Lagatar Desk: पिछले कुछ दिनों से देश में एक शब्द तेजी से इस्तेमाल होने लगे हैं. शब्द है- दिमागी नक्सल. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस शब्द का सबसे पहले इस्तेमाल विरोधियों के लिए किया था. इसके बाद उनके समर्थक नेता, कार्यकर्ताओं ने इन शब्दों को प्रचलन में लाया. बाद में इस शब्द को कई लेखकों, टिप्पणीकारों ने भी अपने लेख में अपने-अपने हिसाब से लिखा.

RTI का जवाब
इसी दौरान अशोक उपाध्याय नामक व्यक्ति ने गृह मंत्रालय में आरटीआई (RTI) के तहत अर्जी लगा दी. अशोक उपाध्याय ने गृह मंत्रालय से पूछा कि देश में कितने “दिमागी नक्सल” चिन्हित किए गए हैं. इस अर्जी के जवाब में गृह मंत्रालय ने जवाब दिया है कि देश में कितने लोग “दिमागी नक्सल” हैं, इसका कोई ब्योरा नहीं जुटाया जाता है. मतलब यह कि देश में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो दिमागी रुप से नक्सली हो.
उल्लेखनीय है कि जंतर-मंतर पर आंदोलन के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने अपने एक संबोधन में कहा था कि देश में एक अलग तरह के लोग हैं. उन्होंने विपक्षी लोगों पर निशाना साधते हुए दिमागी नक्सल शब्द कहा. उन्होंने एक और शब्द कहा था- नाराज फूफा.
जिसके बाद विपक्ष की तरफ से पूर्व वित्तमंत्री व गृह मंत्री पी चिदंबरम ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट जारी कर लिखा था- कि हां हम दिमागी नक्सल हैं. हम सरकार से सवाल करते हैं. कांग्रेस ने पीएम के बयान को लोकतंत्र में सवालों को दबाने की कोशिश बताया था. साथ ही कहा था कि आंदोलनजीवी, परजीवी, दिमागी नक्सल, नाराज फूफा जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना मोदी का मोड्स ऑपरेंडी है.
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