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पक्ष-विपक्ष पर किस तरह यकीन किया जाए!

Shyam Kishore Choubey क्या इस परिदृश्य पर कोई आश्चर्य व्यक्त नहीं किया जाना चाहिए कि इतनी ज़बरदस्त एंटी-इंकम्बेंसी के होते हुए भी चुनावी सर्वेक्षणों में भाजपा को 2019 के चुनावों से भी अधिक सीटें प्राप्त होने के दावे प्रधानमंत्री के आत्मविश्वास और उनकी सभाओं में जमा होने वाली जनता के चेहरों पर नज़र नहीं आ रहे हैं! प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में आई कमी को चाहे जिस अज्ञात भय के चलते सर्वेक्षणकर्ता एजेंसियों द्वारा नहीं उजागर किया जा रहा हो, उन्हें इतना तो बताना ही पड़ रहा है कि राहुल गांधी का सफ़ेद बाल होता माथा मोदीजी के कंधों तक तो पहुच ही गया है! हाल ही में प्रकाशित-प्रसारित सीएसडीएस-लोकनीति सर्वे के निष्कर्ष चाहे जितने अविश्वसनीय हों उसमें भी यह तो बताना ही पड़ा है कि प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी अगर 48 प्रतिशत लोगों की पसंद हैं तो राहुल को भी 27 प्रतिशत लोग पीएम पद पर देखना चाहते हैं. ऐसी स्थिति पहले तो कभी नहीं रही! राहुल की पसंद के आंकड़े में अपने-अपने राज्यों में मोदी से ज़्यादा प्रसिद्ध विपक्षी गठबंधन के नेताओं (स्टालिन, ममता, उद्धव, अखिलेश, सोरेन, तेजस्वी, केजरीवाल, आदि) की लोकप्रियता के वे प्रतिशत भी जोड़े जा सकते हैं जो कि सर्वेक्षण में दिखाए गए हैं. ऐसा ही मोदी के मामले में भी किया जा सकता है! सवाल यह है कि लोकप्रियता के मामले में क्या योगी आदित्यनाथ और हिमन्त बिस्व सरमा के अलावा कोई और नाम भाजपा या एनडीए में मिल पाएगा? सवाल नहीं पूछा जा रहा है कि बीजेपी के घोषणापत्र में मोदी सरकार की और तमाम राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय उपलब्धियों के ज़िक्र के बीच कोविड-19 महामारी के दौरान किए गये कार्यों का कोई उल्लेख क्यों नहीं है? जो उल्लेख किया गया है वह बस इतना भर है: वैक्सीन मैत्री के माध्यम से 100 देशों को 30 करोड़ से ज़्यादा कोविड-19 टीके और दवाओं सहित अन्य सहायता प्रदान की. उल्लेख अगर करना भी होता तो क्या किया जा सकता था? क्या इन लोकसभा चुनावों की पूर्व संध्या पर 24 मार्च 2020 के उस क्षण को क्या याद किया जा सकता है जो 130 करोड़ नागरिकों के जीवन में इक्कीस दिनों के लॉकडाउन के अवतार के रूप में प्रकट हुआ था और तब प्रधानमंत्री ने कहा था : ‘जब वे अपने भाई-बहनों की तरफ़ देखते हैं तो महसूस होता है वे सोच रहे होंगे कि ये कैसा प्रधानमंत्री है जिसने हमें इतनी कठिनाइयों में डाल दिया है!’