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थोड़ा अपना अतीत ही याद कर लेते!

छात्र आंदोलन में घुसपैठ कर रही हैं सत्ता की भूखी और अवसरवादी पार्टियां. छात्र अराजक और अलगाववादी तत्वों से सावधान रहें... : सत्ता पक्ष, यानी भाजपा (बकौल दैनिक भास्कर)
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श्रीनिवास

नीट पेपर लीक मुद्दे पर शिक्षा मंत्री के इस्तीफे सहित कुछ अन्य मांगों पर सरकार पहले तो टालमटोल का रवैया अपनाये रही- हमने जांच की, दोषियों को पकड़ा, यानी ‘सब चंगा-सी’ कहती रही! जब ‘जंतर-मंतर’ पर ‘सीजेपी’ का पूर्व घोषित प्रदर्शन शुरू हो गया, सोनम वांगचुक आमरण अनशन पर बैठ गये, तब भी सरकार उदासीन बनी रही. सत्ता पक्ष के लोग उनको भटके हुए युवा और अराजक तत्व तक बताते रहे. मगर  'संसद मार्च' में उमड़ी भीड़ और उसे रोकने के पुलिस की कठोर कार्रवाई के बाद जब आंदोलन को आम आदमी का समर्थन मिलने लगा, वर्दी और बिना वर्दी वालों के डंडों के बावजूद जब ‘जंतर-मंतर’ पूरे देश में फैलने लगा, तो अंततः शिक्षा मंत्री ने 25 जुलाई को इस्तीफा दिया. 

 

गृह मंत्री और भाजपा अध्यक्ष ने जिसे उनका महान त्याग और जनता की निःस्वार्थ सेवा का उच्चतम मानदंड बताया. मगर साथ ही भाजपा ने आंदोलनकारी युवाओं को सावधान किया है कि ‘सत्ता की भूखी और अवसरवादी पार्टियां छात्र आंदोलन में घुसपैठ कर रही हैं, उनसे सतर्क रहें!’ हालांकि किसी दल का सत्ता की चाह रखना गलत नहीं है, लेकिन मौजूदा संदर्भ में भाजपा का यह आरोप लगाना थोड़ा हास्यास्पद है, क्योंकि खुद उसका अतीत कुछ ऐसा ही रहा है!   

 

अब जरा फ्लैश बैक में चलते हैं- 

दिसंबर, 1973 : गुजरात की कांग्रेस सरकार के खिलाफ एक मामूली (छात्रावास के मेस का शुल्क बढ़ने) मुद्दे पर छात्रों में आक्रोश बढ़ता गया. धीरे-धीरे वह आंदोलन में बदल गया! विरोधी दल भी कूद पड़े! विधानसभा भंग करने की मांग की गयी! जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने भी आंदोलन का समर्थन किया! मोरारजी देसाई अनिश्चितकालीन अनशन पर बैठ गये! केंद्र सरकार/इंदिरा गांधी को झुकना पड़ा. पहले मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दिया, फिर (मार्च में) विधानसभा भंग कर दी गयी!

 

मगर छात्रों के उस आंदोलन में विपक्षी दलों का शामिल होना, विधानसभा भंग करने की मांग होना, मोरारजी का अनशन करना "राजनीति से प्रेरित नहीं" और छात्र आंदोलन में सत्ता की भूखी अवसरवादी पार्टियों का घुसपैठ करना नहीं था!

 

1974 में बिहार में हुए छात्र आंदोलन को भी उससे प्रेरणा मिली! नारा लगा- गुजरात की जीत हमारी है, अब बिहार की बारी है! विधानसभा भंग करने की मांग हुई, विरोधी दल शामिल हो गये! जेपी ने नेतृत्व किया! मगर वह छात्र आंदोलन में "सत्ता की भूखी व अवसरवादी पार्टियों का घुसपैठ" करना नहीं था!

 

12 जून, 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी का 1971 का निर्वाचन रद्द कर दिया! इंदिरा गांधी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. इधर उनके इस्तीफे की मांग जोर पकड़ने लगी! उसके आगे क्या हुआ, सर्वविदित है! इमरजेंसी लगी, जेपी सहित तमाम नेता व बड़ी संख्या में कार्यकर्ता गिरफ्तार हुए! मार्च, 1977 में चुनाव हुए और जनता ने कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया! जनता पार्टी की सरकार बनी. कांग्रेस शासित राज्यों की सरकारों को बर्खास्त कर दिया गया, जून में हुए चुनाव में हर जगह जनता पार्टी की सरकार बन गयी!

 

यह बताना शायद जरूरी नहीं है कि जनता पार्टी का गठन तत्कालीन जनसंघ (भाजपा का पूर्व रूप) सहित अन्य विपक्षी दलों के मिलने से हुआ था.

 

उन आंदोलनों में विरोधी दलों की भागीदारी कहीं से गलत नहीं है. मगर छात्र आंदोलनों की लहर पर सवार होकर सत्ता तक पहुंचे लोग जब ज्ञान देने लगते हैं कि "कुछ राजनीतिक दल छात्र आंदोलन में घुसपैठ कर रहे हैं, कि छात्र अराजक और अलगाववादी तत्वों से सावधान रहें..." तो हंसी आती है. यह महज स्मृति दोष है या पाखंड! शर्म तुमको मगर नहीं आती!

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