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क्या हरीश रावत भी कांग्रेस छोड़ने की तैयारी में हैं !

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Faisal Anurag दिग्गज कांग्रेसियों की अंतत: नाराजगी आलाकमान से है या राज्य में क्षत्रप बनने की बाधाओं से. जब तक कैप्टन अमरेंदर सिंह पंजाब मे सर्वेसर्वा बने रहे उनके लिए आलाकमान सब कुछ था. लेकिन जैसे ही उनके क्षत्रप बने रहने की राह में चुनौती मिलने लगी, उनकी नाराजगी बढ़ने लगी. तो क्या हरीश रावत भी अमरेंदर सिंह की राह पर चलने वाले हैं. एक ट्वीट में कैप्टन ने हरीश रावत के भविष्य की योजनाओं के लिए शुभकामनाएं दी हैं. दूसरी ओर हरीश रावत भी विश्राम करने की बात कह रहे हैं. चुनावी अभियान के बीच से रावत की नाराजगी प्रदेश के नेताओं से है या राज्य में वे खुली छूट चाह रहे हैं जो उन्हें आलाकमान ने अब तक नहीं दी है उससे है. रावत पिछले कुछ समय से पूरे प्रदेश में यात्राएं कर रहे हैं. उनकी सभाओं में भीड़ भी हो रही है. कई सर्वेक्षणों में वे प्रदेश में सबसे आगे भी हैं. दिसंबर के एक सर्वे में रावत को जहां 33 प्रतिशत लोग मुख्यमंत्री के रूप में देखने की बात कर रहे हैं, वहीं भाजपा के मुख्यमंत्री धामी के लिए यह समर्थन केवल 27 प्रतिशत लोगों ने दिया है. कांग्रेस के आलकमान ने उनकी पसंद के ही नेता को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष भी बनाया है. यहां तक कि प्रदेश के लगभग सभी कांग्रेसी नेताओं ने उनके विरोधी तेवर वाले ट्वीट के बाद कहा हे कि प्रदेश की राजनीति में वे एक मुख्य धुरी हैं और कांग्रेस उन्हें दरकिनाकर करने का सोच भी नहीं सकती है. फिर हरीश रावत की नाराजगी है किससे. यह कांग्रेस के अधिकांश नेता समझ ही नही पा रहे हैं. प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कहा है कि दिल्ली में केंद्रय नेताओं के साथ बातचीत होगी और हरीश रावत की नारजगी दूर की जाएगी. गोदियाल ने यह भी कहा है कि प्रदेश में कुछ समस्याएं हैं जिन्हें हल किया जाना ही चाहिए. जिस बात पर रावत की नाजागी है उससे वे भी परेशान है. यदि गोदियाल की बाते सच हैं तो तय है कि कांग्रेस के अंदरखाने कुछ ऐसा जरूर चल है जिससे उसकी चुनावी संभावनों को नुकसान हो सकता है. उत्तराखंड का जो माहौल है उसमें कांगेस की स्थिति बेहतर मानी जा रही है. लेकिन रावत के ​ट्वीट के तुरत बाद भाजपा के नेताओं ने यह कहना शुरू कर दिया है कि कांग्रेस के अंतरिक से भाजपा राहत महसूस कर रही है. भाजपा ने जिस तरह थोक भाव में उत्तराखंड में मुख्यमंत्री को बदला है उसके बाद से ही उसके राजनैतिक आत्मविश्वास को ले कर सवाल उठने लगे थे. बीबीसी से बात करते हुए उत्तराखंड भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता देवेंद्र भसीन ने कहा "कांग्रेस की अंदरुनी कलह बिल्कुल सामने है. हालात इतने बिगड़ गए हैं कि हरीश रावत ने प्रदेश प्रभारी देवेंद्र यादव को भी चुनौती दे डाली थी. जो सीधे-सीधे केंद्रीय नेतृत्व को चुनौती