Vinod Kumar
राज्यसभा चुनाव को लेकर तमाम किस्म की अटकलों को आज विराम लग गया और उनके बीच हेमंत सोरेन एक परिपक्व और ईमानदार नेता की छवि लेकर राजनीतिक फलक पर उभरे. राज्य सभा की एक सीट ‘दिशोम’ गुरु शिबू सोरेन के निधन से रिक्त हुआ था और शुरू से सभी के साथ मैं भी कह रहा था कि यह एक सीट तो हेमंत अपने किसी परिजन को ही देंगे, लेकिन उन्होंने मेरी बात को गलत साबित कर दिया और अपनी बात गलत हो जाने के बाद भी मैं खुश हूं. उन्होंने अपनी जीती हुई सीट एक दलित नेता बैद्यनाथ राम को दे दी.
यह महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि कांग्रेस ने दबाव बनाकर एक सीट ली तो, लेकिन दिया एक सवर्ण को, जबकि उनके अधिकांश विधायक दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक वोटों की ही मदद से जीते थे. हेमंत ने गठबंधन धर्म का निर्वहन तो किया, लेकिन साथ ही कांग्रेस को आईना भी दिखाया, उस कांग्रेस को जो आदिवासी दलित कार्ड खेल कर राजनीति में प्रासांगिक बनी हुई है, अगड़े तो उसे वोट देने से रहे. लेकिन जब राज्यसभा का टिकट देने का समय आया तो कांग्रेस को कोई अल्पसंख्यक या दलित नजर नहीं आया.
हेमंत ने न सिर्फ परिवारवाद के संभावित आरोप से खुद को बचा लिया, साथ ही दलित वोटरों को भी यह संदेश दिया कि झारखंड में दलितों का भविष्य आदिवासी राजनीति के साथ रहने में हैं. हेमंत के इस एक फैसले का झारखंड की राजनीति पर दूरगामी असर पड़ेगा. नेता कोई आदर्श सामने रखे तो उसके समर्थक भी नैतिकवान बनते हैं. इस बात की जरा भी संभावना नहीं कि हेमंत के फैसले की अवहेलना करने का साहस उनका कोई विधायक करेगा.
हां, कांग्रेस के लिए जरूर यह चुनौती रहेगी कि वे अपने दलित, अल्पसंख्यक-ईसाई और मुस्लिम-विधायकों को बांधकर रखे और अपने प्रत्याशी प्रणव झा को वोट दिलवाये. साथ ही राजद के विधायकों को भी उन्हें बांध कर रखना होगा. हां, माले के दोनों विधायक गठबंधन धर्म का निर्वहन करेंगे.
वैसे तो महागठबंधन के विधायकों की संख्या 56 है, जो दोनों सीटों को जीतने के लिए पर्याप्त है. लेकिन मैदान में भाजपा समर्थित एक धन्ना सेठ भी रहेगा. एनडीए के पास 24 सीटें हैं. भाजपा जानती है कि जीत का आंकड़ा उनके पास नहीं, इसलिए परिमल नाथवानी को समर्थन दे रही है. माने, चार वोट जुटाने की जिम्मेदारी उन पर.
अब इस बात पर फिर विचार कर लेंगे कि महागठबंधन इस चुनौती का मुकाबला कर सकेंगी या नहीं, आज तो इसी बात पर खुश हो जाईये कि हेमंत ने अपने पिता का योग्य उत्तराधिकारी होने का सबूत दे दिया. बैद्यनाथ राम तो जीतेंगे ही, प्रणव झा जीते या हारें, हेमंत तो जीत चुके हैं.
डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं....
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