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चुनाव के बीच हिंदू-मुसलमान कनेक्शन!

Brijendra Dubey लोकसभा चुनाव की घोषणा होने के बाद से केंद्र की सत्तारूढ़ एनडीए सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुद्दा सेट करने में जुटे हुए हैं, लेकिन उनकी किसी बात पर जनता का कोई खास रिएक्शन देखने को नहीं मिल रहा. ऐसे में भाजपा और आरएसएस अपने आजमाये मुद्दे हिंदू-मुसलमान उतर आये हैं. इसके लिए आनन-फानन में प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद ने दुनिया के 167 देशों में 1950 से 2015 के बीच आए जनसांख्यिकी बदलाव के अध्ययन की रिपोर्ट जारी कर दी है. इस रिपोर्ट में भारत का भी जिक्र है. रिपोर्ट में बताया गया है कि 1951 और 2015 के बीच भारत में हिंदुओं की आबादी 7.82 प्रतिशत घट गई, जबकि इसी अवधि में मुसलमानों की आबादी में 43.15 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. लोकसभा के चुनाव की जारी प्रक्रिया के बीच इस रिपोर्ट के आंकड़े सार्वजनिक होने के बाद जाहिरा तौर पर लोगों के कान खड़े हो गए हैं. विपक्षी इंडिया गठबंधन इसे जान-बूझ कर चुनावी लाभ के लिए भाजपा की चाल के रूप में बता रहा है. क्योंकि इस रिपोर्ट में पेश आंकड़े तोड़-मरोड़ कर पेश किये गये हैं. रिपोर्ट इशारा करती है कि भारत को इस्लामिक देश बनाने की साजिशें रचने में कुछ ताकतें शिद्दत से लगी हुई हैं. इस रिपोर्ट से यह तो समझ में आ रहा है कि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार लोकसभा चुनाव के बचे चार चरणों को इसी हिंदू-मुसलमान की पिच पर लड़ना चाहती है. धार्मिक आधार पर भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव के आंकड़े को लेकर देश की हिंदी पट्टी यानी यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश में सियासी गोलबंदी शुरू हो गयी है. बिहार के पूर्व उप मुख्यमंत्री और राजद नेता तेजस्वी यादव कहते हैं कि जो जनगणना साल 2021-22 में होनी चाहिए थी, वह तो हुई नहीं. लेकिन देश की जनता को भ्रम में डालने और लोगों के बीच नफरत फैलाने के लिए इस तरह के आंकड़े जारी किए गए हैं. इंडिया गठबंधन की घटक विकासशील इंसान पार्टी के नेता मुकेश सहनी ने तो इस पर और भड़काऊ बयान दिया है. सहनी ने कहा कि अगर मुसलमानों की आबादी बढ़ी है और हिंदुओं की घटी है तो पीएम और उनके मंत्री हिंदू आबादी बढ़ाएं. उनके इस बयान का क्या असर होगा, यह तो समय बताएगा, लेकिन इसे अतार्किक ही माना जाना चाहिए. वहीं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव कहते हैं कि यह कुछ नहीं, बल्कि भाजपा की सियासी साजिश है, जिसे देश की समझदार जनता कामयाब नहीं होने देगी. भारत देश विविधताओं का देश है, यहां हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध सभी लोग मिल जुल कर रहते आये हैं और आगे भी एकता के साथ मिल कर रहेंगे. भाजपा की बांटने की राजनीति कभी कामयाब नहीं होगी. उधर, रिपोर्ट कहती है कि सिर्फ बच्चे पैदा करने की होड़ ही मुसलमानों की आबादी बढ़ने की वजह नहीं हो सकती. इसकी एक बड़ी वजह पड़ोसी मुल्कों से बड़े पैमाने पर घुसपैठ है. आश्चर्य यह कि जो लोग कभी इस घुसपैठ पर लाल-पीले होते थे, आज उन्हें ही इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती. पहले जनसांख्यिकी के आंकड़ों पर गौर करें. वर्ष 1951 में भारत में हिंदू आबादी 84.10 प्रतिशत थी और मुस्लिम आबादी 9.80 प्रतिशत थी. 