Abdush Shakur Khan
यह भारतीय राजनीति का शायद सबसे दिलचस्प दृश्य है. जिस आदमी ने अपना पहला बड़ा चुनाव उस नेता के खिलाफ लड़ा जो आगे चलकर देश का प्रधानमंत्री बना, उसी आदमी ने बाद में उन दो नेताओं की सबसे बड़ी रणनीतियों को बार-बार ध्वस्त किया जिन्हें आज भारतीय राजनीति का सबसे शक्तिशाली जोड़ा माना जाता है. और अब वही डीके शिवकुमार कर्नाटक की सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच रहे हैं.
1985 में साथनूर विधानसभा सीट पर एक युवा नेता चुनाव लड़ता है. सामने थे एचडी देवेगौड़ा. परिणाम आया और युवा नेता हार गया. उसका नाम था डोड्डालाहल्ली केम्पेगौड़ा शिवकुमार. उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि यह हारने वाला युवक एक दिन कर्नाटक की राजनीति का सबसे प्रभावशाली खिलाड़ी बनेगा. लेकिन राजनीति का इतिहास गवाह है कि जो लोग पहली हार के बाद मैदान नहीं छोड़ते, अक्सर वही इतिहास लिखते हैं. 1989 में शिवकुमार जीत गए. और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा.
लेकिन डीके शिवकुमार की कहानी सिर्फ चुनाव जीतने की कहानी नहीं है. यह उस दुर्लभ राजनीतिक कौशल की कहानी है जिसे अंग्रेज़ी में ऑर्गनाइजर कहते हैं. नेता बहुत मिल जाते हैं. वक्ता भी बहुत मिल जाते हैं. लेकिन संकट की घड़ी में पूरी पार्टी को संभालने वाले लोग बहुत कम पैदा होते हैं.
2017 याद कीजिए. गुजरात... नरेंद्र मोदी और अमित शाह का अभेद्य किला. राज्यसभा चुनाव था. अहमद पटेल की प्रतिष्ठा दांव पर थी. कांग्रेस को डर था कि उसके विधायक टूट जाएंगे. और डर भी बेबुनियाद नहीं था. तब कांग्रेस ने गुजरात में नहीं, कर्नाटक में भरोसा ढूंढा. और वह भरोसा था डीके शिवकुमार. गुजरात के विधायक बेंगलुरु भेजे गए. आयकर विभाग के छापे पड़े. दबाव बना. धमकियां आईं. लेकिन शिवकुमार नहीं झुके. अंत में अहमद पटेल चुनाव जीत गए. राजनीतिक संदेश साफ था, "मोदी और शाह अजेय नहीं हैं."
फिर आया 2018. कर्नाटक चुनाव. भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी. दिल्ली में जश्न की तैयारी थी. टीवी स्टूडियो में सरकार बन चुकी थी. एंकरों ने शपथ ग्रहण तक करा दिया था. लेकिन राजनीति टीवी स्टूडियो में नहीं, जमीन पर तय होती है. और जमीन पर डीके शिवकुमार मौजूद थे. तीन दिन तक पूरा देश एक राजनीतिक थ्रिलर देख रहा था. रिसॉर्ट. बसें. विधायक. निगरानी. रणनीति. हर घंटे बदलते समीकरण. और इस पूरे नाटक का निर्देशक कौन था? डीके शिवकुमार. अंततः भाजपा सत्ता से बाहर रह गई. कांग्रेस-जेडीएस सरकार बनी. और एक बार फिर दिल्ली के सबसे ताकतवर रणनीतिकारों को कर्नाटक के एक नेता ने मात दे दी.
यहीं से डीके शिवकुमार सिर्फ एक नेता नहीं रहे. वे कांग्रेस के लिए क्राइसिस मैनेजर बन गए. वह आदमी जिसे तब याद किया जाता है जब बाकी सब रास्ते बंद हो जाते हैं.
लेकिन राजनीति की कीमत भी होती है. 2019 में मनी लॉन्ड्रिंग मामले में शिवकुमार तिहाड़ जेल पहुंचे. पचास दिन जेल में रहे. समर्थक सड़क पर थे. परिवार परेशान था. राजनीतिक भविष्य अनिश्चित था. ऐसे में सोनिया गांधी जेल में शिवकुमार से मिलने जाती हैं, उनपर अपना भरोसा जताती हैं. शिवकुमार ये जेस्चर नहीं भूलते. पार्टी की वफादारी की कसम खा लेते हैं. राजनीति में असली पहचान तब होती है जब आदमी सत्ता में नहीं, संकट में हो. कई लोग जेल से टूटकर लौटते हैं. कुछ लोग और मजबूत होकर लौटते हैं. शिवकुमार दूसरी श्रेणी में थे.
और यह कहानी इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि कभी युवा अवस्था में वे आरएसएस की शाखा तक गए थे. एबीवीपी में लाने की कोशिश भी हुई थी. लेकिन अंततः उन्होंने कांग्रेस का रास्ता चुना. उनकी पूरी राजनीतिक यात्रा ही इस बात का उदाहरण है कि इंसान का अंतिम परिचय उसका अतीत नहीं, उसका चुनाव होता है.
आज जब वे मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं तो सवाल सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं है. सवाल राजनीति के उस पुराने सिद्धांत का है जिसे आज के दौर में लोग भूल चुके हैं. क्या राजनीति सिर्फ भाषणों से चलती है? क्या राजनीति सिर्फ सोशल मीडिया के ट्रेंड से चलती है? क्या राजनीति सिर्फ टीवी कैमरों से चलती है? नहीं. राजनीति अंततः संगठन, निष्ठा, धैर्य और संकट में खड़े रहने की क्षमता से चलती है. और डीके शिवकुमार की पूरी यात्रा इसी का प्रमाण है.
कभी उन्होंने प्रधानमंत्री बनने वाले देवेगौड़ा के खिलाफ चुनाव लड़कर पहचान बनाई थी. फिर उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह की रणनीतियों को चुनौती देकर राष्ट्रीय पहचान बनाई. और अब मुख्यमंत्री बनकर वे उस लंबी राजनीतिक यात्रा के एक नए पड़ाव पर खड़े हैं.
भारतीय राजनीति में अक्सर चमकते चेहरे सुर्खियां बन जाते हैं. लेकिन इतिहास केवल चेहरों को याद नहीं रखता. इतिहास उन लोगों को भी याद रखता है जो पर्दे के पीछे खड़े होकर पूरी बाज़ी पलट देते हैं. डीके शिवकुमार उन्हीं लोगों में से एक हैं. क्योंकि सत्ता तक पहुंचने वाले नेता बहुत होते हैं. लेकिन सत्ता के सबसे कठिन खेल में बार-बार टिककर जीतने वाले खिलाड़ी बहुत कम होते हैं. पार्टी के प्रति वफादारी उनके कार्यों में झलकती है. कभी राजनीति के जंगल में शेर वही नहीं होता जो सबसे जोर से दहाड़े. शेर वह भी होता है जिसकी मौजूदगी भर से विरोधियों की नींद उड़ जाए.
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