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Orgasm का chapter उनके सामने खोलना बेमानी है, जो खुद को उस वक्त भी cover रखते हैं, जब कत्ल कर रहे होते हैं

Vinay Bharat कई दिनों से देख रहा था, महिलाओं की अगुआई में orgasm पर बात हो रही है. मैं ये मानता हूं, 9 th- 10th के बच्चों की किताबों में sex education पर chapters के inclusion के बाद ये एक सबसे बड़ा" धक-से! - वाला" मामला बन गया है. Orgasm तो sex का climax है. यहां तो हम Sex के S पर बात तक नहीं करना चाहते. इस विषय पर पुरुषों की एक टोली है, जो वात्स्यायन के भारत में इस विषय पर किंकर्तव्यविमूढ़ दिख रहे कि आखिर इस शालीन देश में इस विषय पर बात करने की जरूरत क्या है? भाईसाहब, हमने बगैर बात किए, result दिया है. भला यूं ही आज हम 138 करोड़ के साथ विश्व के सबसे बड़े democratic power हैं! आप ही बोलिये, आखिर इतने आए कहां से! हम बात नहीं करते, result देते हैं. देखिए, हम कितने सभ्य हैं. अरे, भाई, हम इतने सीधे होते, जितने सीधे दिखते हैं. तो सरकार को मेरे दरवाजे पर, जब हम काम में लीन थे, आकर ठकठकाना नहीं पड़ता. और, ट्रैफिक नुमा लाल तिकोना नहीं चिपकाना पड़ता. लेकिन सरकार भी बेचारी लाचार. उसे भी लाज- हया छोड़कर हमारा दरवाजा खटखटा कर बोलना पड़ता है- "बस.. बस, हम दो ,हमारे दो.” सरकार को बोलना पड़ता है - `रे भद्र मानुष, " बिंदास बोल कंडोम !"( ये सरकारी आयोजन भी करना पड़ा है देश में). ये अलग बात है कि एक रिर्सच के अनुसार, भारत का 30% बच्चा unwanted है. मतलब, पति-पत्नी को जरूरत नहीं थी बच्चे की. जरूरत थी sex की. चूंकि भारत में अधिकांश couple euphemism में बात करता है. नैतिक चुनरी के पर्दे में बात करता है. जब sex चाहिए तो कहता है - "मुझे बच्चे चाहिए". वे बच्चे पर बात करता है, Sex पर बात नहीं करता. बिल्कुल भगवान की सूरत बच्चे पर बात करता है. और, चूंकि उसे भगवान चाहिए, वो मेहनत करते जाता है. अब औरतें जो बात कर रही हैं, करने दीजिए. क्योंकि बच्चे दानी उनके पास है. हमारे पास नहीं. शरीर उनका टूटता है. कमरे में काली स्याह-सी रात का माहौल बनाकर, जैसे लाश पर कफ़न ओढ़ाते हैं, वैसे अपनी औरतों को लाश बनाकर, कपड़े ओढ़ा कर जब हम ये सब करते हैं तो हम अपने नैतिक मूल्यों पर शर्म का पर्दा नहीं, शर्म और बेहयाई का कफ़न ही डालते हैं. ऐसे में हम दूसरी सुबह संत बनकर कमरे से बाहर नहीं आते. एक अनचाहा पिता ही बनकर बाहर आते हैं. ये जो आवाज़ बुलंद हो रहा है, उन्हीं लाश की मानिंद बिस्तर पर बिछी औरतों की रूहें हैं, जिनमें प्राण सिर्फ हमारे बीज भराई से आता है, माना जाता रहा. ये देश इतना सभ्य है कि आप पूछिये कि आपको किसी से प्रेम नहीं है, फिर भी शादी क्यों कर रहे? उनका जवाब ये नहीं होगा, कि sex के लिए. उनका जवाब होगा, बच्चे के लिए. इस देश की सबसे बड़ी सेवा होगी कि आपको जो करना है कीजिये, लेकिन भगवान के नाम पर बच्चों की खेती मत कीजिये. अगर हमें orgasm पर बात करने वाली महिलाएं नहीं चाहिए तो हमें भी अब अपने घर में तीसरा नहीं चाहिए. चीन से बस एक कदम पीछे हैं. बहरहाल, orgasm का chapter उनके सामने खोलना बेमानी ही है, जो खुद को उस वक्त भी cover किए रहते हैं, जब कत्ल कर रहे होते हैं. जो orgasm पर बात करने वाली महिलाओं को चरित्रहीन बोल रहा है, उसके लिए बुद्ध की nudity भी nakedness है. vulgar है. हालांकि भारत में अभी मूल लड़ाई पेट की है. ये स्वीकार करना है. पेट के दो इंच के नीचे की लड़ाई को शरीर से उठाकर मन तक लाकर afford करने में अभी एक लंबी यात्रा है. शायद उतनी ही लंबी जितनी सती न होने वाली माताओं को खुद से चरित्रहीन होने के दाग को धुलने में लगाना पड़ा. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]  

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