाविक तो यही है कि कोई ऐसे जोड़े को ही नौकरी पर न रखे, जिनके बच्चे होने की संभावना हो!यह कोई रहस्य नहीं है कि मासिक धर्म या पीरियड का रिश्ता स्त्री के गर्भधारण की प्रक्रिया से है. हर समाज में (सवर्ण हिंदू समाज में ज्यादा ही) उस दौरान स्त्री के लिए कुछ निषेध भी तय किये गये हैं, हालांकि यह भी समाज में व्याप्त स्त्री विरोधी धारणा से ही जुड़ा हुआ है- युवती/स्त्री को ‘उतने दिनों’ के लिए अशुभ मान लिया गया है, वह रसोई में नहीं जाएगी, खाना नहीं बनायेगी आदि! शुभ या अशुभ- यह तो तय ही कि आम तौर पर अधिकतर महिलाओं के लिए वह समय पीड़ादायक होती है. 

 


उस दौरान सम्बद्ध स्त्री को आराम करने के लिए अवकाश देना उस पर एहसान करना नहीं है, सभ्य समाज का तकाजा है. जैसे आरक्षण एहसान नहीं है.हम मातृत्व का सम्मान करने का दावा तो करते हैं, अपने घरों की गर्भवती स्त्री का खयाल भी रखते हैं, मगर नौकरीपेशा स्त्री को महीने में तीन-चार दिन अवकाश देना अखर जाता है!मातृत्व से जुड़ी स्त्री की इस तात्कालिक ‘विवशता’ का लाभ उठा कर ही तो शायद हमारे (पुरुष) पुरखों ने महिलाओं को घर और बच्चों से बांध कर रख दिया!  मातृत्व का इतना महिममंडन और मातृत्व को ही महिला की अयोग्यता बना देना- यह पुरुष का और पुरुष तंत्र का हथियार है!     

 

गनीमत है कि सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को रिप्रेजेंटेशन पर विचार करने और सभी संबंधित स्टेकहोल्डर्स से सलाह लेने के बाद मेंस्ट्रुअल लीव पर पॉलिसी बनाने की संभावना की जांच करने का निर्देश दिया है. प्रसंगवश- लालू प्रसाद की छवि जैसी भी हो, पर इस प्रसंग में यह याद कर सकते हैं कि उनके ही शासन काल में बिहार में महिलाओं के लिए इस अवकाश का प्रावधान किया गया था. बिहार से टूट कर बने झारखंड में भी यह प्रावधान लागू है. इनके अलावा एक और राज्य ओडिशा में यह प्रावधान किया गया है. आशंका है कि अब बिहार-झारखंड में भी इसे वापस न ले लिया जाए!

 

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