1971 में हिंदू आबादी घट कर 82.73 प्रतिशत रह गई, जबकि मुस्लिम आबादी बढ़ कर 11.21 प्रतिशत हो गई. 2015 में हिंदू घट कर 77.52 प्रतिशत पर आ गए तो मुस्लिम लगातार बढ़ते हुए 14.02 प्रतिशत हो गए. बांग्लादेशी और रोहिंग्या घुसपैठ भारत की जनसांख्यिकी बदलाव का बड़ा कारण इसलिए कहा जा सकता है कि 2022 के अंत तक भारत में घुसपैठ कर भारत पहुंचे लोगों की संख्या तकरीबन पांच करोड़ थी. इनकी बड़ी आबादी ने उत्तर-पूर्व के राज्यों और पश्चिम बंगाल में स्थायी ठिकाना बना लिया है. बांग्लादेश, पाकिस्तान, अफगानिस्तान से भी बड़े पैमाने पर शरणार्थी भारत में बस गए हैं. राजनीतिक नफा-नुकसान को देखते हुए कई पार्टियों ने घुसपैठ और शरणार्थियों पर चुप्पी ही साध ली है. वर्ष 2017 के आंकड़े बताते हैं कि इस देश में पांच करोड़ बांग्लादेशी-रोहिंगिया घुसपैठिए थे. अब तक तो इनकी संख्या दोगुनी हो ही चुकी होगी. धर्म परिवर्तन और लव जिहाद के जरिए भी हिंदुओं की संख्या घटाई जा रही है. इसके लिए विदेशों से पैसे आ रहे हैं. घुसपैठ में बार्डर सिक्योरिटी फोर्स भी कम जिम्मेदार नहीं है. बीएसएफ के घूसखोर कुछ पैसे लेकर लोगों को बार्डर क्रास करा देते हैं. मोदी सरकार अगर सीएए, एनआरसी और यूसीसी की बात कह रही है, तो इसके पीछे उसका मकसद यही है कि भारत में आजादी के पहले से ही बसे मुसलमानों को कोई आंच न आए, बल्कि घुसपैठियों पर नियंत्रण स्थापित किया जा सके. भाजपा का इस बारे में कहना है कि कुछ पार्टियों की मुस्लिम तुष्टीकरण वाली नीतियों का यह नतीजा है. कांग्रेस कहती है कि बेरोजगारी, किसान, महिलाओं की सुरक्षा जैसे मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए यह भाजपा का शिगूफा है.अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर. जैसा कि आप सभी जानते हैं कि देश की जनगणना वर्ष 2011 में हुई थी. केंद्र की मोदी सरकार ने 2021 में जनगणना करवाई ही नहीं. ऐसे में प्रधानमंत्री की सलाहकार परिषद हिंदू-मुसलमानों की आबादी आंकड़े कहां से लाई. क्या यह चुनाव को प्रभावित करने वाली रिपोर्ट नहीं कहा जाना चाहिए. हां, अगर ऐसा है भी तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है? केंद्र में पिछले 10 वर्षों से मोदी की सरकार है. जनसंख्या बढ़ने के पीछे का मुख्य कारण होता है अशिक्षा. अब बताइए, केंद्र की मोदी सरकार ने शिक्षा के प्रचार-प्रसार के लिए क्या किया. बता दें कि देश में सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाला राज्य केरल है, लेकिन वहां मुस्लिमों के बच्चे उत्तर भारत के मुकाबले कम हैं. उत्तर भारत जहां मोदी का डंका बज रहा है, वहां पर आबादी बढ़ने की सबसे बड़ी समस्या है. अब आप सब सोच-समझ कर देखिए कि यह रिपोर्ट ऐन चुनाव के बीच जारी करने के पीछे का मकसद क्या है. उम्मीद है कि देश की समझदार जनता मोदी सरकार के मकसद को एकजुट होकर नाकाम करेगी.  

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