? विकास का रोल मॉडल माने जाने वाले मोदीजी के राज्य गुजरात में कोविड के इलाज के दौरान हुई बदहाली पर एक स्वप्रेरित याचिका को आधार बनाकर गुजरात उच्च न्यायालय ने पहले तो यह टिप्पणी की थी कि राज्य ‘स्वास्थ्य आपातकाल’ की ओर बढ़ रहा है और फिर यह कहा था राज्य की हालत डूबते हुए टाइटैनिक जहाज़ जैसी हो गई है. पूरे देश की हालत भी तब गुजरात जैसी ही थी. कोविड की त्रासदी के बाद हो रहे इस पहले लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री की लोकप्रियता में आई कमी चाहे भौतिक आंकड़ों की बाज़ीगरी के ज़रिए छुपाई जा रही हो, आध्यात्मिक सत्य यह है कि दो साल से कम समय में राहुल गांधी ने जनता के बीच वह प्रसिद्धि हासिल कर ली है जो कन्याकुमारी से कश्मीर और मणिपुर से मुंबई के बीच बसे भारतवर्ष में मोदी पिछले दस सालों में प्राप्त नहीं कर पाए. राहुल के करिश्मे की कल्पना सिर्फ़ सुदूर दक्षिण के तमिलनाडु में बैठे एमके स्टालिन ही कर सकते हैं जिन्होंने मुंबई के शिवाजी पार्क में 17 मार्च को हुई सभा में कहा था : `राहुल भारत की उम्मीद हैं.’ प्रधानमंत्री के व्यक्तित्व के जादुई चमत्कार में नज़र आती कमी अगर चार जून को सीटों की गिनती में किसी भी रूप में प्रकट हो जाती है तो फिर ईमानदारी के साथ उसके पीछे के कारणों की तलाश भी की जाएगी. हो सकता है बहुत सारे कारणों में एक यह भी मिले कि अपने द्वारा लिए गए निर्णयों के विपरीत प्रभावों को वे जनता से तब तक छुपाते रहे जब तक कि विपक्ष के सामूहिक दबाव और अदालती करवाई ने परतें नहीं उधेड़ कर रख दीं! सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक ठहरा दिये गए इलेक्टोरल बांड्स पर पहले चरण के मतदान के सिर्फ़ तीन दिन पहले एक प्रायोजित इंटरव्यू में बचाव की मुद्रा अपनाते हुए प्रधानमंत्री सिर्फ़ इतना भर कह पाते हैं कि : `सोचिए अगर इलेक्टोरल बांड नहीं होता तो किसने कितना चंदा दिया कभी पता नहीं चल पता.’ मोदीजी के तर्क का जवाब भी राहुल गांधी ने दे दिया. प्रधानमंत्री के कहे पर जनता को किस तरह से यक़ीन करना चाहिए? पीएम अपनी जनसभाओं में ऊंची आवाज़ में कहते हैं कि बाबासाहब आम्बेडकर भी आ जाएं तो संविधान नहीं बदलेगा. दूसरी ओर, उनकी ही पार्टी के नेता और उम्मीदवार दबी ज़ुबानों में चुनाव प्रचार में जुटे पार्टी कार्यकर्ताओं को बताते हैं कि दो-तिहाई बहुमत संविधान बदलने के लिए चाहिए! हो सकता है कि उनके दावे और दाव सही बैठ जाएं. जीवंत लोकतंत्रों में मीडिया आमतौर पर संजय की और हुकूमतें धृतराष्ट्र की भूमिकाओं में रहती हैं. चूंकि देश इस समय आरोपित तौर पर इस समय एक अधिनायकवादी लोकतंत्र की प्रसव-पीड़ाओं के दौर से गुज़र रहा है, संजय और हुकूमत के बीच भूमिकाओं की अदल-बदली हो गई है. संजय की भूमिका में सरकार है और धृतराष्ट्र के रोल में मीडिया. कुरुक्षेत्र का अंतिम सत्य इसी आधार पर निर्धारित हुआ था कि लड़ाई की समाप्ति पर किस पक्ष के कितने लोग सुरक्षित (जीवित) बच पाए! 2024 के कुरुक्षेत्र का सत्य भी इसी आधार पर तय होगा कि चुनाव-युद्ध में कितने उम्मीदवार सुरक्षित बच पाए! एक जून (चुनावी विवाह के सातवें फेरे का दिन) तक हर प्रकार की अफ़वाह फैलाने की छूट प्राप्त है. इसमें एक के साथ एक फ्री भी है. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]

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