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काम के घंटे और सम्मान का अधूरा समाधान

Sunil Badal उचित मजदूरी और सम्मान के लिए लगभग 100 वर्षों से भी अधिक की लड़ाई के बाद ऊपरी तौर पर मजदूरों की पहचान बदल गई है. भारत जैसे विकासशील देश में भी खेतों में काम करने वाले श्रमिकों से लेकर बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों में काम करने वाले बाबूओं की बाहरी तस्वीर लगभग एक सी है. दोनों आधुनिक वस्त्रों में हाथों में मोबाइल लेकर अपनी अपनी हैसियत के हिसाब से स्टाइल में दिखते हैं, लेकिन अगर गहराई से देखा जाए तो एक तरफ सरकारी संरक्षण में काम के घंटे निर्धारित होने पर भी शुद्ध सरकारी या अर्ध सरकारी कार्यालयों में उन घंटों से कम काम हो रहे हैं. उत्पादकता घटने से अनेक मिनी रत्न कंपनियां अभी घाटे में चल रही हैं या बंदी का भय उन्हें सता रहा है. दूसरी तरफ अमेरिका जहां से यह आंदोलन शुरू हुआ था और अमेरिका स्थित मुख्यालय वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियां कनाडा, इंग्लैंड, जर्मनी जैसे देशों या विकसित यूरोपीय देशों तक में फैले इनके कारोबार में सहयोगी भारत और ऐसे अन्य विकासशील देशों के कामगार चमक दमक और पैसों के मामले में भले समृद्ध और सुखी संपन्न दिखाई दें, पर अंदरूनी बात यह है कि ये चालाक कंपनियां इन्हें इतना टारगेट देती हैं या काम का विस्तार इस तरह करती हैं कि काम के घंटे सिर्फ कागजों और रिकॉर्ड में दर्ज होकर रह जाते हैं. प्रोजेक्ट समाप्त होने और मंदी के नाम पर कितनों की नौकरी छिनी और घर या गाड़ी या हेल्थ इंश्युरेंश की इएमआइ नहीं भर पाने के कारण कितने लोगों की क्या दुर्गति हुई, यह एक अलग रिसर्च का विषय है. अनेक भारतीय परिवारों के बच्चे विदेशों के आकर्षण और भारी-भरकम वेतन के लालच में जब वहां पहुंचते हैं, तब उन्हें पूर्वी देशों का कार्यभार सौंपा जाता है. यानी जहां काम कर रहे हैं, वहां का दिन और यहां की रात मतलब आप दिन में भी कार्यरत हैं और रात में आपको ऑफ साइट यानी पूर्वी देशों से समन्वय स्थापित करना है, रिपोर्ट लेनी है. इस प्रकार 8 घंटे या सप्ताह में 5 दिन जैसी बातें ज्यादातर मामलों में सिर्फ कहने सुनने की बात रह जाती है. जल्दी प्रमोशन पाने के लिए अंधी दौड़ शुरू होती है, जो उन्हें घरों में भी लैपटॉप और संचार उपकरण से जोड़े रखती है. भारी दबाव, तनाव और असुरक्षित भविष्य का असर पारिवारिक जीवन पर पड़ता है. अनेक ऐसे मामले हैं, जिसमें युवा बच्चे नहीं पाल पाने के कारण या तो अवसाद में चले गए या बच्चे नहीं चाहते. चाइल्ड केयर और तनाव मुक्ति के साधन भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं, पर स्थिति उच्च वेतनमान वाले असुरक्षित मजदूर की सी है. इसी प्रकार भारत की बात करें तो जनता की गाढ़ी कमाई के टैक्स से चलने वाली अनेक सरकारी योजनाओं में फर्जी कार्य दिवसों की अक्सर चर्चा होती है, जिसमें प्रमुख है मनरेगा जहां मजदूरों के लिए 100 दिन काम, लाखों कार्य दिवस जैसी बातें सुनने को मिलती हैं और आरोप लगते हैं कि इन कामों में मजदूरों के बजाय बुलडोजर जैसी मशीनों का इस्तेमाल किया जा रहा है! दूसरी तरफ राजधानी दिल्ली