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रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत ने कुशल कूटनीति से ग्लोबल प्लेटफॉर्म पर विश्वसनीयता स्थापित की

NewDelhi :   रूस और यूक्रेन के बीच 24 फरवरी 2022 में युद्ध शुरू हुआ था. ढाई साल से चल रहे इस युद्ध में दोनों देशों को भारी नुकसान हुआ है. इतना ही नहीं युद्ध का असर दुनिया की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है. इस उथल-पुथल के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने ग्लोबल प्लेटफॉर्म में अपनी एक विश्वसनीयता स्थापित की है. इसका ताजा उदाहरण पीएम मोदी की रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ हाल ही में की गयी बातचीत है. पीएम मोदी ने दोनों पक्षों के साथ कूटनीतिक भागीदारी निभाई है और दोनों देशों को स्थाई और शांतिपूर्ण समाधान निकालने की बात दोहरायी है. यह अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रति भारत के सूक्ष्म दृष्टिकोण को दर्शाती है, जो उसके ऐतिहासिक संबंधों, रणनीतिक हितों और शांति के प्रति प्रतिबद्धता पर आधारित है.

पीएम मोदी ने रूस और यूक्रेन से शांतिपूर्ण समाधान को लेकर की बातचीत

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार (27 अगस्त) को रूस के राष्ट्रपति पुतिन से फोन पर बात की थी. इस दौरान मोदी ने पुतिन से रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर बातचीत करते हुए शांतिपूर्ण समाधान को लेकर प्रतिबद्धता की बात दोहरायी. साथ ही मोदी ने पुतिन से विशेष रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने को लेकर चर्चा की. दोनों नेताओं के बीच पीएम मोदी की हालिया यूक्रेन दौरे पर भी चर्चा हुई थी. इससे पहले 23 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यूक्रेन की ऐतिहासिक यात्रा पर राजधानी कीव पहुंचे थे. इस दौरान दोनों नेताओं ने गले मिले. साथ ही मोदी जेलेंस्की के कंधे पर हाथ रखते नजर आये.

भारत ने दोनों देशों के साथ संतुलन बनाने की कोशिश की

प्रधानमंत्री मोदी की पुतिन और जेलेंस्की के साथ मुलाकात एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हुई है. जैसे-जैसे रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध बढ़ता जा रहा है, वैश्विक समुदाय काफी हद तक ध्रुवीकृत हो रहा है. संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाये हैं. वहीं दूसरी तरफ यूक्रेन को अटूट समर्थन दिया है. इसके विपरीत भारत का दृष्टिकोण काफी अलग रहा. भारत ने सावधानीपूर्वक संतुलन बनाने की कोशिश की. भारत ने यूक्रेन पर रूसी आक्रमण की निंदा नहीं की है. इतना ही नहीं यूक्रेन-रूस युद्ध के दौरान भारत ने रूस के तेल खरीदना भी जारी रखा. भारत के लिए पुतिन और जेलेंस्की दोनों के साथ बैठक केवल एक कूटनीतिक इशारा नहीं है, बल्कि यह संघर्ष में संभावित मध्यस्थ के रूप में देश की भूमिका को उजागर करता है. दोनों नेताओं के साथ बातचीत करके मोदी भारत की गुटनिरपेक्षता की दीर्घकालिक नीति व संवाद और शांति को बढ़ावा देने की अपनी प्रतिबद्धता को मजबूत करते हैं. यह कदम न केवल भारत की वैश्विक स्थिति को बढ़ाता है, बल्कि नई दिल्ली के लिए एक ऐसे क्षेत्र में शांति प्रयासों में योगदान करने के रास्ते भी खोलता है जो वैश्विक सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण है.

भारत का रूस और अमेरिका के साथ संबंधों में संतुलन

भारत के रूस के साथ संबंधों की जड़ें इतिहास में बहुत गहरी है. शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ भारत के सबसे भरोसेमंद सहयोगियों में से एक था, जो सैन्य सहायता और कूटनीतिक समर्थन प्रदान करता था. आज  रूस एक प्रमुख साझेदार बना हुआ है. खासकर रक्षा क्षेत्र में. जबकि भारत रूसी सैन्य उपकरणों और प्रौद्योगिकी पर बहुत अधिक निर्भर है. वहीं भारत ने अमेरिका के साथ भी अपने संबंध मजबूत किये हैं. खासकर व्यापार, रक्षा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में. यह दोहरी भागीदारी भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का प्रमाण है. यूक्रेन संघर्ष पर अलग-अलग रुख के बावजूद भारत ने रूस और अमेरिका दोनों के साथ संबंधों को और मजबूत किया है. यह  पीएम मोदी की यह क्षमता एक उल्लेखनीय कूटनीतिक उपलब्धि है. रूस से कच्चे तेल की खरीद जारी रखते हुए भारत ने अमेरिका के साथ अपनी रक्षा और आर्थिक साझेदारी का भी विस्तार किया है. इस संतुलनकारी कार्य ने न केवल भारत के रणनीतिक हितों की रक्षा की है, बल्कि एक बहुध्रुवीय दुनिया में स्वतंत्र रूप से कार्य करने की इसकी क्षमता को भी प्रदर्शित किया है. [wpse_comments_template]

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