Ranchi : झारखंड के जंगल सिर्फ हरियाली ही नहीं, बल्कि ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी और आजीविका का सहारा भी है. यहां ऐसे कई पेड़-पौधे मिलते हैं, जिन्हें गैर-काष्ठ वन उत्पाद (NTFP) कहा जाता है. इनसे लकड़ी तो नहीं मिलती, लेकिन पत्ते, फल, बीज और औषधियों के रूप में ये बेहद उपयोगी हैं.
वहीं, दूसरी तरफ जंगलों में कुछ आक्रामक झाड़ियां और घास भी तेजी से फैल रही है, जो प्राकृतिक पेड़-पौधों को नुकसान पहुंचा रही है. झारखंड के जंगलों में आक्रामक पौधों का खतरा भी बढ़ता जा रहा है.
अब सबसे बड़ी चुनौती है कि उपयोगी पेड़-पौधों की रक्षा करते हुए इन आक्रामक प्रजातियों पर नियंत्रण करना. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इन आक्रामक पौधों पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई तो ये जैव विविधता और ग्रामीणों की आजीविका दोनों पर बुरा असर डालेंगी.
जंगलों का खजाना -प्रमुख उपयोगी पेड़-पौधे
झारखंड सरकार के ताजा आंकड़े बताते हैं कि जंगल में लाखों-करोड़ों की संख्या में उपयोगी प्रजातियों के पेड़ पौधे है, जिससे स्थानीय लोगों को अजीविका चलाने में मदद मिलती है. लेकिन आक्रामक झाड़ियां और घास उपयोगी पेड़-पौधे के विकास में अवरोधक बन रही है. इन्हीं झाडियों की वजह से जंगलों में तेजी से आग भी लग जाती है और पेड़ पौधों को नुकसान भी होता है.
झारखंड के जंगलों में पाये जाने वाले महत्वपूर्ण पेड़-पौधे
झारखंड के जंगलों में कई पेड़-पौधे हैं, जिससे लोगों को रोजगार मिलता है. वे इस प्रकार है.
- साल का पेड़ : झारखंड के जंगलों की पहचान, सबसे ज्यादा करीब 10 करोड़ पेड़.
- तेंदुपत्ता : बीड़ी बनाने में काम आने वाले पत्तों के लिए मशहूर, करीब 3.9 करोड़ पेड़.
- चिरौंजी : मिठाई और पकवानों में इस्तेमाल होने वाले दानों का स्रोत, 1 करोड़ से ज्यादा पेड़.
- जामुन : औषधीय गुणों से भरपूर फल, 3 लाख से अधिक पेड़.
- पलाश : जंगल की शोभा, जिसकी लकड़ी, फूल और गोंद काम आते हैं, करीब 3 लाख पेड़.
- धातकी : औषधियों में काम आने वाली झाड़ी, 3.4 करोड़ से ज्यादा.
- शतावरी : सेहत के लिए उपयोगी लता, करीब 2 करोड़ बेल.
- विदंग : पारंपरिक औषधियों में उपयोग, 2.8 लाख बेल.
- कालमेघ : बुखार और अन्य बीमारियों में काम आने वाली औषधीय जड़ी-बूटी, 55 करोड़ पौधे.
- सर्पगंधा : रक्तचाप और अन्य बीमारियों में उपयोगी जड़ी-बूटी, 4 करोड़ से ज्यादा पौधे.
जंगलों को खतरा, तेजी से फैल रही आक्रामक प्रजातियां
इन उपयोगी पौधों के बीच झारखंड के जंगलों में कुछ विदेशी और आक्रामक प्रजातियां भी तेजी से फैल रही है. इन्हें हटाना मुश्किल है और ये स्थानीय पेड़-पौधों को बढ़ने नहीं देती हैं.
- लैंटाना कैमारा : करीब 1,912 वर्ग किलोमीटर जंगल पर कब्जा (सबसे ज्यादा).
- क्रोमोलाएना ओडोराटा : लगभग 887 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली.
- कैसिया टोरा/सेन्ना टोरा : 92 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र प्रभावित.
- एगेराटम कोनिजोइड्स : 58 वर्ग किलोमीटर में फैली.
- मिकेनिया माइक्रांथा : 41 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर कब्जा.
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