है. कांग्रेस चुनाव से पहले ही चुनाव हार गयी है." देवेंद्र भसीन कहते हैं "हरीश रावत ने एक समय एनडी तिवारी के ख़िलाफ़ भी आंदोलन छेड़ा था. अगर वे पार्टी के नेताओं को साथ लेकर चलते तो कांग्रेस से लोग भाजपा में नहीं आते. उनका एक ही नारा रहता है- न खाता न बही, जो हरीश रावत कहें वही सही." हरीश रावत कांग्रेस के भीतर उन बड़े नेताओं में एक हैं जिनके साथ पूरी पार्टी खड़ी रही है. यहां तक कि तिवारी हों या फिर विजय बहुगुणा हो फिर हरक सिंह रावत सबने हरीश रावत के कारण ही कांग्रेस छोड़ा. दोनों ही इस समय भारतीय जनता पार्टी में हैं. विजय बहुगुणा को तो भाजपा ने मुख्यमंत्री भी बनाया था. हरीश रावत को राज्य का मुख्यमंत्री और केंद्र में मंत्री भी बनाया गया. यहां तक कि उन्हें पार्टी में भी कई महत्वूपूर्ण जिम्मेदारी दी गयी. पंजाब के वे प्रभारी भी थे. उसी समय कैप्टन सिद्धू का विवाद गहराया. अमरेंदर सिंह कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बना चुके हैं और भाजपा के साथ गठबंधन भी. जाहिर है जिन भी राज्यों में कांग्रेस सत्ता में है या विरोध में कहीं भी वह आंतरिक संकट से मुक्त नहीं दिख रही है. राजस्थान में जरूर गहलोत और सचिन पायलट के बीच तकरार को कम करने में कामयाबी मिली है. पायलट समर्थकों को फिर से मंत्री बनाया गया है लेकिन इससे विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हो पाया है. मध्यप्रदेश में तो सिंधिया भाजपा में जा चुके हैं, लेकिन कमलनाथ बनाम दिग्विजय का विवाद जारी है. इन तमाम हालातों के लिए ग्रुप 23 पहले से ही आलाकमान को दोषी ठहराता रहा है. जी 23 के एक और सदस्य गुलाम नबी आजाद जिस तरह कश्मीर में काम कर रहे हैं उसका साफ संदेश है कि वे भी देरसबेर पार्टी को अलविदा कर परोक्ष या प्रत्यक्ष तरीके से नरेंद्र मोदी के साथ जाने की योजना बना रहे हैं. कांग्रेस आलाकमान के प्रिय रहे आजाद राज्यसभा में फिर नहीं भेजे जाने के बाद से ही नाराज हैं. राज्यसभा में जिस दिन उनकी विदाई हो रही थी प्रधानमंत्री मोदी के द्वारा उनके लिए जो बाते कहीं गयी थी ,उसके दूरगामी अर्थ अब साफ हो रहे हैं. मुख्य सवाल तो यही है कि एक ओर जहां ममता बनर्जी कांग्रेस की विपक्ष की आथरिटी को चुनौती दे रही हैं, वहीं कांग्रेस के भीतर से ऐसा नेतृत्व दृढ़ता से नहीं दिख रहा है जिससे कहा जा सके कि कांग्रेस का आलाकमान हालात को संभालने के लिए तैयार है. मोदी के खिलाफ जमकर बोलने वाले राहुल गांधी के अनिर्णय की स्थिति अब तक दूर नहीं हुयी है और प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश तक सीमित कर लिया है. हालांकि प्रियंका ने कांग्रेस को फिर से जीवित कर दिया है और उत्तर प्रदेश में चुनावी लाभ हानि से परे यदि बात की जाए तो एक सशक्त विपक्ष की उसकी भूमिका का असर देखा जा सकता है. आलाकमान तो सख्त निर्णय लेने की हालत में आना होगा. वरना कांग्रेस अपने दिग्गजों को खो देगी. [wpse_comments_template]

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