कॉकरोच चर्चा में है. सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने बेरोजगारों की तुलना कॉकरोच से करने को लेकर ना अफसोस जताया है और ना ही कुछ कहा है. ऐसे समय में लोगों को यह जानना चाहिए कि इंसान कब कॉकरोच बन जाता है. एक पुस्तक द मेटामॉफोर्सिस साल 1915 में प्रकाशित हुई थी. इसके लेखक फ्रांज काफ्फा थे. पुस्तक मूल रुप से जर्मन भाषा में है, जिसका अनुवाद कई भाषाओं में है. इसकी कहानी में बताया गया है कि कैसे पूंजावीद, कर्म और पहचान के संकट की वजह से एक व्यक्ति कई टांगों वाला कीड़ा बन जाता है. जस्टिस सूर्यकांत ने अगर इस कहानी को पढ़ा होता, तो शायद वह इंसानों की तूलना कॉकरोच से नहीं करते. संक्षेप में पढ़ें इस कहानी को.
अचानक रूपांतरण और पहला संकट
एक सुबह, जब ग्रेगोर सैम्सा अपनी यात्रा वाली नौकरी के थकान भरे जीवन से उठा, तो उसने पाया कि उसका शरीर पूरी तरह बदल चुका है. वह बिस्तर पर पीठ के बल लेटा हुआ था, लेकिन अब उसकी पीठ कठोर, गोल और भूरे रंग के खोल जैसी हो गई थी. उसका पेट कई छोटी-छोटी, पतली लेकिन अस्थिर टांगों से भरा हुआ था, जो लगातार हिल रही थीं. उसका सिर अब छोटा और कई आंखों वाला था. वह अभी भी सोच रहा था कि शायद यह कोई बुरा सपना है और वह फिर सो जाए, लेकिन जल्द ही सच्चाई सामने आ गया.
ग्रेगोर एक ट्रैवलिंग सेल्समैन था. वह कपड़ों के सैंपल लेकर विभिन्न शहरों में जाता था. उसका काम तनावपूर्ण था - लगातार ट्रेन पकड़ना, होटल बदलना, ग्राहकों से झूठ-मूठ की मुस्कान बिखेरना. लेकिन वह इस नौकरी को छोड़ नहीं सकता था. उसके पिता का पुराना व्यवसाय दिवालिया हो चुका था. पूरा परिवार कर्ज में डूबा हुआ था. ग्रेगोर ही अकेला कमाऊ सदस्य था. वह परिवार की जिम्मेदारी को बहुत गंभीरता से लेता था. उसकी मां अस्थमा जैसी बीमारी से पीड़ित थीं, पिता मोटे और आलसी हो गए थे और छोटी बहन ग्रीटे (सत्रह वर्षीय) संगीत सीखना चाहती थी. ग्रेगोर का सपना था कि वह बहन को वियना कंजर्वेटरी में संगीत की पढ़ाई दिलाए.
अब इस नये रूप में वह बिस्तर से उठ नहीं पा रहा था. घड़ी देखकर उसे पता चला कि वह ट्रेन मिस कर चुका है. बाहर परिवार वाले चिंतित होकर दरवाजा खटखटा रहे थे. उसकी आवाज अब अजीब, चीख जैसी और अस्पष्ट हो गई थी. वह दरवाजा खोलने की कोशिश करता, लेकिन उसकी कई टांगें फिसल जातीं. आखिरकार, जब मुख्य क्लर्क (चीफ क्लर्क) खुद घर आ पहुंचा और नौकरी छिन जाने की धमकी देने लगा, तो ग्रेगोर ने किसी तरह दरवाजा खोल दिया.
जैसे ही परिवार और क्लर्क ने उसके विशाल कीड़े वाले शरीर को देखा - भयानक आकार, कई पैर और घसीटती हुई चाल - वे भय और घृणा से चीख उठे. क्लर्क पीछे हटते हुए भाग गया. ग्रेगोर के पिता ने क्रोध में उसे कमरे के अंदर धकेल दिया. ग्रेगोर का सिर दरवाजे के चौखट से घायल हो गया. इस घटना के बाद ग्रेगोर पूरी तरह अपने कमरे में बंद हो गया.
परिवार का बदलता व्यवहार और ग्रेगोर का संघर्ष
शरीर बदलने के बाद ग्रेगोर का जीवन पूरी तरह बदल गया. वह अब केवल अपने कमरे तक सीमित था. शुरू-शुरू में परिवार, खासकर ग्रीटे, उसकी देखभाल करती. ग्रीटे सुबह-शाम उसके लिए खाना रख जाती - दूध, ब्रेड, सब्जियां. लेकिन ग्रेगोर को अब इन चीजों से नफरत होने लगी थी. उसे सड़े हुए फल, पनीर और कचरा पसंद आने लगा. जब ग्रीटे ने देखा, तो उसने खाने का प्रकार बदल दिया.
ग्रेगोर अब दीवारों पर चढ़ने लगा, छत पर उल्टा लटकने लगा. वह अपने पुराने जीवन को याद करता - यात्राओं की थकान, परिवार की जिम्मेदारी. वह सुन सकता था कि परिवार बाहर क्या चर्चा कर रहा है. परिवार अब आर्थिक संकट में था. पिता, जो सालों से काम नहीं कर रहे थे, अब बैंक में नौकरी करने लगे. वे सुबह काली वर्दी पहनकर निकलते. मां सिलाई का काम घर पर करने लगीं. ग्रीटे ने भी दुकान पर नौकरी शुरू कर दी.
