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न्याय के बन्दर-बांट से बढ़ती अराजकता

Prem kumar  Mani सार्वजनिक संस्थाएं एक-एक कर अपना महत्व खो रही हैं और अराजकता जैसी स्थिति हो रही है तो आखिर क्यों? अराजकता, जैसा कि क्रोपाटकिन (1842 -1921) की संकल्पना थी, एक आदर्श स्थिति हो सकती है, लेकिन उसके लिए समाज को आमूलचूल बदलना पड़ता है. ऐसे समाज में जहां कई स्तरों पर, कई तरह की गैरबराबरी हो, अराजकता जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति ला देती है. कुल मिला कर यह गुंडों का राज हो जाता है. इसीलिए मैकियावेली ने राजा को ग्रीक देवता किरोन की तरह आधा ही मानवीय रहने की सलाह दी है. किरोन का आधा शरीर इंसान का होता है, आधा घोड़े का. अपने यहां के गणपति गणेश की तरह. पशुओं के साथ राजा को पशुवत ही व्यवहार करना चाहिए, ऐसी मैकियावेली की सलाह है. उत्तरप्रदेश से एक खबर आती है कि एक सांसद-विधायक अपराधी की अस्पताल ले जाते वक्त हत्या कर दी जाती है. जिसकी हत्या होती है, वह भी घोषित तौर पर हत्यारा रहा था. हिंसा और अपराध ही उसकी पूंजी थी. हमारे यहां सजा देने की प्रक्रिया इतनी पेचोखम वाली है कि बड़ा-से बड़ा अपराधी उससे छूट सकता है और मामूली जुर्म करने वाले भी लम्बी सजा काट सकते हैं. प्रायः ऐसा होता है कि किसी कैदी को जितनी सजा होती है, उससे कई गुना अधिक सजा वह भुगत चुका होता है. ऐसे में आम लोगों का न्यायव्यवस्था से विश्वास समाप्त होने लगता है. लोग क़ानून अपने हाथ में लेने लगते हैं. यह एक ऐसी अराजकता है, जिसकी बात क्रोपाटकिन ने नहीं सोची थी. देर से न्याय, खर्चीला न्याय और कुलीन न्याय दरअसल न्याय की मूल भावना को ही ख़त्म कर देते हैं. पिछली सदी में इससे कई तरह की सामाजिक-राजनीतिक अव्यवस्था को सृजित होते हम-सबने देखा है. एक उदाहरण शाहबानो मामले का था. सुप्रीम कोर्ट से फैसला होने के बाद राजकीय हस्तक्षेप हुआ और अध्यादेश द्वारा उस फैसले को निरस्त कर दिया गया. इसके बाद केंद्र सरकार रामजन्मभूमि मामले पर कोर्ट के फैसले का इंतज़ार करने की बात कर रही थी. अब केंद्र सरकार की बात को कौन मानता. तुम फिर अध्यादेश ला सकते हो, फैसले को निरस्त कर सकते हो, इससे बेहतर है, तुम ही फैसला कर दो. जब यह भावना आएगी तब कोर्ट की क्या भूमिका रह जाएगी? लोग न्यायव्यवस्था पर कैसे विश्वास करेंगे! अभी बिहार से मामला उठा है, जिसकी गंभीरता पर किसी की निगाह नहीं है. 1994 का मामला है. 5 दिसम्बर 1994 को गोपालगंज जिले के तत्कालीन जिलाधिकारी जी कृष्णैय्या, जो तेलंगाना के एक दलित परिवार से आए हुए भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे, सरकारी गाड़ी से सरकारी बैठक में भाग लेने हेतु पटना आ रहे थे. रास्ते में पड़ने वाले वैशाली जिले में एक हत्या हुई थी. चूंकि यह हत्या एक दबंग जाति से आए हुए दबंग व्यक्ति की थी, इसलिए इसे न्यायालय के भरोसे कैसे छोड़ा जा सकता था. कुछ तांडव तो दिखाना था. कृष्णैय्या की गाड़ी रोक दी गई. उन्हें गाड़ी से उतार कर पीटा जाने लगा. तभी एक आदमी ने हत्या कर देने का आदेश दिया और उनके माथे को पत्थरों से कुचल कर उनकी जान ले ली गई. दिल दहला देने वाला काण्ड था. कृष्णैय्या की उस हत्या मामले से कुछ भी संलिप्तता नहीं थी. मारने वालों को केवल उनकी जाति मालूम थी कि वह दलित है. क्या वह किसी ऐसी जाति का व्यक्ति होता, जिसे मारने पर उस बिरादरी के लोग सडकों पर उतर