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कट्टर ईमानदार! आपने बहुत निराश किया है श्रीमान

श्रीनिवास

अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया सहित शराब घोटाले के तमाम आरोपियों को निचली अदालत द्वारा बरी कर देने से, पहले से जताया जाता रहा यह संदेह पुख्ता हुआ है कि सीबीआई ने इन लोगों को बदनीयती से, अपने राजनीतिक आकाओं के इशारे पर झूठे केस में फंसाने का प्रयास किया. मगर संबद्ध अदालत ने केजरीवाल, सिसोदिया या किसी को ‘कट्टर ईमानदार’ होने का प्रमाणपत्र नहीं दिया है, जैसा ये प्रचारित कर रहे हैं. 

 

वित्तीय मामलों में ये ईमानदार हैं या नहीं, यह मैं नहीं कह सकता. कम से कम मेरे पास इनको बेईमान मानने का आधार नहीं है. लेकिन ईमानदारी दूसरे तरह की भी होती है- नैतिक, आचरण में ईमानदारी, राजनीतिक ईमानदारी. और ये यह कह कर कि अदालत ने उन्हें 'कट्टर ईमानदार' कहा है, राजनीतिक ईमानदारी का परिचय नहीं दे रहे. 

 

'आप' के सभी शीर्ष नेता अक्सर अरविंद केजरीवाल को देश के 'सबसे लोकप्रिय' और 'सबसे ईमानदार' नेता बताते हैं. यह और कुछ नहीं, चाटुकारिता है. जब तक अदालत दोषी न कहे, हर नागरिक ईमानदार ही होता है. इसका मतलब यह नहीं है कि सभी सचमुच ‘ईमानदार’ हैं कि उन्होंने कभी कोई बेईमानी नहीं की.

 

यह भी ध्यान रहे कि यह निचली अदालत का फैसला है, जिसे ऊपर की अदालत में चुनौती दी जा सकती है. वहां क्या होगा, कौन कह सकता है. वैसे एक अनुमान के अनुसार निचली अदालत के करीब तीस फीसदी फैसले तो पलट ही जाते हैं. हालांकि कहा जाता है कि 'बेंच' और उस बेंच में कौन हैं, इस पर भी फैसला निर्भर करता है. मगर अब तो जमानत मिलने को भी लोग निर्दोष सिद्ध होने के रूप में प्रचारित करते हैं.

 

आप ईमानदार होते तो सबसे पहले देश से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए संघ-भाजपा से मिल कर (जिस जमात को आज खुद सबसे भ्रष्ट और लोकतंत्र विरोधी बता रहे हैं) यूपीए सरकार के खिलाफ आंदोलन करने के पाखंड के लिए माफी मांग लेते. अन्ना हजारे का मुखौटे की तरह इस्तेमाल करने के लिए माफी मांग लेते. कपिल मिश्रा जैसों को विधायक और मंत्री बनाने के लिए माफी मांगते. लोकतंत्र के प्रति अपनी निष्ठा का सबूत तो आपने योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसों को पार्टी से निकाल कर बहुत पहले दे दिया था! आपको इन गलतियों का एहसास भी नहीं है, तो आप क्या खाक ईमानदार हैं!

 

'आप' की दिल्ली सरकार के साथ केंद्र ने जो सौतेला व्यवहार किया, कदम-कदम पर रोड़े अटकाये, उसका हमें एहसास है, लोकशाही पर यकीन करने वालों ने उसका विरोध भी किया. यह भी सही है कि दिल्ली की ‘आप’ सरकार ने कुछ अच्छे काम किये. खास कर सरकारी स्कूलों को बेहतर किया, ‘मोहल्ला क्लीनिक’ के माध्यम से आम आदमी को बेहतर और सस्ती चिकित्सा उपलब्ध करने का प्रयास किया, महिलाओं को निःशुल्क बस यात्रा की सुविधा दी. मगर नरेंद्र मोदी का विकल्प बनने की अति महत्वाकांक्षा और अहंकार के कारण आप भटक गये. 

 

भटकने की शुरुआत आपने 2014 में बनारस से मोदी जी के खिलाफ चुनाव लड़ने से कर दी थी. वहां गंगा में डुबकी भी लगायी. आगे भी खुद को ‘असली’ हिंदू साबित करने का प्रयास करने लगे. पार्टी के कार्यक्रमों में हनुमान चालीसा का पाठ होने लगा! करेंसी पर 'लक्ष्मी' का चित्र छापने की सलाह दी, जिससे देश की अर्थव्यवस्था सुधर सकती थी. मंदिर के पुजारियों को वेतन देने की घोषणा कर दी. 

 

आपको शायद अंदाजा नहीं था कि ऐसे टोटकों से आप मोदी और भाजपा से नहीं जीत सकते! दिल्ली में सीएए के खिलाफ बड़ा आंदोलन चला, आपकी पार्टी ने उससे दूरी बनाये रखी. दिल्ली में प्रायोजित दंगा हुआ, उसमें अधिकतर मुसलिम हताहत हुए और उल्टे निरपराध मुसलमानों पर ही दंगा करने का आरोप लगा दिया गया. मगर दिल्ली में सरकार होते हुए आप तमाशबीन बने रहे. 

 

जाहिर है, आप धर्मनिरपेक्ष होने का ढोंग करते थे. वह भी तब करना पड़ा, जब दिल्ली में आपका मुकाबला सीधे भाजपा से हो गया! कभी आपने भाजपा का इस्तेमाल किया था, जब आप उसके काम के नहीं रहे, तो उसने आपको तबाह करने का मन बना लिया. गनीमत कि उसका यह दांव फिलहाल विफल हो गया है. लेकिन आपको देश की राजनीति में क्या भूमिका लेनी है, सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ रहना है, संविधान और लोकतंत्र को बचाने के लिए साझा संघर्ष के साथ रहना है या पहले विपक्ष की केंद्रीय भूमिका में जगह पक्की करनी है, यह तय कर लीजिए.

 

कट्टर ईमानदार को अदालती प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं पड़ती और जुझारू लोग अदालत से बरी होने पर रोया भी नहीं करते.

 

बेशक आपने एक उम्मीद जगायी थी. समाज व व्यवस्था में सकारात्मक बदलाव की चाह रखने वाले बहुतेरे लोग इसी कारण आपके साथ हो गये. कुछ दिनों बाद ही उनको एहसास हो गया कि वे एक बार फिर ठगे गये. आपने सचमुच बहुत निराश किया है. 

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