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नई शिक्षा नीति लागू करने में काफी मशक्कत करनी पड़ सकती है : संजय प्रसाद

Garhwa: नयी शिक्षा नीति में बदलाव किये गये हैं. शिक्षाविद मंथन कर रहे हैं. शिक्षाविद विचार रख रहे हैं. इस पर गढ़वा के शिक्षाविद संजय प्रसाद ने अपने विचार रखे हैं. उनका कहना है कि नीति आयी है, तो शर्तिया कोई न कोई लाभ विद्यार्थियों को होगा. नीति जमीन पर उतरेगी तो फर्क दिखेगा. आखिर सात सालों की सत्ता और सत्तर साल विपक्ष में रहते हुए, कोई भी इस काम को बिना मोटिव या फायदे के नहीं किया होगा. [caption id="attachment_352268" align="aligncenter" width="600"]https://lagatar.in/wp-content/uploads/2022/07/4-6.jpg"

alt="" width="600" height="400" /> संजय प्रसाद[/caption] यह उनकी तासीर में नहीं है.  सोच में नहीं है. भारत के नये युग में नये माइंड, जनकल्याण का सोच पनप सकता है. सिर्फ उसका अभिनय कर सकता है और करता आ रहा है. खामियों से भरी योजना आयोग खत्म हुई, तो ऑर्गनाइज्ड थिंकिंग की रीढ़ भी खत्म होगी. इम्पलीमेंटेशन के दौरान नये-नये प्रयोग से भारतीय जनता को फायदा और नुकसान लागू कराने के बाद पता चल पाएगा. नई शिक्षा नीति को लागू करने में सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ सकती है. सबसे प्रमुख समस्याओं में शामिल है. पाठ्यक्रम किस प्रकार बदला जाएगा? क्या नया पाठ्यक्रम 21वीं सदी में ज्ञान कौशल मुहैया कराने में सक्षम होगा. शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने का क्या फार्मूला होगा? ऐसी कई सवाल हैं, जिसका जवाब बाद में मिलेगे. पांचवी तक का स्थानीय भाषा में पढ़ाई करवाना भी आसान कार्य नहीं दिख रहा है. मान लीजिए कोई प्राथमिक का बच्चा गुजरात में रहता है, जहां गुजराती स्थानीय भाषा है. वो किसी कारणवश गुजरात को छोड़कर महाराष्ट्र पहुंच जाता है. जहां स्थानीय भाषा मराठी है. तो इसमें शिक्षा के माध्यम में किस प्रकार का सामंजस्य बैठाया जाएगा? फिर वह मराठी या गुजराती किसमें पड़ेगा इसके ऊपर भी संशय है. अगर छात्र पढ़ेगा भी तो एक टीचर कितनी भाषाएं पढ़ा पायेगा? वोकेशनल कोर्सेज को लागू करने का प्रावधान किया गया है. अब यहां पर भी एक पूर्ण संभावना है कि जो प्राइवेट स्कूल है, छोटी-मोटी सुविधा के लिए भारी शुल्क वसूल करते हैं. तो वह वोकेशनल कोर्स के लिए भी मनमानी फीस चार्ज कर सकते हैं. छात्र को कक्षा 9 से विषय चुनने होंगे. इन विषयों का चुनाव करने के लिए कुछ मापदंड तय करने होंगे. ऐसा हो सकता है कि कुछ विषयों के पूल तैयार कर लिया जाए और उस पूल में से ही छात्र विषयों का चुनाव करें. हालांकि ऐसी भी संभावना है कि कई विद्यालयों में संसाधनों की अनुपलब्धता से बस ये कागजों में सिमट कर रह जाए. झारखंड सरकार के पास संसाधनों का घोर अभाव है. इस अभावग्रस्त राज्य में जहां लाखों शिक्षकों के पद रिक्त पड़े हुए हैं. 20 वर्षों में सरकार ने इन पदों को भर पाने में नाकाम रही है. जितनी भी बहाली की गई है, राज्य के बाहर के लोग यहां आकर लूट रहे हैं. यहां के लोग उन शिक्षा विधि से कोसों दूर हैं. मजदूरी, भूखमरी और पलायन यहां की नीति बनी हुई है. सुखाड़ रूपी भूखंड से यहां के किसानों की स्थिति दयनीय है. इसके बीच इन बच्चों को नई शिक्षा शिक्षा नीति का लाभ कितना मिल पाएगा, यह मेरे समझ से परे है. ऐसी स्थिति में व्यवसायिक शिक्षा नीति अगर लागू होती है, तो इनके लिए जो ट्रेड और ट्रेंड टीचर की आवश्यकता है, वह समस्त विभागों में कहीं नजर नहीं आ रहा है. देखा जाय तो अभी झारखंड में दुमका और पलामू मेडिकल कॉलेज में इसलिए कुछ वर्षों में छात्रों का नामांकन नहीं लिया गया है, क्योंकि वहां पर योग्य चिकित्सक नहीं मिल पा रहे थे. ऐसी स्थिति में सरकार को पहले संसाधनों के जुटाना होगा. उसके लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण करना होगा. तब जाकर नई शिक्षा नीति कि यह कल्पना साकार हो पाएगी. बहरहाल विद्यालयों में शिक्षकों के अभाव में शिक्षण कार्य करते शिक्षक देखे जा सकते हैं. राज्य में वैसे 80% विद्यालय हैं, जहां पर शिक्षक के अभाव में बच्चे विद्यालय में जाकर समय काट रहे हैं. योग्य शिक्षकों का विद्यालयों में घोर अभाव है. केवल नीति निर्धारण कर देने से ना तो बच्चों का विकास होगा और ना ही राष्ट्रनिर्माण कर पाएंगे. [wpse_comments_template]

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