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ऐसे में तो खत्म ही हो जायेगा मीडिल क्लास

1985 में प्रकाशित पत्रिका धर्मयुग का कवर पृष्ठ. आज मेन स्ट्रीम मीडिया ऐसा नहीं दिखता.

भारत में मध्य वर्ग (मीडिल क्लास) को हाशिये पर डाल दिया गया है. उसे जब लाभ मिलना चाहिए, तब सरकारों को ज्यादा टैक्स चाहिए होता है और जब दिक्कत आती है तो कह दिया जाता है कि कुर्बान हो जाओ. देश के नाम पर, अर्थव्यवस्था के नाम पर, धर्म के नाम पर और सरकार के नाम पर.

केंद्र हो या राज्यों की सरकारें, सबको सिर्फ इस बात की चिंता है कि कैसे चुनाव जीता जाये और सत्ता हाथ में रहे. इसके लिए उन्हें वोट चाहिए. तो बहुसंख्यक जो गरीब तबके के हैं, उनके अकाउंट में सीधे कैश ट्रांसफर करके वोट ले लिया जा रहा है. मीडिल क्लास अब बचे ही कितने हैं.

 

उद्योगपतियों को सरकार टैक्स में राहत देती है. संकट में सरकार साथ खड़ा होकर आम लोगों को कुर्बान होने के लिए कह देती है. यह जो पिछले 11 दिनों में पेट्रोल और डीजल के दाम में प्रति लीटर 7.50 रुपये की बढ़ोतरी की गई है, यह सबके लिए जिंदगी जीने की लागत बढ़ाने वाली तो है ही लेकिन मीडिल क्लास तो खत्म ही हो जाएगी.

 

मीडिल क्लास, जिनकी मासिक आमदनी 20-25 हजार रुपये है, जिसके पास बाईक, स्कूटी है, उसके लिए सड़क पर निकलना ही महंगा नहीं पड़ रहा, बल्कि उन्हें महंगाई की मार भी झेलनी पड़ रही है. जिनकी मासिक आमदनी 50 हजार या इससे थोड़ी अधिक है, उन्होंने कार तो ले ली है, लेकिन अब उसके लिए तेल भराना भारी पड़ रहा है.

 

हालात बहुत खराब है. आरबीआई की रिपोर्ट कहती है, देश की घरेलू वित्तीय बचत 50 सालों में सबसे कम है. लोग जो कमा रहे हैं, उससे घर चलाना ही मुश्किल हो रहा है. वह बचत क्या खाक करेंगे. ऊपर से शिक्षा व स्वास्थ्य पर 25-30 प्रतिशत का बढ़ा खर्च उन्हें कर्ज के दलदल में धकेल रहा है. 


जो हालात बन रहे हैं, वह चौथी शताब्दी (350 ईसा पूर्व) अरस्तू का कथन याद दिलाता है. उन्होंने अपनी पुस्तक पॉलिटिक्स में लिखा था- जब किसी समाज का मीडिल क्लास सिकुड़ता है या खत्म हो जाता है, तो सत्ता तानाशाह व लोकलुभावन बन जाता और धनपशुओं का राज स्थापित होने लगता है. आज यही हो रहा है.

 

 

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