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हजारीबाग : ग्रामीण क्षेत्र के मरीजों के लिए ग्रामीण डॉक्टर मसीहा

 
  • कोरोना काल में हजारों मरीजों की जान बचाने वाले ग्रामीण डॉक्टरों को समाज में नहीं मिलता सम्मान
  • सुदूर ग्रामीण क्षेत्र के हजारों मरीज ग्रामीण डॉक्टरों के भरोसे
Pramod Upadhyay Hazaribagh : कोरोना काल में ग्रामीण चिकित्सकों (झोला छाप डॉक्टर) ने हजारों लागों की जान बचाई. जब अस्पतालों में बेड नहीं थे, दवाईयां नहीं मिल रही थी और कोई संक्रमित के करीब नहीं आना चाहता था, उस वक्त हजारों मरीजों के लिए देवदूत बने थे ग्रामीण चिकित्सक. अपने अनुभव से हजारों लोगों की जान बचाई थी. आज उन्हें समाज में सम्मान नहीं मिल रहा, झोला छाप डॉक्टर कहकर पुकारा जाता है. हालांकि सुदूर गांव में रहनेवाले लोगों के लिए यही बड़े डॉक्टर हैं. एक तो घर पर जाकर उनका इलाज करते हैं, उपर से सिर्फ दवा के ही पैसे लेते हैं. ग्रामीण कहते हैं कि साहब हम गरीब लोग हैं, बीमार पड़ने पर गांव में ही घूमने वाले डॉक्टर उनका इलाज करते हैं और ठीक भी कर देते हैं. शहर जाने के लिए न तो उनके पास अपना साधन है और न ही वह डॉक्टरों की मोटी फीस भर सकते हैं. गांव में घूमने वाले डॉक्टर सौ-डेढ़ सौ में उनका इलाज कर देते हैं. शहर के डॉक्टरों के पास डिग्री होती है और इनके पास डिग्री नहीं होती है, मगर इनका अनुभव हमलोगों के काम आता है. बता दें कि कोविड काल में बेहतर काम के लिए चतरा डीसी ने ग्रामीण डॉक्टरों की सराहना की थी और सम्मानित भी किया था.

क्या कहते हैं ग्रामीण

हजारीबाग के ग्रामीण इलाके के लोगों का कहना है कि हमलोगों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि हम शहर के महंगे डॉक्टर से अपना इलाज करवा सकें. इसलिए कभी शहर जाते भी हैं तो सरकारी अस्पताल, मगर वहां नियम कानून ज्यादा होते हैं. दिन के 12 बजे तक ही पर्ची कटती है. इसके बाद डॉक्टर के पास जाते हैं तो लंबी लाइन रहती है. नंबर आते-आते कई बाद डॉक्टर के बैठने का समय खत्म हो जाता है. शहर आने-जाने में तो खर्च होता ही है, कई बार इलाज भी नहीं होता है. ग्रामीणों ने यह भी कहा कि ग्रामीण डॉक्टरों के पास डिग्री तो नहीं होती है, मगर उनके पास अनुभव बहुत होता है. वह मरीज को समय देते हैं, उनकी बीमारी पहले जानते हैं, फिर उसके अनुसार दवाई देते हैं. इसका हमलोगों को लाभ भी मिलता है. कम खर्च में मरीज ठीक हो जाते हैं. इस संबंध में चट्टी बरियातू निवासी आशुतोष कुमार सोनी ने बताया कि सरकार तो पंचायत में भी जगह-जगह पर स्वास्थ्य केंद्र और उप स्वास्थ्य केंद्र बनाई है, मगर स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर नहीं आते. वहां भी कंपाउंडर के भरोसे छोड़ दिया गया है. कभी कभार एक दो कंपाउंड मिलेंगे जो केवल इंजेक्शन देना जानते हैं यहां तक की कई कंपाउंड के पास डिग्री भी नहीं है, फिर भी वह सरकारी संस्थान में काम कर रहे हैं.

क्या कहते हैं ग्रामीण डॉक्टर

इस संबंध में ग्रामीण डॉक्टर बंगाली, राजेश ने बताया कि हम भले डिग्री धारी नहीं हैं पर अनुभव कम नहीं है. हम दवाई देने से पहले 100 बार से ज्यादा बीमारी को समझते हैं फिर इलाज करते हैं. कोविड काल में इसी अनुभव से कई मरीजों की जान बचाई है. इसे भी पढ़ें : हेमंत">https://lagatar.in/hemant-soren-will-not-be-able-to-attend-the-budget-session-court-rejects-the-petition/">हेमंत

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