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हाईकोर्ट ने कहा: मजिस्ट्रेट को पुलिस रिपोर्ट के आधार पर शुरू किए गए मामले में दोबारा जांच का निर्देश देने की शक्ति नहीं

 
Vineet Abha Upadhyay Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि किसी मजिस्ट्रेट के पास पुलिस रिपोर्ट के आधार पर शुरू किए गए मामले में दोबारा जांच या नए सिरे से जांच करने का निर्देश देने की कोई शक्ति नहीं है. दरअसल रांची एसीबी कोर्ट ने योगेन्द्र प्रसाद के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी किया था. वारंट जारी किए जाने के आदेश को योगेन्द्र प्रसाद ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. उनकी याचिका पर हाईकोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की कोर्ट में सुनवाई हुई. सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि आपराधिक प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 173(8) की भावना जांच जारी रखने की बात करती है. लेकिन यह दोबारा जांच पर रोक लगाती है. याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सौरभ शेखर ने बहस की राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक प्रिया श्रेष्ठ ने बहस की. इस मामले में एसीबी कोर्ट के विशेष न्यायाधीश ने जांच अधिकारी द्वारा दायर साक्ष्य ज्ञापन के साथ एक पत्र में शामिल याचिका के आधार पर याचिकाकर्ता के खिलाफ गिरफ्तारी का गैर-जमानती वारंट जारी किया था. आदेश में यह कहा गया कि उसने सबूतों से छेड़छाड़ की थी या जघन्य अपराध के आरोप में गिरफ्तारी से बच रहा था, जबकि उपाधीक्षक द्वारा पहले ही अंतिम फॉर्म जमा कर दिया गया था. जिसमें उसे दोषमुक्त कर दिया गया था. जिसे विशेष न्यायाधीश ने स्वीकार कर लिया था. हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के वकीलों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि "यह अच्छी तरह से स्थापित है कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता को हल्के तरीके से नहीं छीना जा सकता है और ऐसे आदेश जारी करने के कुछ मानदंड हैं, जिनका पालन नहीं किया जाता है. इसे भी पढ़ें -गांडेय">https://lagatar.in/nishikant-bursts-new-years-bomb-on-the-resignation-of-jharkhands-gandey-mla/">गांडेय

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