से लेकर राज्यों की राजधानी और छोटे कस्बों तक में बिना किसी रिकॉर्ड के लाखों-करोड़ों मजदूर छोटे बड़े कल कारखानों, होटलों, रेस्तरां में काम करते हैं, जिनके न तो काम करने की अवधि तय है और न सरकार द्वारा निर्धारित ईपीएफ जैसी सुविधा, जिसमें सामूहिक बीमा भी शामिल है. यदि कोई सवाल उठाता है तो जितने लोग काम करते हैं, उससे कम संख्या दिखाकर कागजी कार्रवाई पूरी कर दी जाती है. असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मजदूरों की दुर्घटना में मृत्यु बिजली के काम करने जैसे खतरनाक काम करने वाले मजदूरों की मृत्यु के समाचार सिर्फ एक-दो दिन छोटे समाचारों के रूप में दिखाई पड़ते हैं और फिर बात आई गई हो जाती है. झारखंड बिहार यूपी जैसे राज्यों से मौसमी और स्थाई पलायन करने वाले मजदूर सीमांत क्षेत्रों, जम्मू कश्मीर, दक्षिण के कपड़ा उद्योग में काम करने जाते हैं, उन्हें उचित मजदूरी नहीं मिलने की शिकायतें भी छोटी मोटी खबरों के रूप में दिखाई पड़ती है. कोरोना काल में लाखों मजदूरों की खतरनाक यात्रा बाल बच्चों के साथ हजारों किलोमीटर की पैदल यात्रा के दुखद प्रसंग अभी लोग शायद भूल गए हों, लेकिन यह राष्ट्रीय सवाल है कि इन मजदूरों को उचित मजदूरी सम्मान और काम के घंटे निर्धारित करने का मजबूत मेकैनिज्म कब बनेगा और इस दिशा में पहल क्यों नहीं हो रही? कुछ मुट्ठी भर मजदूर संगठन और वामपंथी पार्टियां सवाल उठाती हैं, पर ये सवाल भी औपचारिकता बनकर रह जाते हैं, क्योंकि पंचायत से लेकर संसद तक में अगंभीर मुद्दों पर महत्त्वपूर्ण कार्य दिवसों को आरोप-प्रत्यारोप में गंवा देने की प्रवृत्ति बढ़ी है. इतिहास मई दिवस का 1 मई 1886 को अमेरिका में आंदोलन की शुरुआत हुई थी. इस आंदोलन में अमेरिका के मजदूर सड़कों पर आ गए थे और वे अपने हक के लिए आवाज बुलंद करने लगे. इस तरह के आंदोलन का कारण था काम के घंटे, क्योंकि मजदूरों से दिन के 15-15 घंटे काम लिया जाता था. आंदोलन के बीच में मजदूरों पर पुलिस ने गोली चला दी और कई मजदूरों की जान चली गई. वहीं 100 से ज्यादा श्रमिक घायल हो गए. इस आंदोलन के तीन साल बाद 1889 में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन की बैठक हुई. जिसमें तय हुआ कि हर मजदूर से केवल दिन के 8 घंटे ही काम लिया जाएगा. इस सम्मेलन में ही 1 मई को मजदूर दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा गया. साथ ही हर साल 1 मई को छुट्टी देने का भी फैसला लिया गया. अमेरिका में श्रमिकों के आठ घंटे काम करने के नियम के बाद कई देशों में इस नियम को लागू किया गया. अमेरिका में भले ही 1 मई 1889 को मजदूर दिवस मनाने का प्रस्ताव आ गया हो, लेकिन भारत में यह करीब 34 साल बाद आया. भारत में 1 मई 1923 को चेन्नई से मजदूर दिवस मनाने की शुरुआत हुई. लेबर किसान पार्टी ऑफ हिंदुस्तान की अध्यक्षता में ये फैसला किया गया था. इस बैठक को कई सारे संगठन और सोशल पार्टी का समर्थन मिला. जो मजदूरों पर हो रहे अत्याचारों और शोषण के खिलाफ आवाज उठा रहे थे. इसका नेतृत्व कर रहे थे वामपंथी. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.

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