धीरे-धीरे परिवार ग्रेगोर से दूर होता गया. वे उसे बोझ मानने लगे. कमरे की सफाई अब मुश्किल हो गई. बदबू फैलने लगी. एक दिन मां और ग्रीटे ने फैसला किया कि फर्नीचर हटा दें ताकि ग्रेगोर को घूमने-फिरने में आसानी हो. लेकिन जब वे फर्नीचर हटाने लगीं, तो ग्रेगोर को लगा कि उसका आखिरी मानवीय कनेक्शन भी छिन रहा है. वह एक तस्वीर (एक फर वाली महिला की, जो उसने मैगजीन से काटकर फ्रेम की थी) को बचाने के लिए उसके ऊपर चढ़ गया. मां इसे देखकर बेहोश हो गईं.
पिता क्रोध में भर गए. उन्होंने सेब फेंकना शुरू कर दिया. एक सेब ग्रेगोर की पीठ में धंस गया. वह घायल हो गया. यह घाव बाद में संक्रमित हो गया और उसके शरीर को कमजोर करने लगा. परिवार अब उसे "यह चीज" या "इसे" कहकर पुकारने लगा. सहानुभूति धीरे-धीरे घृणा और व्यावहारिकता में बदल गई.
ग्रेगोर अभी भी परिवार से प्यार करता था. वह दरवाजे के पीछे छिपकर उनकी बातें सुनता. जब ग्रीटे वायलिन बजाती, तो वह भावुक हो जाता. वह सोचता कि एक दिन बाहर निकलकर उसकी सराहना करेगा. लेकिन वास्तविकता कुछ और थी.
पतन, किराएदार और अंतिम क्षण
समय के साथ परिवार ने तीन किराएदार (lodgers) रख लिए - सख्त, व्यवहारिक और मांग करने वाले आदमी. वे अच्छा खाना मांगते और घर में कब्जा जमाए रखते. ग्रेगोर का कमरा अब कचरे का गोदाम बन गया था. पुराना फर्नीचर, कपड़े, कूड़ा - सब वहां रख दिया गया. ग्रेगोर इस गंदगी में घिसटता रहता. उसका शरीर सूखने लगा, भूख कम हो गई.
एक शाम ग्रीटे वायलिन बजा रही थी. किराएदारों ने उसे सुनने के लिए बुलाया. ग्रेगोर, संगीत की आवाज से आकर्षित होकर, कमरे से बाहर निकल आया. किराएदारों ने उसे देखा और घृणा से चीखते हुए किराया देने से इनकार कर दिया. उन्होंने कहा कि वे इस "घिनौने जानवर" वाले घर में नहीं रहेंगे.
इस घटना के बाद परिवार का धैर्य टूट गया. ग्रीटे, जो पहले सबसे ज्यादा सहानुभूतिशील थी, अब सबसे कठोर हो गई. उसने कहा, "हमें इसे स्वीकार करना होगा कि यह हमारा भाई नहीं है. अगर यह ग्रेगोर होता, तो खुद समझ जाता कि ऐसे परिवार के साथ रहना संभव नहीं. हमें इसे दूर करना चाहिए." परिवार सहमत हो गया.
ग्रेगोर अब पूरी तरह अकेला और उपेक्षित था. खाना बहुत कम मिलता. वह कमजोर होता गया. आखिरकार, एक रात वह अपनी पीड़ा और अपमान को सह नहीं पाया. वह अपने कमरे के कोने में सिमटकर मर गया. उसका शरीर सूखा और हल्का हो चुका था.
सुबह सफाई वाली महिला ने उसका शव देखा. वह चिल्लाई, "वह मर गया!" परिवार राहत की सांस लेते हुए बाहर आया. वे पहली बार कई दिनों बाद पूरे परिवार के रूप में बाहर घूमने गए. सूरज की रोशनी में वे चहलकदमी करते नजर आए. पिता अब मजबूत और सीधे खड़े दिख रहे थे. मां का स्वास्थ्य सुधर रहा था. ग्रीटे युवा, सुंदर और ऊर्जावान लग रही थी. वे ट्राम में सवार होकर शहर घूमे और भविष्य की योजनाएं बनाने लगे - नया बड़ा घर, ग्रीटे की शादी आदि. ग्रेगोर की मौत उनके लिए नई शुरुआत बन गई.
काफ्का ने इस कहानी में कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया कि ग्रेगोर क्यों बदला. यह "absurd" (बेतुका) साहित्य की बुनियाद है. जीवन में कई घटनाएं बिना कारण घटती हैं और हम उन्हें स्वीकार करने को मजबूर होते हैं. ग्रेगोर के शरीर का बदलना आधुनिक मनुष्य की alienation (अलगाव) का प्रतीक है. पूंजीवादी समाज में व्यक्ति की कीमत केवल उसकी उत्पादकता पर निर्भर करती है. जब तक ग्रेगोर कमाता था, वह परिवार का "प्रिय" था. जैसे ही वह बोझ बना, उसे त्याग दिया गया. यह रिश्तों की नाजुकता दिखाता है.
कहानी पूंजीवाद, कर्म और पहचान के संकट पर भी टिप्पणी है. ग्रेगोर का कमरा उसके मन का प्रतीक बन जाता है - शुरू में व्यवस्थित, बाद में कचरे का ढेर. उसकी मृत्यु के बाद परिवार की मुक्ति यह बताती है कि समाज "अनुपयोगी" को कैसे हटा देता है.
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