
बैजनाथ मिश्र
भाजपा के नेता, प्रवक्ता अमूमन कहते रहते हैं कि उसके स्टार प्रचारक राहुल गांधी ही हैं. जब कभी ऐसा लगता है कि भाजपा की हालत पतली है, वह हार सकती है तब भये प्रकट कृपाला की तरह राहुल गांधी अपनी करनी-कथनी से कुछ ऐसा कर गुजरते हैं कि भाजपाई मुस्कराने लगते हैं और सियासत नयी अंगड़ाई लेने लगती है. यदि राहुल गांधी अपने कृपालु स्वभाव के निर्वहन में कभी संकोच करने लगते हैं, तो उनकी भक्त मंडली सक्रिय हो जाती है और गाली गरल की ऐसी वर्षा करने लगती है कि भाजपाइयों के तन-मन में उत्साह, उम्मीद की नयी कोंपले फूट पड़ती हैं. 2014 के आम चुनाव से लेकर आज तक घन गर्जन करते हुए राहुल और उनकी मंडली ने जितने वाचिक पत्थर बरसाये हैं, भाजपा ने खास तौर से नरेंद्र मोदी ने उन्हें जोड़ कर अपने लिए सीढ़िया बना ली है.
ताजा प्रकरण संसद परिसर में अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के विरोध में नुक्कड़ नाटक का मंचन या प्रहसन का निरुपण है. कांग्रेस के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार बुद्धिजीवी, चुनाव विश्लेषक और पत्रकार बंगाल चुनाव के बाद से लगातार लिख रहे हैं कि यदि भाजपा के पीछे खड़े हिंदू मतदाता थौक में नहीं टूटे तो विपक्ष के लिए चुनाव जीत पाना कठिन होगा. संकेत-संदेश यह दिया जा रहा है कि वक्त की नजाकत और सियासत की जरूरत समझते हुए विपक्ष को हिंदुत्व या हिंदू प्रतीकों पर तीखा हमला नहीं बोलना चाहिए. लेकिन विपक्ष में एक-दूसरे से आगे निकल जाने की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा सभी सुझावों पर पानी फेर देती है.
नीट पेपर लीक के खिलाफ तिलचट्टों के धरना-प्रदर्शन को खाद-पानी देने में अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी शुरु से लगी थी. जैसे-जैसे इसकी तपिश बढ़ी, विपक्ष के सभी बड़े नेता वहां सियासी तीर्थाटन के लिए पहुंचने लगे. कांग्रेस की ओर से पवन खेड़ा गये जरूर, लेकिन राहुल के नहीं, सोनिया के कहने पर. राहुल को लगा कि जो मुद्दा उन्होंने उठाया, उसे दूसरे हड़प रहे हैं. इसलिए उन्होंने प्रधानमंत्री आवास के सामने अलग दुकान सजा दी जो ढ़ाई-तीन घंटे में उजाड़ ही दी गयी.
अब संसद में लीड लेने की होड़ मची है. एक मौका तो ऐसा भी आया कि जब अखिलेश यादव और केसी वेणुगोपाल के बीच सदन में ही तुर्शी-बतुर्शी हो गयी. स्पीकर ने मामला संभाला और अखिलेश को बोलने का मौका देकर मामले का पटाक्षेप कर किया. लेकिन सपाई संसद परिसर में दान पात्र लेकर पहुंचने लगे. वे अयोध्या के राम मंदिर में चंदा चोरी का मामला प्रमुखता से उठाना चाहते थे. इस मामले में भी कांग्रेस को पिछड़ता देख कांग्रेसी निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने एक स्वांग रच दिया. स्वांग की पटकथा के लेखक पता नहीं कौन थे, लेकिन इसके दिलकश नजारे ने सनातनियों के बीच कोहराम पैदा कर दिया.
नाटक के जरिये राहुल सनातनियों की खिल्ली उड़ाना चाहते चाहते थे या नहीं, लेकिन विरोध का ऐसा भभूका उठ खड़ा हुआ है कि समूचे विपक्ष की छाती पर सांप लोट रहा है. जब एक ही पप्पू भाजपा के लिए अपरिमेय कल्याणकारी कार्य कर सकता था, तब दो पप्पुओं ने ऐसा कमाल कर दिया कि जगह-जगह एफआईआर हो रहे हैं, पुतले फूंके जा रहे हैं, लानतें भेजी जा रही हैं, लेकिन इस खेल के अग्रेसर अखिलेश सीन से गायब हो गये हैं. अगर कोई सपा नेता छाया हुआ है तो वह अखिलेश के अयोध्या नरेश यानी सांसद अवधेश प्रसाद हैं जिन्हें राहुल अपने साथ खींच ले गये थे.
इस नाटक की पटकथा कुछ इस प्रकार है. पप्पू यादव पुजारी बने थे, बाकायदा गेरूआ वस्त्रधारी, त्रिपुंडधारी. शोभा ऐसी कि अवर्णनीय. सामने राघव जी की तस्वीर, बगल में दानपात्र. कुछ भक्त अर्द्ध वृत्ताकार घेरे में, कुछ बिल्कुल बगल में थे. लाल टोपीधारी अयोध्या नरेश बगल में खड़े मंद-मंद मुस्कान बिखेर रहे थे. दानपेटी में चंदे डाले जा रहे थे. राहुल गांधी भी अपनी परंपरागत पोशाक में थे. उन्होंने जूता पहने ही इस कृत्रिम मंदिर में प्रवेश किया और दान पेटी में कुछ डाल दिया. दानपेटी लेकर पप्पू यादव भागने लगे. उन्हें दौड़ाया जाने लगा. बाद में उन्हें गिराकर पीटने का दृश्य भी फिल्माया गया.
