Ranchi : झारखंड के चिकित्सकों का सपना यह है कि राज्य में स्वास्थ्य संबंधी व्यवस्था मजबूत हो. उनका यह सपना शुक्रवार को प्रेस क्लब में दैनिक शुभम संदेश के तत्वावधान में आयोजित संगोष्ठी में व्यक्त हुआ. उन्होंने स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याओं को लेकर चिंता व्यक्त की. साथ ही उनके समाधान के निमित्त झारखंड सरकार का ध्यान आकृष्ट भी कराया. उनका सबसे बड़ा सवाल तो यह था कि अन्य राज्यों के मुकाबले झारखंड में मेडिकल कॉलेजों की संख्या कम क्यों है? राज्य में छोटे अस्पतालों को सुव्यविस्थत करने तथा शिशु चिकित्सा व्यवस्था को और मजबूत बनाने पर भी उन्होंने बल दिया. डॉ आनंत सिन्हा -संचालक, देकमल हॉस्पिटल डॉ आनंत सिन्हा (संचालक, देकमल हॉस्पिटल) ने कहा कि पिछले 22 सालों में रांची पूर्वी क्षेत्र का मेडिकल हब बन सकता था. यहां स्वास्थ्य के क्षेत्र का भविष्य उज्ज्वल हो सकता था, लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं दिख रहा है. अन्य राज्यों के मुकाबले इस क्षेत्र में कॉरपोरेट हॉस्पिटल सबसे कम आए हैं. डॉ संदीप अग्रवाल, वरिष्ठ सर्जन डॉ संदीप अग्रवाल (वरिष्ठ सर्जन) ने कहा कि झारखंड बनने के बाद हमलोगों ने सपना देखा था कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपना राज्य बहुत तेजी से आगे बढ़ेगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. 2005 में मैं दिल्ली से रांची आ गया. उस समय मैंने रिम्स ज्वाइन किया. सबको प्रमोशन मिला गया है, लेकिन मैं आज भी एसोसिएट प्रोफ़ेसर हूं. उन्होंने कहा कि मरीजों का हंसता हुआ चेहरा को देखकर जो सुकून मिलता है, वह पैसे से नहीं मिलता. सभी लोग सपने देखते हैं, लेकिन सपने अभी अधूरे हैं. डॉ अजीत कुमार- सर्जन डॉ अजीत कुमार (सर्जन) ने कहा कि रिम्स को सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल बनाने की जरूरत है. यहां कार्डियोलॉजी में डीएम की पढ़ाई के लिए मात्र दो सीटें हैं. एमसीएच यूरोलॉजी और न्यूरोलॉजी में डीएम की पढ़ाई नहीं हो रही है. ऐसे में सपने अब भी अधूरे हैं. उन्होंने कहा कि अपने प्रयास से सदर अस्पताल में लेजर और लेप्रोस्कोपी सर्जरी की शुरुआत की है. इससे रिम्स का भार कम हुआ है. ऐसी व्यवस्था पूरे राज्य में कायम होनी चाहिए. उन्होंने कहा कि क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट को सरल बनाया जाना चाहिए, ताकि नए और छोटे डॉक्टर आगे बढ़ सके. कारपोरेट कल्चर को बढ़ावा देने के बजाय छोटे अस्पतालों को आगे बढ़ाना चाहिए. बिहार की राजधानी पटना में 6 मेडिकल कॉलेज है, जबकि राजधानी रांची में मात्र एक मेडिकल कॉलेज. डॉ मनोज, माइक्रोबायोलॉजी, रिम्स डॉ मनोज (माइक्रोबायोलॉजी, रिम्स) ने कहा कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में जैसा सोचा था, वैसा विकास नहीं हुआ. हां, रिम्स में कुछ सुधार हुए हैं. उन्होंने सवालिया लहजे में कहा कि पड़ोसी राज्यों में जितने मेडिकल कॉलेज हैं, झारखंड में नहीं हैं. राज्य में मात्र 9 मेडिकल