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मशरूम की खेती से स्थिति सुधरी
जंगली इलाका होने के कारण पहले यहां रोजगार के साधन नहीं थे. लेकिन यहां की महिलाओं ने सभी मिथक को तोड़ते हुए पिछले छह माह से मशरूम की खेती कर रही हैं. 30 महिलाओं का समूह आज खुद को सशक्त बना रही हैं. समाज को यह संदेश देने का काम कर रही हैं कि दूरस्थ दुर्गम जंगली इलाके में भी रोजगार सृजित किया जा सकता है.alt="" width="600" height="340" />
अवतार डेवलपमेंट ने महिलाओं के सपनों को दिए पंख
स्वयंसेवी संस्था अवतार डेवलपमेंट ने महिलाओं के सपने को साकार किया है. संस्था के लोगों ने गांव में जाकर महिलाओं को रोजगार से जोड़ा. ग्रामीण इलाकों में मशरूम के बारे में बहुत कम ही लोग जानते थे. ऐसे में उसके बारे में जानकारी दी. फिर खेती करने के लिए उत्साहित किया गया. आलम यह है कि 30 महिलाएं मशरूम की खेती कर अपना जीवन यापन कर रही हैं. साथ ही अपने परिवार को मदद और बच्चों को अच्छा परवरिश दे रही हैं.पहले दो कमरों से शुरू की खेती
इन महिलाओं ने अपने-अपने घरों के दो कमरों में मशरूम की खेती शुरू की. आदिवासी महिलाएं जिस मशरूम की खेती कर रही हैं, उन्हें ढिंगरी मशरूम या इंग्लिश में ऑस्टर मशरूम कहते हैं. इस मशरूम को अंधेरे कमरे में उगाया जाता है. मशरूम की खेती कर रहीं मार्था टोपनो ने बताया कि वह पिछले छह माह से मशरूम की खेती कर रही हैं. इससे उन्हें काफी फायदा हुआ है. इससे पहले उनके पास आमदनी का कोई और जरिया नहीं था.alt="" width="600" height="340" /> इसे भी पढ़ें :हजारीबाग">https://lagatar.in/hazaribagh-rs-16-lakh-looted-in-mother-hatchery-3-accused-arrested/">हजारीबाग
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200 रुपए प्रति किलो बिक रहा मशरूम
बाजार में इन मशरूम की कीमत 200 प्रति किलो है. मशरूम को तैयार होने में करीब 45-60 दिनों का समय लगता है. उसके बाद मशरूम को तोड़ कर पैक कर दिया जाता है. पैक हुए मशरूम बाजार में बिकने के लिए जाते हैं.इन संस्थाओं से उपलब्ध कराए जाते हैं सामान
दोनोरेशाम की मशरूम उत्पादक रेजिना हेम्ब्रोम ने बताया कि वह इसे बेचने के लिए हजारीबाग शहर, चरही और कुजू बाजार जाती हैं. इन सभी महिलाओं को मशरूम की खेती के बारे में सारी जानकारी, ट्रेनिंग और इसकी खेती में लगने वाले सभी सामग्रियों को हजारीबाग जिले में काम काम करनी वाली संस्था अवतार फाउंडेशन और दिल्ली की संस्था सिडबी से निःशुल्क उपलब्ध करवाया गया है.alt="" width="600" height="340" />
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