
श्रीनिवास
विगत छह जनवरी को, एक अच्छी फिल्म देखने का मौका मिला. Others and Us / वो और हम- एक गंभीर, शानदार, सोद्देश्य और प्रभावशाली है. फिल्म देखने का न्योता डॉ करुणा झा-सीबी चौधरी (रांची) ने दिया था. शहर के अनेक सहमना लोग जुटे थे.
आज देश धर्मांधता के जिस दौर में जी रहा है; या कहें, जिस ओर धकेला जा रहा है, फिल्म उसकी रोंगटे खड़े कर देने वाली हकीकत से रूबरू कराती है; और उसका गाँधीवादी निदान- हृदय परिवर्तन- पेश करती है. चाकू-पिस्तौल लहराने वाले एक उग्र हिंदूवादी गिरोह के सदस्यों (एक को छोड़ कर) को एहसास होता है कि अंततः सभी धर्म समान हैं, इस आधार पर किसी को दुश्मन मानना, उनका उत्पीड़न करना सही नहीं है.
यह एक फीचर फिल्म (फिक्शन)- एक सोशियो-पॉलिटिकल साइकोलॉजिकल थ्रिलर ड्रामा है, जिसमें मिस्ट्री और मेटाफिजिक्स के एलिमेंट हैं. यह फिल्म 29 फिल्म फेस्टिवल में चुनी गई है और अब तक 19 अवॉर्ड जीत चुकी है. अभी तक इसे सेंसर बोर्ड में नहीं भेजा गया है; अनुमति मिलने की संभावना भी नहीं है.
कहानी संक्षेप में- ‘धर्म रक्षा’ के काम में लगे एक संगठन ‘एमआरएस’ (महिष/भैंस रक्षा समिति) के चार लोग (गुंडे) एक महिला साइकोलॉजिस्ट के घर में घुसते हैं, और उसे अपने लीडर की इमोशनल प्रॉब्लम ठीक करने के लिए चाकू और पिस्तौल के बल पर बाध्य करते हैं. स्वाभाविक ही वह घबरा जाती है, मगर आखिरकार वह उनसे बात करती है, और एक रास्ता अपनाती है- वह उस लीडर को हिप्नोटाइज़ करने का प्रस्ताव देती है.
आदित्य नाम का लीडर पहले अपने एक साथी सैंकी पर यह प्रयोग करने कहता है. हिप्नोसिस के प्रक्रिया में सैंकी के अतीत का जो सच सामने आता है, उससे उसके अन्य साथी लोग परेशान हो जाते हैं. फिर भी आदित्य उस प्रयोग के लिए राजी हो जाता है. उसकी समस्या यह है कि वह किसी के प्रति वह क्रूर नहीं हो पाता, ‘जो कपड़ों से’ पहचाने जा सकते हैं, जिनको सबक सिखाना जरूरी मानता है, उनका रोना-धोना, आतंकित चेहरा देख कर परेशान हो जाता है. उसे हिप्नोटाइज़ किये जाने पर उसकी पिछली ज़िंदगी की चौंकाने वाली बातें पता चलती हैं, जिससे सब कुछ बदल जाता है.
सैंकी ओबीसी समुदाय का था और वह याद करता है, कहता भी है कि उसके संगठन में भी बार बार जाति की याद दिला कर उसे अपमानित किया जाता रहा है. और अंत में एक रंजी के अलावा बाकी तीन को अपनी गलती का एहसास हो जाता है.और अधिक जानने के लिए फिल्म देखें, जरूर देखें. सभी कलाकारों का अभिनय शानदार, संगीत प्रभावशाली. इस फिल्म को बनाने वालों की टीम के लोग मूलतः थियेटर से जुड़े हैं.
फिल्म की स्क्रीनिंग के समय महिला साइकोलॉजिस्ट का किरदार निभाने वाली फारिया फातमा मौजूद थीं, जिन्होंने फिल्म से जुड़े सवालों का जवाब भी दिया. वह पढ़ाई और पेशे से कंप्यूटर इंजीनियर हैं. बीआईटी (मेसरा) से पढ़ाई की है. थियेटर और कविता लेखन उनका शौक है! संवेदनशील हैं. जाहिर है कि सामाजिक सरोकारों से जुड़ी हैं.
मुझे जो खटका : अंत में जब सबों का हृदय परिवर्तन दिखाया गया, तब उनमें से एक कहता है- हमारे राष्ट्रपिता भी तो सर्वधर्म समभाव की बात कहते थे. इसके बजाय वह हिंदू धर्मग्रंथों से ही ऐसा कोई उद्धरण देता तो शायद अधिक उपयुक्त होता. उस तरह के नफरती जमात में प्रशिक्षित आदमी का अचानक गांधी के प्रति इतना सम्मान व्यक्त करना थोड़ा अटपटा लगा!
फिल्म की शुरुआत में उन ‘धर्म रक्षकों’ या गुंडों का अतिशय हिंसक अंदाज भी थोड़ा गैरजरूरी लगा. चाकू और पिस्तौल तो उनके पास थे ही, लेकिन महिला साइकोलॉजिस्ट की गर्दन पर चाकू रखने के पहले या बजाय वे कुछ और तरीके अपना सकते थे.
बहरहाल, करीब एक घंटे की फिल्म, एक रूम और पांच कलाकार! इतनी इंटेन्स फिल्म देखने का यह पहला अनुभव था. यह फिल्म अधिक से अधिक लोगों को दिखायी जानी चाहिए. फिल्म निर्माण से जुड़ी पूरी टीम को बधाई और शुभकामना!

फिल्म की टीम-
लेखक, निर्माता और निर्देशक- अनिरुद्ध जैन
कलाकार :
फारिया फातमा- रेवा कुमारी (महिला साइकोलॉजिस्ट)
उज्ज्वल वशिष्ठ- आदित्य
शिवेश रंजन- शैंकी
ऋषभ-राजकुमार
जी एस जयंत- रंजी
वंदना वत्सल- कावेरी (रेवा कुमारी की दोस्त)
सिनेमाटोग्राफर- वरुण शर्मा
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