आते तो क्या कोई माथा कुचलने की जुर्रत करता? कृष्णैय्या का परिवार तेलंगना का था. पिता चौथे दर्जे के सरकारी सेवक. उनका परिवार बासगीत जमीन पर एक झोपड़ी बना कर रहता था. बेटा के अधिकारी होने पर परिवार ने कितनी उम्मीदें पाली होंगी. वोट की जाति-उन्मादी राजनीति के लिए उनकी बलि चढ़ा दी गई. उनकी विधवा का फोटो मैंने अख़बारों में देखा था. उनकी पीड़ा भरी आंखें पूरे समाज से कुछ प्रश्न कर रही थीं. उन्होंने न्याय- व्यवस्था पर भरोसा किया. घटना के समय न मैं था, न आप. साक्ष्य रहे होंगे. कोर्ट ने सुनवाई की . समीक्षा की. फैसला दिया कि इस मामले में आनंद मोहन (पूर्व सांसद) दोषी हैं. साक्ष्य इतने जबरदस्त थे कि कोर्ट ने फांसी की सजा मुक़र्रर की. अगले कोर्ट ने उसे उम्रकैद में बदल दिया. फांसी की सजा का मैं स्वयं विरोधी हूं. किसी को मारना सभ्य समाज के लिए उचित सजा नहीं है. मेरा तो यह भी मत है कि यदि अपराधी के आचरण में सुधार हो तो उसकी सजा को उसके आधार पर कम भी किया जा सकता है. पिछले दस अप्रैल को बिहार सरकार ने 1894 से चले आ रहे कानून में आवश्यक संशोधन कर आनंद मोहन की रिहाई का रास्ता साफ़ कर दिया है. और इसकी प्रक्रिया क्या थी. पहले महाराणा प्रताप जयंती का आयोजन होता है. मुख्यमंत्री बुलाए जाते हैं. जातिवादी नारों के बीच मुख्यमंत्री की घोषणा होती है- ‘हम तो उनके परिवार के संपर्क में हइये हैं. सब मामला देख रहे हैं एक-एक कर. मुझ पर भरोसा कीजिए.’ लोगों ने भरोसा किया. मुख्यमंत्री कहा करते थे-‘न हम किसी को बचाएंगे, न फंसाएंगे.’ लेकिन यह सब तो चलता है. राजनेता अपनी बातों पर अडिग रहेंगे तो रामराज कैसे चलेगा. अब यह दलित-उलित की हत्या मामले में एक ‘होनहार समाजवादी’ व्यक्ति को जेल में रखना क्या ठीक रहेगा! याद रखिए अतीक भी होनहार समाजवादी था. समाजवादी पार्टी का ही वह सांसद रहा. हमारी न्यायप्रणाली में दोष है कि अपराधियों को टिकट देने वाली पार्टियों के आलाकमानों को वह मामलों में नहीं शामिल करती. पार्टी से जुड़ कर इन अपराधियों की ताकत बढ़ती है. इसलिए पार्टी टिकट देते समय आलाकमान को देखना चाहिए कि उसके उम्मीदवार की पृष्ठभूमि क्या है. अपराधियों को टिकट देना, संरक्षण देने की तरह का अपराध है. पार्टी आलाकमानों को इसका दोषी बनाया जाना चाहिए. क्या आपको नहीं प्रतीत होता कि कोर्ट से सजा मिल जाने के बाद भी अतीक को कोई सरकार एक क़ानून-संशोधन कर जेल से बाहर कर सकती थी, जैसे कृष्णैय्या हत्या-काण्ड में हुआ? ये चीजें हमारे समाज को कहां पहुंचाने जा रही हैं. कोई कैसे करे कानून पर भरोसा. क्या एक बार बिहार सरकार ने कृष्णैय्या के परिवार का पक्ष भी जानने का प्रयास किया ? यदि नहीं तो इसे क्या कहा जाएगा? बिहार में कोई डेढ़ लाख लोग चुल्लू भर शराब पीने जैसे ‘जघन्य’ मामले में जेलों के भीतर हैं. जब हत्या के मुजरिम जेल से बाहर आ सकते हैं, तब उन अभागे लोगों, जिन्होंने चुल्लू भर सोम-सुरापान कर लिया, को जेल में रखने का क्या औचित्य है . क्या वे केवल इसलिए जेल में रहें कि वे गरीब हैं? जाति की गणना करा रही बिहार सरकार को उन लोगों की भी जाति गणना करा लेनी चाहिए. मेरा अनुमान है नब्बे फीसद से अधिक दलित-पिछड़े तबके के लोग उनमें हैं. लेकिन वे चूकि गरीब हैं, दलित हैं, इसलिए उनका जेलों में रहना ही उचित है. यही न्याय है. डिस्क्लेमर : ये लेखक के निजी विचार हैं. 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