कर्नाटक के आगे के सवालों से साक्षात्कार
Shyam Kishore Choubey एक नवंबर 1956 को गठित मैसूर राज्य (अब कर्नाटक) के इतिहास में 224 में से ऐतिहासिक 136 सीटें जीतकर कांग्रेस ने सन् 89 के बाद अपने नाम एक नया इतिहास दर्ज कर लिया. 2018 में 78 सीटों वाली कांग्रेस ने महज 37 सीटों वाली जेडीएस को मजबूरी में मुख्यमंत्री पद सौंपा था. शनिवार को आया चुनाव परिणाम खुद कर्नाटक के 2018 के इतिहास के अलावा मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, झारखंड, हिमाचल जैसे राज्यों में गुजरे वर्षों में डबल इंजन की सरकार को नकारने के इतिहास से बहुत अलग रहा. यह चुनाव ऐसे वक्त पर हुआ, जब डबल इंजन की सरकार वाला मणिपुर धू-धू कर रहा था, कत्ल-दर-कत्ल हो रहे थे. इसी कर्नाटक ने 2018 में हंग असेम्बली दी थी. पांच साल में चार सरकारें बनीं, जिनमें तीन भाजपा की रहीं. सहज सवाल है, जो कर्नाटक दक्षिण में भाजपा का प्रवेश द्वार बना था, वही क्या अब साल भर के अंदर त्रिपुरा, मेघालय, नगालैंड, मिजोरम, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और तेलंगाना के अलावा लोकसभा चुनाव में विकल्पहीनता के मसले पर एक पक्षीय वोटिंग के दरवाजे बंद करने का सबब बनेगा? इस सवाल का जवाब तत्काल नहीं मिलेगा, लेकिन एक दूसरा अहम सवाल है, कर्नाटक में महाबली भाजपा की हार का ठीकरा किस पर फूटेगा? जीत के ट्रंप कार्ड मोदी और अमित शाह की जोड़ी पर या येदियुरप्पा और बोम्मई पर? इसका जवाब तीसरा सवाल है, भाजपा जीतती तो सेहरा किसके सिर बंधता? जेपी नड्डा महोदय तो अपना गृह राज्य हिमाचल गंवाने का गम लिए घूम रहे हैं. नड्डा के उलट ‘परिवार’ से अलग अक्टूबर 2022 में कांग्रेस अध्यक्ष बनाये गये मपन्ना मल्लिकार्जुन खड़गे का कार्यकाल नवंबर 2022 में हिमाचल और अब कर्नाटक की जीत से चकमक है. अलग बात है कि भाई-बहन राहुल-प्रियंका ने मोदी के समानान्तर जोर लगाया. मोदी की 19 रैलियों और छह रोड शो के सापेक्ष राहुल ने 16 रैलियां और दो रोड शो और प्रियंका ने 15 रैलियां और दस रोड शो किये. काबिलेगौर चुनावी गप्प रही, पीएम मोदी ने कहा कि मुझे 91 गालियां दी गईं तो प्रियंका ने तुर्की-ब-तुर्की जवाब दिया, ये पहले पीएम हैं, जो जनता को अपना दुखड़ा सुना रहे हैं, ये आपका दर्द कैसे हरेंगे? 2014 के बाद यह पहला अवसर था, जब कांग्रेस चुनौती देती हुई चुनाव लड़ती दिखी. तीन महीने पहले राहुल गांधी ने बरास्ता कर्नाटक कन्याकुमारी से श्रीनगर तक 3,570 किमी लंबी ‘भारत जोड़ो यात्रा’ निकालकर खुद को युवराज के घेरे से अलग कर दिखाया था. कर्नाटक चुनाव हिजाब, टीपू सुल्तान, कम्युनल वॉयलेंस और करप्शन जैसे मसलों के इर्द-गिर्द लड़ा गया. मोदी ने बजरंग दल पर कांग्रेस द्वारा बैन के वादे को हिंदुओं के आराध्य बजरंगबली से जोड़ दिया. जवाब में कांग्रेस द्वारा बजरंगबली के मंदिर बनवाने का वादा बताता है कि इस बार वह हर