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सिस्टम का फेल्योर है या 2018 में मिशनरीज ऑफ चैरिटी को बदनाम किया गया था?

साल 2018 में जेल रोड स्थित निर्मल हृदय आश्रम के खिलाफ कार्रवाई करती रांची पुलिस.

मिशनरीज ऑफ चैरिटी द्वारा संचालित निर्मल हृदय आश्रम की सिस्टर कांसिलिया बाखला और अनिमा इंदवार को अदालत ने बरी कर दिया है. चाइल्ड वेलफेयर कमेटी (सीडब्ल्यूसी) की शिकायत पर इनके खिलाफ एएचटीयू थाने में नवजात बच्चों की खरीद-बिक्री का आरोप लगाते हुए मामला दर्ज किया गया था. कांसिलिया बाखला और अनिमा इंदवार को सलाखों के पीछे डाल दिया गया था. मीडिया ट्रायल चला।.उन्हें तत्काल जमानत भी नहीं मिली. अब आठ साल बाद पता चल रहा है कि पुलिस अदालत में आरोपों को साबित ही नहीं कर सकी और वो बरी हो गए.

 

निर्मल हृदय आश्रम दशकों से काम कर रहा है. आश्रम में बच्चों को रखा जाता है, उनका पालन-पोषण किया जाता है. हर धर्म और तबके के लोगों में इस आश्रम के प्रति सम्मान का भाव रहा है. लेकिन ऐसा क्या हुआ कि वर्ष 2018 में इसी संस्था को बच्चों की खरीद-बिक्री जैसे गंभीर आरोपों का सामना करना पड़ा? संस्था की बदनामी हुई, उसकी साख को नुकसान पहुंचा. अब अदालत ने संबंधित लोगों को निर्दोष माना है.

 

मुझे याद है, यह वही समय था जब राज्य में भाजपा की सरकार थी और रघुवर दास मुख्यमंत्री थे. खुफिया विभाग में तैनात एक प्रभावशाली अधिकारी के इशारे पर रिपोर्टें तैयार की जाती थीं. उन रिपोर्टों की प्रतियां मीडिया संस्थानों तक पहुंचाई जाती थीं और पत्रकारों को उपलब्ध कराई जाती थीं. इनमें एक खास धर्म से जुड़ी संस्थाओं के खिलाफ कथित जांच रिपोर्टें होती थीं. जांच अक्सर सतही और एकतरफा होती थी. जिसका कोई कानूनी वैल्यू नहीं. ऐसा लगता था कि एक विशेष माहौल तैयार किया जा रहा है. इसी दौरान सीडब्ल्यूसी, एससी-एसटी आयोग और अन्य संस्थानों के माध्यम से ईसाई मिशनरियों से जुड़े संस्थानों को निशाना बनाया जा रहा था.

 

तब पूरा सिस्टम उस अधिकारी की हनक से चलती थी. सरकार बदलने के बाद फिर से वही व्यक्ति विभाग में महत्वपूर्ण बन गया. फिर से उसकी हनक चलने लगी. इसका खामियाजा सरकार और पुलिस विभाग को भुगतना पड़ा. लेकिन क्या किसी एक को महत्वपूर्ण बना देने का सिलसिला कभी थमेगा, इस पर सबको संदेह है. एक बड़ा सवा यह भी है कि ऐसा क्या होता है खास में, वह ऐसा क्या करता है कि कोई एक व्यक्ति, अफसर सिस्टम में सबसे पावरफुल हो जाता है. 

 

किसी भी विभाग में, खासकर पुलिस जैसे विभाग में, जब किसी एक अधिकारी के हाथों में अत्यधिक शक्ति केंद्रित हो जाती है, तो उसके बेकाबू होने का खतरा बढ़ जाता है. सत्ता को खुश करने की कोशिश में वह ऐसी-ऐसी कहानियों को पुलिस केस का रूप दे देता है, जो अदालत में टिक नहीं पातीं। पूर्व आईपीएस अभयानंद ने पुलिस विभाग का नाम लिए बिना कहा था, “जब किसी समाज में एक व्यक्ति का महत्व अत्यधिक बढ़ जाता है, तो उस समाज का पतन शुरू हो जाता है. अपने चारों ओर नजर डालिए, यह सत्य आपको दिखाई देगा.”

 

तो क्या निर्मल हृदय आश्रम के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ? क्या किसी एक व्यक्ति की बढ़ी हुई ताकत के कारण इस संस्था को बदनाम किया गया और इसके लिए काम करने वाली सिस्टर कांसिलिया बाखला और अनिमा इंदवार को जेल भेज दिया गया? सच क्या था, यह शायद कभी पूरी तरह सामने नहीं आएगा.

 

इस तरह का मामला पहला नहीं है. ऐसे मामले तभी रुकेंगे, जब सरकारें सिस्टम के जवाबदेह अधिकारियों पर कार्रवाई करेंगी. लेकिन कार्रवाई करेगा कौन? सरकारें भी तो अक्सर इसी खेल का हिस्सा दिखाई देती हैं. चाहें केंद्र की सरकार हो या राज्यों की. आप चाहें तो एनडीटीवी के मामले को देख सकते हैं या फिर न्यूजक्लिक और उसके संपादक प्रबीर पुरकायस्थ के मामले को. सरकार के इशारे पर इन्हें गिरफ्तार किया गया और बाद में अदालतों में इन्हें बरी कर दिया. उनके वक्त को कौन लौटाएगा? उनके कष्ट के लिए कौन जिम्मेदार है? जिम्मेदारों को सजा मिलेगी भी क्या कभी? क्या अफसर इससे सीखेंगे कुछ?

 

बहरहाल, रांची के निर्मल हृदय आश्रम के मामले में यह सवाल तो उठता ही है कि यह सिस्टम का फेल्योर है या फिर 2018 में मिशनरीज ऑफ चैरिटी को बदनाम करने की कोई साजिश थी?

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