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हजारीबाग: नहीं चलेगा यू-डैस का खेल, प्राइवेट स्कूलों पर कसेगा नकेल

Pramod Upadhyay Hazaribagh: प्राइवेट स्कूल तो खुल जाते हैं, लेकिन उसमें सरकारी गाइडलाइन के अनुसार मानदंड पूरे नहीं किये जाते हैं. इसका नुकसान विद्यार्थियों को होता है. इसे लेकर शिक्षा विभाग सक्रिय है. रेवड़ियों की तरह बंटनेवाले यू-डैस मामले पर डीइओ उपेंद्र नारायण ने कहा कि जिले में प्राइवेट स्कूल खोलने के लिए झारखंड शिक्षा परियोजना से रेवड़ियों की तरह बंटनेवाले यू-डैस का खेल अब नहीं चलेगा. अहर्ता पूरा नहीं करनेवाले प्राइवेट स्कूलों पर जल्द ही नकेल कसा जाएगा. डीइओ ने कहा कि पहले बिना भौतिक सत्यापन के स्कूल खोलने के लिए यू-डैस दे दिया जाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं है. हाल के दिनों में सरकार ने गाइडलाइन जारी किया है कि बिना मान्यता के स्कूलों को यू-डैस नहीं देना है. मान्यता लेनेवाले स्कूलों को ही यू-डैस साथ में मिलेगा. डीइओ ने कहा कि पहले निर्धारित मानदंड के तहत स्कूलों की जांच होगी कि कितने खरे उतरते हैं. उसके बाद अहर्ता पूरा नहीं करनेवालों स्कूलों पर कार्रवाई होगी. सरकारी विद्यालयों में नामांकन और रजिस्ट्रेशन की भी जांच होगी कि कब-कब नामांकन हुए और कौन-कौन से प्राइवेट स्कूलों के बच्चों का रजिस्ट्रेशन कराया जाता है.

वर्ष 2008 तक 599 विद्यालयों को मिला यू-डैस कोड 

हजारीबाग जिले में वर्ष 2008 तक 599 विद्यालयों को यू-डैस कोड दिया गया है. झारखंड शिक्षा परियोजना से यह आंकड़ा दिया गया. बताया गया कि उसके बाद 63 विद्यालयों को यू-डैस कोड दिया गया. उसके बाद से आवेदन नहीं आए. तीन सीबीएसई स्कूलों के आवेदन आए और फिर 2019 के बाद से कोई आवेदन नहीं लिया गया. चूंकि नियम बदल गए और अब मान्यता के साथ ही यू-डैस कोड देने का प्रावधान हो गया है. बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि वर्ष 2008 के बाद यू-डैस के लिए महज 63 आवेदन आए. अंदाजा लगाया जा सकता है कि आठ वर्षों में 599 विद्यालयों को यू-डैस दिया गया, तो अगले 10 वर्षों में यू-डैस के ग्राफ अचानक क्यों गिर गए. इस पर झारखंड शिक्षा परियोजना की ओर से कोई जवाब नहीं दिया जा रहा. फिर सरकार का गाइडलाइन बदला और 2019 तक ही आवेदन लिए गए. दरअसल यू-डैस देने के क्रम में खोले जानेवाले प्राइवेट स्कूलों का कोई भौतिक सत्यापन नहीं किया गया है. ऐसे में गली-मुहल्लों और चौराहों के आसपास जैसे-तैसे भवन में स्कूल शुरू कर दिए गए. लेकिन अब ऐसा संभव नहीं है. चूंकि मान्यता लेने के साथ ही अब यू-डैस मिलना है, तो अहर्ता के अभाव में स्कूल नहीं खुल रहे हैं.

स्कूल में अग्निशमन यंत्र और पुस्तकालय जरूरी

अब स्कूल खोलने के लिए मान्यता के साथ यू-डैस मिलना है. ऐसे में स्कूल खोलने के लिए अहर्ता पूरा करना जरूरी हो गया. ग्रामीण क्षेत्र के लिए दो एकड़ और शहरी के लिए एक एकड़ भूमि अनिवार्य कर दिया गया है. 24 गुणा 20 फीट के 11 कमरों के अलावा अग्निशमन यंत्र, पुस्तकालय, भौतिकी, रसायन और जीवविज्ञान की अलग-अलग प्रयोगशाला के अलावा कॉमन रूम रहना अनिवार्य है. वहीं ब्वॉयज-गर्ल्स के लिए अलग-अलग शौचालय, बड़ा खेल का मैदान और तड़ित चालक लगाना भी जरूरी है. सभी कमरों में भरपूर रोशनी की व्यवस्था रहनी चाहिए. स्कूल के कमरों में प्रवेश और निकासी के लिए अलग-अलग द्वार रहना चाहिए ताकि किसी प्रकार की अप्रिय घटना हो, तो बच्चे सुरक्षित बाहर निकल सकें. इसे अलावा अन्य कई मानदंड निर्धारित किए गए हैं. इसे भी पढ़ें- मनीष">https://lagatar.in/manish-sisodia-should-get-bharat-ratna-kejriwal/">मनीष

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वहीं स्कूल कैंपस में न तो किताब-कॉपी और यूनिफॉर्म बेचे जाने हैं. स्कूल कैंपस में किसी का रेसिडेंसियल रूम नहीं होगा. अगर महिला वार्डेन है, तो उनका रेसिडेंस हो सकता है. कोर्रा के एक अभिभावक मदन मिश्रा कहते हैं कि शहर में 80% प्राइवेट स्कूल झारखंड अधिविद्य परिषद या सीबीएसई के निर्धारित सभी मानदंड को पूरा नहीं करते हैं. कहीं किराए के मकान में स्कूल चलाया जा रहा है, तो कहीं अपना भवन होने पर भी पर्याप्त कमरे नहीं हैं. कई जगह तो ऐसे प्राइवेट स्कूल हैं, जहां स्कूल के अलावा रेंटर भी रहते हैं. भेड़-बकरियों की तरह बच्चों को स्कूल के कमरे में बैठाकर तालीम दी जा रही है. कई स्कूलों में पांच कमरों में नर्सरी से 10वीं तक की कक्षाएं संचालित की जा रही हैं. खासकर ग्रामीण क्षेत्र के स्कूलों में तो और भी बद से बदतर हालत है. न कोई देखनेवाला और न कोई सुननेवाला. फीस के नाम पर कोई सुनवाई नहीं होती है. सीधा कह दिया जाता है कि पढ़ाना है, तो फीस तो देनी ही होगी. इसे भी पढ़ें- CBI">https://lagatar.in/cbi-hands-over-documents-to-ed-sisodia-will-be-booked-in-money-laundering-case-kejriwal-said-every-morning-starts-the-game-of-cbi-ed/">CBI

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