आखिरकार हंगरी में विक्टर ओरबान के शासन का अंत हो गया. विक्टर ओरबान, जो पिछले 16 सालों से हंगरी का प्रधानमंत्री था. वही हंगरी, जो यूरोपियन यूनियन का एक देश है और जिसका पीएम विक्टर ओरबान रूस के राष्ट्रपति पुतिन का समर्थक.
लोकतंत्र जीत गया और तिस्जा पार्टी जीत गया. इसके साथ ही हंगरी का कोर्ट, चुनाव आयोग, गोदी मीडिया, जिस पर विक्टर ओरबान ने कब्जा कर रखा था, वह सब हार गये. वह सुपारी मीडिया भी हार गया, जिसे ताकतवर लोगों ने अपने फायदे के लिए खड़ा किया था. जो चुनाव के दौरान पढ़ाते-दिखाते रहे, फिर से जीत रहे हैं विक्टर ओरबान.
तिस्जा पार्टी ने सिर्फ जीत दर्ज नहीं की है, वह दो तिहाई बहुमत से जीता है. हंगरी की जनता ने दो तिहाई बहुमत इसलिए दिया है, क्योंकि विक्टर ओरबान ने संविधान में एक संशोधन किया था कि अगर दो तिहाई की बहुमत से कोई कानून बनता हो तो अदालत भी उसे नहीं बदल सकती, भलें ही वह संविधान की मूल भावना के उलट हो.
विक्टर ओरबान के 16 साल के कार्यकाल में हंगरी की जनता को क्या मिला? अदालतों में सत्तापरस्त जजों की नियुक्ति, सत्तापरस्त मानसिकता वाले ब्यूरोक्रेट्स, यूनिवर्सिटी में सत्तापरस्त सोच वाले वाइस चांसलर, गोदी मीडिया या सत्तापरस्तों के हितों के लिए खड़ा किया गया नया संस्थान और कमजोर और बिखरा हुआ विपक्ष.
16 सालों में हंगरी को क्या मिला? राष्ट्रवाद का नारा, टैक्स के रूप में खून चूसने वाली सरकार, तानाशाही फैसले, हर आवाज को कुचलने वाले कानून, मीडिया पर अंकुश लगाने वाले फैसले. पर अब यह सब खत्म हो गया. एक झटके में.
विक्टर ओरबान व उनके लोगों ने बार-बार देश को यही बताया कि वही उनके भाग्यविधाता हैं. उनका कोई विकल्प नहीं है. विपक्ष चुनाव हार रहा है. विपक्ष देश विरोधी है. लेकिन हंगरी की जनता 16 सालों में यह समझ गई कि विकल्प एक-एक कर खत्म किया गया है.
विकल्प पर बाद में सोचा जायेगा, पहले इस इकलौते विकल्प को बाहर का रास्ता दिखाया जाना जरूरी है. जनता एक नई-नवेली पार्टी के साथ खड़ी हो गई. विपक्ष, जिसे बेकार साबित कर दिये गये विपक्ष ने प्रत्याशी ना देकर समर्थन दिया और विक्टर ओरबान हार गया.
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