जवाब से लैस थी. मोदी युग में पहली बार दिखा, कांग्रेस ने उनका ही मंत्र इस्तेमाल कर बोम्मई सरकार पर 40 प्रतिशत कमीशन यानी भ्रष्टाचार के तीर चलाये, जो निशाने पर लगे. कर्नाटक दक्षिण भारत का सबसे बड़ा किंतु भारत का छठा सबसे बड़ा राज्य है, जिसे अब ज्ञान की राजधानी कहा जाता है. रेशम, मसाले और चंदन के उत्पादन से ही नहीं, इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी हब बन जाने से इसकी पहचान में चार चांद लग गए हैं और समृद्धि बढ़ी है. 28 हजार एमएसएमई और 83 प्रतिशत हिंदू आबादी वाले इस राज्य की 224 सीटों पर रिकॉर्डतोड़ 73.19 प्रतिशत वोटिंग ने सर्वे और रेटिंग एजेंसियों को चकरा दिया. 10 में से 5 एग्जिट पोल में हंग असेंबली की भविष्यवाणी की गई. चाहे जैसे भी हो, कर्नाटक की सत्ता पर भाजपा कायम थी, लेकिन गुजरे 38 वर्षों का इतिहास बरकारार रखते हुए कन्नड़भाषियों ने एक बार फिर सत्ता पलट दी. चुनाव से ऐन पहले मुख्यमंत्री बसवराज सोमप्पा बोम्मई ने मुस्लिम आरक्षण में 4 प्रतिशत कटौती कर वोक्कालिंगा और लिंगायतों को यह लाभ देने की घोषणा की, लेकिन वह परिणाम न दे सकी. जिन चार नेताओं ने भाजपा को कर्नाटक में स्थापित करने में अहम भूमिका अदा की थी, उनमें से एक अनंत कुमार अब रहे नहीं, ईश्वरप्पा को टिकट नहीं मिला, येदियुरप्पा को चलती सरकार में दो साल बाद ही इस्तीफा करना पड़ा था और जगदीश शेट्टार दरकिनार किये जाने के कारण कांग्रेस में चले गए थे. शेट्टार खुद चुनाव हार गए, लेकिन भाजपा को नुकसान पहुंचाने में यत्किंचित उनका भी योगदान रहा. 16 राज्यों में शासन कर रही भाजपा के हाथों से एक कर्नाटक छिन गया. जैसा कि राजनीतिक दलों का विस्तार होने पर होता है, भाजपा में भी देखें तो कांग्रेस से आये हिमंत बिस्वा सरमा और योगी आदित्यनाथ के अलावा ऐसा कोई मुख्यमंत्री नहीं है, जो अपने राज्य में अपने दम पर जीत दिलाने का हौसला रखता हो. यही कारण है कि राज्यों के चुनाव भी मोदी के चेहरे पर ही लड़े जाते हैं. यूं, कर्नाटक के परिणाम का अहसास भाजपा को था, तभी मतदान के लिए निकटतम पड़ोसी डबल इंजन वाले गोवा में हर कर्नाटकी को पेड लीव दी गई थी. कर्नाटक को जो करना था, कर दिया. अब सवाल है कि जैसा भाजपा प्रमुख जेपी नड्डा ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था, नरेंद्र मोदी का आशीर्वाद चाहिए तो भाजपा को वोट दें, क्या उस आशीर्वाद से यह राज्य वंचित रखा जाएगा? दूसरा सबसे बड़ा सवाल, साल भर के अंदर होनेवाले लोकसभा सहित आठ राज्यों के चुनाव में कांग्रेस या जैसा कि विरोधी दलों की एकजुटता की कवायद चल रही है, संभावित गठबंधन मजबूत मोर्चेबंदी कर पाएगा? मोदी मैजिक को धता बता कांग्रेस को मिली कर्नाटकी संजीवनी का असर देखा जाना बाकी है. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं.

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