Gaurav Prakash Hazaribagh: हजारीबाग झील परिसर में सुबह-शाम छोटे-छोटे स्कूल के बच्चे स्केटिंग की प्रैक्टिस करते नजर आते हैं. इनके पास न तो अभ्यास करने के लिए स्टेडियम है और न ही कोई अन्य सुविधाएं. इनके पास अगर कुछ है, तो वह है जज्बा और हौसला. इन्हीं हौसलों की बदौलत हजारीबाग की सड़कों पर स्केटिंग सीख मैराथन में आर्यन ने स्वर्ण पदक जीता है. ये बच्चे न सिर्फ प्रेरणादायी हैं, बल्कि उनके जज्बे को आज हर कोई सलाम कर रहा है. सड़क पर ही ये बच्चे प्रैक्टिस कर कई मेडल जीत कर लाए हैं. बता दें कि 17 जुलाई को पटना राजभवन रोड पर स्केटिंग मैराथन प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था. इसमें हजारीबाग कोलघटी के आर्यन कुमार ने गोल्ड मेडल जीतकर हजारीबाग ही नहीं, बल्कि पूरे झारखंड का नाम रोशन किया है. इस प्रतियोगिता में पूरे राज्य भर से लगभग डेढ़ सौ प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया था. कई ऐसे खिलाड़ी भी थे, जिन्हें उचित सुविधा भी प्रदान की गई थी. लेकिन उन सभी को मात करते हुए आर्यन ने गोल्ड मेडल जीता. आर्यन कहता है कि उसकी उम्र महज 10 साल है. वह हजारीबाग के ही एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाई करता है. उसे स्केटिंग करने का बहुत शौक था. इसी बीच हजारीबाग के मोहम्मद अकरम ने स्केटिंग क्लब का गठन किया. उसके बाद उसने इसमें एडमिशन लिया. महज डेढ़ साल की प्रैक्टिस में वह 10 किलोमीटर मैराथन में प्रथम स्थान लाया. यही नहीं होटल में काम करनेवाले उसके पिता सुखदेव कुमार कुशवाहा की दिली इच्छा है कि बेटा जिस क्षेत्र में है, उसे उसी क्षेत्र में प्रोत्साहित किया जाए. आने वाले समय में ओलंपिक में जाए. कहा कि इसके लिए तैयारी करा रहे हैं.
सरकारी प्रोत्साहन की कुछ और ही है जमीनी हकीकत
खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने कई मंच से कई बार लोकलुभावन वायदे किए. लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही है. इस क्लब में कई ऐसे खिलाड़ी हैं, जिनके हाथों में आज मेडल है, लेकिन सुविधा के नाम पर कुछ भी नहीं. इनके कोच भी कहते हैं कि उनलोगों ने जनप्रतिनिधि से लेकर पदाधिकारी और मंत्रियों तक फरियाद लगाई कि इन बच्चों के लिए स्टेडियम की व्यवस्था करवा दें, ताकि इन्हें वे लोग अच्छी ट्रेनिंग दे पाएं. सड़क किनारे ट्रेनिंग देना अच्छा नहीं लगता है. छात्र और अभिभावक काफी ऊर्जावान हैं. इस कारण वे अपने बच्चों को प्रतिदिन लेकर आते हैं. दो घंटे की ट्रेनिंग दिलाकर चले जाते हैं. कई ऐसे बच्चे हैं, जिन्होंने मेडल लाया है. उनमें से कई ऐसे हैं, जिनके जूते भी फटे-पुराने होते हैं. उनके माता-पिता के पास इतने पैसे भी नहीं कि स्केटिंग के लिए नए जूते खरीद सकें. ऐसे में गुरु होने के नाते वे लोग कोशिश करते हैं कि ऐसे बच्चे को अपने पॉकेट से कुछ मदद दें. इसका यह परिणाम है कि आज एक दर्जन से अधिक मेडल क्लब के पास है. ये बच्चे राज्य के बाहर जाकर प्रतियोगिता में हिस्सा लेकर कामयाबी के झंडे लहरा रहे हैं. माहौल बनाने में पीछे नहीं हैं कोच, सरकार से मदद की गुहार
क्लब के संस्थापक और कोच मोहम्मद अकरम कहते हैं कि हजारीबाग में स्केटिंग क्लब का गठन तो कर दिया गया, लेकिन बच्चों को सीखाने की कोई व्यवस्था नहीं है. वह हमेशा कोशिश करते हैं कि बच्चों को अच्छा माहौल दें. लेकिन स्टेडियम बनाना उनके वश की बात नहीं है. अगर सरकार स्टेडियम बनाएगी, तो सैकड़ों बच्चे सीख पाएंगे. इनमें वैसे बच्चे भी रहेंगे, जो राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकते हैं. आज उनलोगों को इंतजार है कि सरकार जल्द से जल्द उनके बच्चों के लिए स्टेडियम तैयार करें. कहा भी गया है कि सोना तपता है, तो ही निखरता है. आज बच्चे तप कर निखर रहे हैं. सरकार को चाहिए कि उन्हें सुविधा उपलब्ध कराएं, ताकि निखरे हुए बच्चे अपना और जिले के साथ राज्य की पहचान देश-दुनिया के मानचित्र पर बना सकें.
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