इस नाटक पर प्रतिक्रियाओं के बाद ना राहुल, अखिलेश कुछ बोल रहे हैं, न अयोध्या नरेश. अलबत्ता पप्पू यादव कुछ चैनलों पर पहुंचे जरूर, लेकिन उनके अतीत की कुंडली खुलने लगी तो टिके ही नहीं. इस नाटक का संदेश यह गया कि यदि सपा, कांग्रेस की सरकार उत्तर प्रदेश में बनी तो पुजारी, साधु-संन्यासी दौड़ा दौड़ाकर पीटे जायेंगे. अतिरेकी स्वभाव वाले बहुधा ऐसी गलतियां कर बैठते हैं. यहां कोई काल्पनिक दृश्य तो प्रदर्शित करना था नहीं. इसलिए कल्पना या अमूर्त चिंतन की गुंजाइश नहीं थी. यथार्थ के चित्रण से ही भाजपा और संघ परिवार बैक फुट पर चले जाते.
राम मंदिर में चढ़ावे की चोरी हुई है. जांच एजेंसी इसे स्पष्ट कर चुकी है. सुप्रीम कोर्ट भी इस पर नजर टिकाये हुए है. चोरी की यह घटना हृदय विदारक है. लेकिन तथ्य यह भी है कि किसी साधु, संन्यासी, पुजारी या भगवाधारी ने यह धतकर्म नहीं किया है. जो जेल में हैं, उनमें से कोई भी भगवाधारी नहीं है. यदि शक के दायरे में खड़े चंपत राय और अनिल मिश्र जैसे लोगों को भी इंगित करना था तो वे भी भगवाधारी नहीं है. इसलिए पप्पू जो भी कहें, किसी भगवावेशधारी को चोर के रुप में मंचित करना एक उद्देश्यपूर्ण अपराध है. यह अपराध सांसदों ने संसद परिसर में किया है. यह बददिमागी नहीं, बंददिमागी है. इरादतन और शरारतन किये गये इस जुर्म की सजा क्या होगी, यह अदालत तय करेगी. लेकिन इस प्रकरण पर सामाजिक राजनीतिक प्रतिक्रिया किस उबाल बिंदु तक पहुंचेगी, इसकी भनक तो सुनाई दे ही रही है. इसी को कहते हैं विनाश काले विपरीत बुद्धि.
इस समय भाजपा का राहुकाल चल रहा है. वह दबाव में है. शायद किंकर्तव्यविमूढ़ भी है. राहुल ठहरे करूणानिधान. इसलिए उन्होंने चंदा चोरी का मामला सपा से छीनने के लिए भगवा को ही अपमानित करने का प्रपंच रच दिया. इससे भाजपा को संजीवनी मिल गयी है. देश भर के साधु-संत, सनातनी लानत भेजने लगे हैं. राजनीति में टाइमिंग का खास महत्व होता है. इस समय विपक्ष को फाउल नहीं खेलना था. लेकिन जो इसी कला में पारंगत हैं, उनकी आदत छूटती ही नहीं है.
सपा के राम गोपाल यादव से लेकर डिम्पल यादव, धर्मेंद्र यादव और राजीव राय तक सभी कह रहे हैं कि इस भोंड़े प्रदर्शन से उनका कोई लेना-देना नहीं है. सपा तो केवल प्रतीकात्मक दान पेटी के माध्यम से चंदा चोरी का मामला उठा रही थी. यह भी कि जो हुआ है, गलत हुआ है. पप्पू यादव को पुजारी का स्वांग रचकर विरोध प्रदर्शन नहीं करना चाहिए. सपा वाले समझ रहे हैं कि भाजपा इस प्रकरण को चुनावी मुद्दा बनाएगी और बचाव की मुद्रा त्याग कर आक्रामक हो जाएगी. लेकिन राहुल को लीड लेनी थी, उन्होंने ली और अपने सहयोगी दलों की मिट्टी पलीद करने का इंतजाम कर दिया.
कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दल जब तक भगवा को भाजपा का प्रयाय समझने-मानने की भूल करते रहेंगे, ऐसे हादसे होते रहेंगे. एक शंकराचार्य तो सपा को विजयी भव की आशिष देकर बाकायदा भाजपा विरोधी अभियान में लगे हुए हैं. अब वह कह रहे हैं कि संसद परिसर में जो फूहड़ नाटक खेला गया, उससे सनातन समाज आहत है. पप्पू यादव की मुंहजोरी काम नहीं आ रही हैं. उनके आपराधिक पदकों की सूची जारी होने लगी है. राहुल अखिलेश को तो मानो काठ मार गया है. बड़े-बुजुर्ग कह गये हैं, नादान दोस्तों से दानेदार दुश्मन अच्छे होते हैं. लेकिन सियासत की "जवान" पौध हड़बड़ी में है.
भाजपा के हिन्दुत्व कार्ड की मियाद खत्म होने लगी थी. इस घटिया नौटंकी से यह कार्ड फिर चार्ज हो गया है और कम से कम उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक तो यह चलेगा नहीं, दौड़ेगा. सपा की योजना यह थी कि चंदा चोरी के बहाने भाजपा को हिंदुओं के बीच डिस्क्रेडिट किया जा सकेगा. लेकिन पांसा उलटा पड़ गया है. कवि गिरधर ने ठीक ही कहा है कि "बिना विचारे जो करे सो पाछे पछताय, काम बिगारे आपनो जग में होत हंसाय." देखना है कि भगवा के अपमान पर छिड़ा संग्राम कितना तीखा होता है और अपनी चपेट में किसको लेता है. इस प्रकरण का असर यह हुआ है कि सपा ब्राह्मण वोटों की तिजारत के लिए छोटे लोहिया यानी जनेश्वर मिश्र की माला जपने लगी है.