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महंगाई व मुनाफा-आंकड़े और हकीकत

Mukesh Aseem नील्सन आईक्यू बाजार संबंधी अध्ययन करती है. उसने मार्च तिमाही में पाया कि पैकेज्ड उपभोक्ता सामानों की बिक्री रुपये में तो 1% बढ़ी, किंतु नग या मात्रा में 8% घट गई. मतलब पिछले साल की मार्च तिमाही में जितना माल 92 रुपये में बिका था, इस बार उतना ही माल 101 रुपये में बिका. इसका मतलब है कि सिर्फ 3 महीने में ही महंगाई लगभग 10% रही. लेकिन यूनीलीवर जैसी कंपनियां लगभग हर तिमाही में दाम बढ़ा रही हैं, तो सालाना महंगाई दर इससे कहीं ऊपर होगी, इतना तो कहा ही जा सकता है. कहा जा सकता है कि यह सिर्फ एक क्षेत्र का उदाहरण है. लेकिन क्या बाकी क्षेत्रों में स्थिति बहुत भिन्न है? श्रीलंका में हाल के संकट के कुछ अध्ययन बता रहे हैं कि वास्तव में महंगाई दर 55% तक गई, जबकि आधिकारिक आंकड़े बस 15.7% तक ही जा रहे थे. क्या हमारे देशी आंकड़े इससे बहुत ज्यादा सटीक होते हैं? एक और पक्ष, यूनीलिवर की रिपोर्ट से ही. जब भी महंगाई बढती है या कहिये बढ़ानी होती है, मीडिया बताने लगता है कि वो तो लागत बढ़ रही है. जिसके लिए दाम बढ़ाने पड़ रहे हैं. कंपनी कहती है कि लागत वृद्धि को खपाने के लिए ही दाम बढ़ाये जा रहे हैं और कंपनी का मार्जिन 3% गिरा है. कंपनी के ही मुताबिक, वास्तविक बिक्री बढ़ी नहीं है. सिर्फ दाम बढ़ने से रुपये में बिक्री 11% बढ़ी है. कंपनी कहती है दाम लागत में वृद्धि को भी नहीं खपा पा रहे और मार्जिन घट गया है. पर कंपनी के नतीजे यह भी कहते हैं कि मुनाफा 8.5% बढा है. कैसे? पर कंपनी की बताई बातों को ज्यों का त्यों एक चौथाई पेज की खबर बनाने वाले दो पत्रकार ये सवाल कैसे पूछते? उन्होंने सीधा मान लिया कि बिक्री 11% बढ़ी पर मुनाफा 8% ही बढ़ा. मतलब मार्जिन 3% कम हो गया. पर अगर दाम सिर्फ लागत को खपाने के लिए बढ़ाये थे और नग में बिक्री उतनी ही है, तो मुनाफा बढ़ेगा ही नहीं. यानी दाम वृद्धि सिर्फ लागत वृद्धि को खपाने के लिए नहीं है. बल्कि अपनी मुनाफा दर को सुरक्षित रखने या बढ़ाने के लिए है. भारत में पत्रकार ऐसे सवाल नहीं करते, अर्थशास्त्री भी ऐसे अध्ययन नहीं करते या कोई करता भी हो तो कहीं दबे रह जाते हैं. पर कई देशों में ऐसे अध्ययन आये हैं कि लागत वृद्धि के बहाने बाजार में एकाधिकार रखने वाली कंपनियां दाम बढ़ा कर ऊंचे मुनाफे लूट रही हैं. फेसबुक पोस्ट में उतना विस्तार से लिखना संभव नहीं, पर पूरी सप्लाई चेन को स्रोत से देखें तो लागत अंततः क्या है? सिर्फ मजदूरी. पर भयावह बेरोजगारी के दौर में मजदूरी दर तो आम तौर पर प्रभावी रूप से स्थिर है या गिर रही है. फिर लागत कैसे बढ़ रही है? असल में इसके लिए मार्क्सवाद जानना भी उतना जरूरी नहीं. खुद पूंजीवादी अर्थशास्त्र के क्लासिकल गुरु डेविड रिकार्डो 200 साल पहले बता गए थे कि मुनाफा बढ़ने का एकमात्र तरीका है मजदूरी में गिरावट. बाकी सब बात सिर्फ भ्रमित करने के लिए की जाती हैं. एकाधिकारी पूंजी के युग में बाजार में मांग-आपूर्ति को नियंत्रित कर सकने वाली कॉर्पोरेट पूंजी मनमर्जी से दाम बढ़ा सकती है, यह फैक्टर और जुड़ गया है. मुनाफा इन दोनों से मिलकर बढ़ा है. डिस्क्लेमर:ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]  

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