कॉलेज हैं. इनमें भी दो प्राइवेट मेडिकल कॉलेज है. सरकार को इस पर ध्यान देने की जरूरत है. उम्मीद है कि राज्य में स्वास्थ्य क्षेत्र में एक बेहतर बदलाव होगा. डॉ अभिषेक रामाधीर, ईएनटी सर्जन डॉ अभिषेक रामाधीर (ईएनटी सर्जन) ने कहा कि 2014 में जब मैं अमेरिका और यूरोप से पढ़ाई कर पहली बार रांची आया तो यहां कई चुनौतियां दिखीं. इन देशों की अर्थव्यवस्था भारत से अलग है. राज्य में उन्नत तकनीक लाएंगे, तभी नए डॉक्टर सीख पाएंगे. उन्होंने कहा कि सीईए को जटिल बना दिया गया है. ऐसे में नए डॉक्टर प्रैक्टिस ही नहीं कर पाएगा. चीजें सुधरेंगी, तभी स्वास्थ्य के क्षेत्र में बदलाव होगा. उन्होंने हर एक जिले में मेडिकल कॉलेज की मांग सरकार से की है. साथ ही हेलीकॉप्टर एंबुलेंस की व्यवस्था कायम करने की भी मांग सरकार से की. डॉ स्वाति, डेंटल सर्जन डॉ स्वाति (डेंटल सर्जन) ने कहा कि 2014 से प्राइवेट प्रैक्टिस की शुरुआत की है. व्यवस्था में बदलाव हुआ है. उन्होंने कहा कि कोरोना काल में काम किया है, लेकिन उम्मीद थी कि राज्य सरकार प्राइवेट प्रैक्टिस करने वालों से भी इस महामारी में सेवा लेगी, पर ऐसा नहीं हुआ. उन्होंने कहा कि लोगों को सरकारी अस्पतालों के प्रति सोच बदलने की जरूरत है. डॉ विकास कुमार, न्यूरो सर्जरी डॉ विकास कुमार (न्यूरो सर्जरी) ने कहा कि मरीजों से संबंध और सुविधा को बेहतर बनाने की जरूरत है. उन्होंने अपने विभाग न्यूरोसर्जरी की उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि यहां हर रोज 8 से 9 बड़े ऑपरेशन होते हैं. महीने में 900 के करीब ऑपरेशन किया जाता है. उन्होंने कहा कि लोगों को जानकारी होनी चाहिए की रिम्स में इलाज की व्यवस्था कैसे बदली है. हमारी जिम्मेदारी इलाज तक सीमित है. व्यवस्था बदलने की जिम्मेदारी सरकार की है. 60 साल के ढांचे को आज तक ढोया जा रहा है. बदलाव हुआ है, लेकिन बदलाव का दर बहुत धीमा है. यहां डॉक्टरों और कर्मचारियों की संख्या बढ़नी चाहिए. डॉ अभिषेक सिन्हा, नेत्र विभाग रिम्स डॉ अभिषेक सिन्हा (नेत्र विभाग रिम्स) ने कहा कि हमारी भी जिंदगी है और हम भी आम इंसान हैं. मरीजों की संवेदना हमारे प्रति भी होना चाहिए. डॉ रवि शेखर, शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ रवि शेखर (शिशु रोग विशेषज्ञ) ने कहा कि धनबाद से एमबीबीएस और रिम्स से पीजी की पढ़ाई पूरी की. मैंने प्राइवेट प्रैक्टिस शुरू की, लेकिन सुदूर इलाकों में गया तो वहां देखा कि स्वास्थ्य व्यवस्था 10% भी नहीं है. अब चीजों में सुधार हो रहा है. नवजात शिशुओं के इलाज को और बेहतर बनाने की जरूरत है. इसे भी पढ़ें – मैकाले">https://lagatar.in/macaulays-education-system-was-not-in-our-interest-the-new-education-policy-was-practical-ramesh-bais/">मैकाले
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दैनिक शुभम संदेश की संगोष्ठी में डॉक्टरों ने कहा- झारखंड में मेडिकल कॉलेजों की संख्या कम क्यों?

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