Hazaribagh: सरकार और प्रशासन का दावा है कि अब बाल मजदूरी खत्म हो गई है. लेकिन क्या तस्वीर भी झूठ बोलती है. यह दृश्य है हजारीबाग के पदमा प्रखंड का. यहां देश का भविष्य कहे जानेवाले नौनिहालों का बचपन कचरे के ढेर में गुजर रहा है. पढ़ने-खेलने की उम्र में बच्चे कचरे चुनने में लगे हैं. प्रखंड मुख्यालय में ऐसे एक नहीं, दर्जनों बच्चे हैं. नौनिहाल कचरे के ढेर में ही अपना भविष्य तलाश रहे हैं. इस पर किसी का ध्यान नहीं है.
इस संबंध में कैलाश सत्यार्थी चिल्ड्रंस फाउंडेशन के गोविंद खनाल कहते हैं कि ऐसे बच्चों को बाल अधिकार दिलाने के लिए समाज के सभी लोगों को अपनी जिम्मेवारी निभानी होगी. उन्होंने कहा कि ऐसे केस मिलते हैं, तो जिला मुख्यालय में गठित बाल संरक्षण केंद्र के अधिकारियों को भी संज्ञान लेना चाहिए. जबकि उनका संगठन बखूबी अपनी जिम्मेवारी निभा रहा है. उन्हें जब भी बच्चों के साथ अन्याय की जानकारी मिलती है, संगठन उन्हें न्याय दिलाने के लिए तत्पर रहता है. कहा कि सरकार ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू किया है, ताकि बच्चों को बेहतर तालीम मिल सके. इतना ही नहीं गरीबों के कल्याण और सहायता के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं. जबकि बच्चों को इसका फायदा नहीं मिल पा रहा है. इसलिए अभिभावकों को ही सबसे पहले जागरूक होने की आवश्यकता है. उन्हें बच्चों को श्रम कराने की मानसिकता से उबारना होगा.
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पदमा निवासी केबी महिला कॉलेज हजारीबाग की छात्रा पूजा कुमारी कहती हैं कि कभी-कभी कूड़े के ढेर में कबाड़ चुनने के कारण बच्चे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं. कूड़े में लोहा, शीशा व प्लास्टिक की बोतलें, लकड़ी के सामान व कागज चुनने वाले यह बच्चे सामाजिक व प्रशासनिक उपेक्षा के शिकार हैं. कूड़े-कचरे के बीच जीविकोपार्जन के लिए कबाड़ चुनना इनकी नियती बन गई है. इसके सबसे बड़े जिम्मेवार उनके अभिभावक हैं. बालश्रम अधिनियम के तहत बच्चों को काम कराना या उनसे काम लेना कानून में अपराध की श्रेणी में आता है. ऐसे में जिम्मेवार व्यक्ति को सजा हो सकती है. लेकिन इसके लिए आवाज उठाने की जरूरत है. भले ही पेट की आग बुझाने के लिए यह बच्चे अपना बचपन कूड़े कचरे के ढेर में कबाड़ चुनने में गंवा रहे हैं, लेकिन उनका बचपन बचाने के लिए सभी लोगों को आगे आने की जरूरत है.
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