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राजनीति की मार और विकास की धार

Shyam Kishore Choubey मार्च के अंतिम दिन खबर आई कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन एक बड़े सर्वे में देश के अत्यंत ताकतवर व्यक्तियों में 64वें स्थान पर आये हैं. उनको बधाई. झारखंड के किसी राजनेता को यह तमगा पहली बार मिला है. उसके एक दिन पहले खबर मिली कि राज्य ने 2022-23 के बजट 1,01,101 करोड़ में से रिकार्ड 88,716 करोड़ रुपये खर्च कर दिये. वित्त मंत्री डॉ. रामेश्वर उरांव सहित तमाम कैबिनेट को भी बधाई. 22 साल पहले झारखंड का गठन होने पर इसका पहला बजट महज 7,174.12 हजार करोड़ का ही था. यह छलांगें लगाता-लगाता 2023-24 के लिए 1,16,418 करोड़ रुपये तक के बजट प्रस्ताव तक जा पहुंचा. हमारी कल्याणकारी सरकारें साल-दर-साल हजारों-हजार करोड़ रुपये खर्च करती रही हैं. बहुतेरे लोगों के जीवन स्तर में सुधार आया होगा. पता नहीं कितने परिवार बीपीएल से एपीएल हुए. एक बात पता है कि हजारों एपीएल परिवार बीपीएल के नाम राशन उठाते रहे हैं. यह तरक्की का कौन सा मॉडल है, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री और उनसे भी अधिक राजनीति के सिरमौर लोग ही परिभाषित कर सकते हैं. वित्त मंत्री के हवाले से पिछले मार्च में एक और खबर आई थी कि गुजरे 22 वर्षों का ऑडिट कराने पर दस हजार करोड़ का हिसाब नहीं मिला. भाई/बहनों ने खजाने से यह रकम निकाल ली, लेकिन सरकारी बही-खाते में उसके खर्च का हिसाब नहीं है. दो अप्रैल को एक खबर आई, भाजपा ने ‘कांग्रेस फाइल्स’ की पहली किश्त जारी कर आरोप लगाया कि कांग्रेस नेतृत्ववाली सरकारों के दौरान 48 खरब 20 अरब 69 करोड़ के घोटाले हुए. लोकसभा चुनाव की तैयारियों के सिलसिले में शायद ये फाइल्स पेश की जा रही हैं. यह भी बताया जाता कि नौ वर्षों की अपनी अखंड हुकूमत में एनडीए ने इसमें से कितना वसूल लिया या ऐसे कृत्य में संलग्न कितने लोगों को सजा दिलाई तो ज्यादा दिलचस्प होता. इन नौ वर्षों में दिल्ली में कौन-कौन से तमाशे हुए, यह कोई विपक्ष से पूछे, लेकिन 2014-19 के दौरान डबल इंजन की सरकारों के दौर में रांची में बहुत कुछ हुआ था. तीन अप्रैल को डेवलपर संजय तिवारी ने एमडीएम मद के 101 करोड़ के घोटाले में अदालत में सरेंडर किया, वह घोटाला कब हुआ था? तीन अप्रैल को खबर आई कि पार्टी बैठक में भाजपा विधायक दल के गैरमान्यताप्राप्त नेता बाबूलाल मरांडी ने यूपीए के लिए ठगबंधन शब्द इस्तेमाल किया. 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने यूपीए को ‘ठगबंधन’ कहा था. 14 साल बाद 2020 में भाजपा में वापसी के छह-सात महीने पहले लोकसभा चुनाव में बाबूलाल यूपीए के संगी-साथी थे. वे भूल गये शायद कि यह शब्द उन दिनों उनके लिए भी उसी भाजपा ने प्रयुक्त किया था, जिसके अब वे सदस्य हैं. खबरें तो खबरें हैं और राजनीतिक खेमें खबरों का खजाना होते हैं. ये खेमे अपनी एकल आंख नहीं देखते, लेकिन प्रतिद्वन्द्वी का भैंगापन जरूर दिखाते- उछालते हैं. अब स्थिति कुछ अधिक ही विकट हो गई है, यह जनमानस को तो छोड़िए, खुद कई राजनेता निजी बातचीत में स्वीकार करते हैं. कांग्रेसी राहुल गांधी को उनकी बोली-वाणी के लिए सजा हो गई, हालांकि जमानत भी मिल गई. इधर देखिए, रेल मंत्री रह चुके जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने 24 मार्च को ग्वालियर में उवाचा कि महात्मा गांधी महज हाई स्कूल डिप्लोमाधारी थे. उन्होंने कहा, बहुत लोगों को भ्रांति है कि गांधी जी के पास लॉ की डिग्री थी, लेकिन उनके पास कोई डिग्री नहीं थी. ऐसे ही दो अप्रैल को भिवानी के खरक गांव में जनसंवाद कार्यक्रम में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने पुलिस बहाली के मामले में कह डाला कि कुछ लोग कोर्ट गए तो स्टे मिल गया. एक जज के माथे में कुछ गड़बड़ है, उसको ठीक करेंगे. पदासीन राजनेता किसी के लिए कुछ भी कह सकते हैं और जैसा कि खट्टर ने कहा, वे उसका उपाय भी करना जानते हैं. सत्ता में रहते हुए राजनेता और उनके दल खुद को सेवक भले ही कहें, लेकिन हर हाल में चाहते हैं कि उनकी ‘सेवकाई’अनंत काल तक बनी रहे. इसके लिए वे सौ जतन करते हैं, जबकि उनसे क्षीण अंतर पर बैठे प्रतिपक्षी सत्ता पाने के लिए हर टोटका आजमाते हैं. ऐसे जतन और टोटकों में दिन-ब-दिन गिरावट आ रही है, क्योंकि हर समय एक ही जतन और एक ही टोटका असरदार नहीं होता. मिसाल लीजिए झारखंड की. 2014 के लोकसभा चुनावों में आजसू झारखंड को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने पर आमादा थी. रांची से दिल्ली तक उसने माहौल बनाया. वह चुनाव जीत नहीं सकी. दिल्ली का सत्ता प्रतिष्ठान बदल गया. पांच साल बाद चंद्रप्रकाश चौधरी ने चुनाव जीतकर लोकसभा में आजसू की इंट्री दिला दी. वह दिन है और आज का दिन है, आजसू विशेष राज्य का मसला भूल चुकी है. अब वह आठ अक्टूबर तक के कार्यक्रम तय कर नियोजन नीति, जातीय मतगणना, आरक्षण व नौकरी के सवाल पर 13 अप्रैल को सामाजिक न्याय मार्च निकालनेवाली है. झारखंड में भाजपा ने सामाजिक समरसता और सामाजिक न्याय के मुद्दे पर कई कार्यक्रम तय कर 11 अप्रैल को राजधानी रांची में प्रदर्शन और सचिवालय के घेराव का ऐलान कर रखा है. कांग्रेस के राज्य प्रभारी 13 दिनों तक झारखंड में कैम्प कर रहे हैं ताकि राहुल और अदानी प्रकरण में हर जिले में ‘जय भारत सत्याग्रह यात्रा’ को प्रभावी बनाया जा सके. कांग्रेस तो कांग्रेस है, वह बड़ी बातें सोचती है. आंदोलन ही करना है तो देश के लिए करेगी, झारखंड तो अभी ‘हाथ के साथ’है. डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]

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