Ranchi : झारखंड में मानवाधिकार का सवाल आज केवल कानूनी बहस तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह आम लोगों की दिनचर्या से गहराई से जुड़ चुका है. प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर होने के बावजूद राज्य की बड़ी आबादी आज भी भोजन, रोजगार, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी अधिकारों से वंचित है.
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि झारखंड में गरीबी और बेरोज़गारी अब केवल सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि संविधान प्रदत्त मानव गरिमा के अधिकारों का खुला उल्लंघन बन चुकी है.
सम्मानजनक जीवन का अधिकार और झारखंड की हकीकत
भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को सम्मान के साथ जीवन जीने का अधिकार देता है, लेकिन झारखंड के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में यह अधिकार आज भी अधूरा है. राज्य के कई जिलों में लोगों को नियमित रोजगार नहीं मिल पा रहा, जिससे उन्हें मजबूरन पलायन करना पड़ता है. पलायन के दौरान मजदूर शोषण, कम मजदूरी और असुरक्षित कार्य स्थितियों का सामना करते हैं, जो सीधे तौर पर उनके मानवाधिकारों का हनन है.विशेषज्ञों का मानना है कि जब किसी व्यक्ति को अपने ही राज्य में आजीविका का साधन नहीं मिलता, तो यह शासन व्यवस्था की विफलता को दर्शाता है.
आदिवासी समाज और मानवाधिकार उल्लंघन
झारखंड का आदिवासी समाज ऐतिहासिक रूप से जल-जंगल-जमीन से जुड़ा रहा है, लेकिन विकास परियोजनाओं, खनन और अधिग्रहण की प्रक्रिया में सबसे अधिक नुकसान इसी समाज का हुआ है. विस्थापन, पुनर्वास की कमी और आजीविका के साधनों का खत्म होना आदिवासी समुदाय को और अधिक हाशिए पर धकेल रहा है.
मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि बिना समुचित सहमति और पुनर्वास के भूमि अधिग्रहण आदिवासियों के संवैधानिक और मानवाधिकारों का उल्लंघन है. इससे सामाजिक असमानता और गरीबी और गहराती जा रही है.
मनरेगा और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार
झारखंड में मनरेगा ग्रामीण गरीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा का सबसे मजबूत आधार माना जाता है. यह योजना न केवल रोजगार उपलब्ध कराती है, बल्कि लोगों को अपने गांव में ही जीविका का अवसर देती है. लेकिन हाल के वर्षों में मनरेगा के तहत काम की कमी, मजदूरी भुगतान में देरी और प्रशासनिक उदासीनता ने इस अधिकार को कमजोर किया है.
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि समय पर मजदूरी न मिलना भी श्रमिकों के अधिकारों का उल्लंघन है. यदि मनरेगा को कमजोर किया गया, तो झारखंड में भुखमरी, कुपोषण और पलायन की समस्या और विकराल हो सकती है.
स्वास्थ्य, शिक्षा और पोषण : अधिकार या उपकार?
झारखंड में कुपोषण, मातृ मृत्यु और बाल मृत्यु दर जैसे मुद्दे आज भी गंभीर बने हुए हैं.सरकारी योजनाएं मौजूद हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका प्रभाव सीमित है. शिक्षा के अधिकार के बावजूद कई आदिवासी और दूरदराज के इलाकों में स्कूलों की स्थिति चिंताजनक है.
मानवाधिकार विशेषज्ञों का कहना है कि स्वास्थ्य और शिक्षा कोई सरकारी उपकार नहीं, बल्कि नागरिकों का मूल अधिकार है. इन क्षेत्रों में लापरवाही सीधे तौर पर मानवाधिकार हनन की श्रेणी में आती है.
राज्य की भूमिका और जवाबदेही
मानवाधिकार के सवाल पर राज्य की भूमिका केवल कानून बनाने तक सीमित नहीं हो सकती. झारखंड में आवश्यकता है कि नीतियां मानव-केंद्रित हों और उनका क्रियान्वयन पारदर्शी व जवाबदेह हो. सामाजिक संगठनों का कहना है कि योजनाओं की निगरानी, सामाजिक अंकेक्षण और जनभागीदारी को मजबूत किये बिना मानवाधिकारों की रक्षा संभव नहीं है.
झारखंड में मानवाधिकार का संकट किसी एक नीति या योजना की विफलता नहीं, बल्कि समग्र शासन व्यवस्था की चुनौती है. जब तक विकास का केंद्र आम नागरिक, मजदूर, आदिवासी और गरीब नहीं बनेगा, तब तक मानवाधिकार केवल दस्तावेज़ों तक सीमित रहेंगे. झारखंड को आज ऐसे विकास मॉडल की जरूरत है, जिसमें सम्मान, समानता और आजीविका हर व्यक्ति का वास्तविक अधिकार बन सके.
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