
Shailendra Mahto
यदि झारखंड पुलिस एसोसिएशन एक दारोगा के पक्ष में खड़ा होगी तो कल ऐसा ना हो कि जयराम महतो के समर्थन में पूरा झारखंड खड़ा हो जाएगा? मैं 'झारखंड की समरगाथा' पुस्तक से दो पंक्ति उद्धृत कर रहा हूं...
"अंधेरों से लड़कर, कांटों पर चलकर बना है झारखंड,
घर-घर में रोशनी पहुंचाने को, लड़ना अभी बाकी है,
चलना अभी बाकी है...."
यह कविता मैं इस पीढ़ी के लोगों के लिए बोल रहा हूं.
मैं एक झारखंड आंदोलनकारी हूं. मुझे भी एक बार नहीं कई बार जेल जाना पड़ा है. झारखंड राज्य बनाने का सूत्रधार हूं. मैं जानता हूं, पुलिस का रवैया क्या होता है? जब मैं अपनी जिंदगी के 20 साल की उम्र से झारखंड आंदोलन में कदम रखा तो उस समय बिहार पुलिस थी. हम झारखंड आंदोलनकारी बिहार पुलिस से आंख मिचौली यानी छुपा- छुपी का खेला करते थे. पकड़े गए तो गाली और पिटाई से स्वागत होती थी. उस समय बिहार पुलिस एसोसिएशन हम झारखंड आंदोलनकारियों के पक्ष में कभी कुछ नहीं बोलती थी. क्योंकि पुलिस एसोसिएशन में झारखंडी होते भी नहीं थे.
आज झारखंड राज्य में एक जनप्रतिनिधि विधायक जयराम महतो बनाम एक थाना प्रभारी/दारोगा के बीच में यदि कुछ कहा सुनी हो गई तो इसमें इतना हाय तौबा क्यों? उसकी गिरफ्तारी क्यों? झारखंड पुलिस एसोसिएशन को बीच में आने की क्या जरूरत है?
झारखंड पुलिस एसोसिएशन को मैं बतलाना चाहता हूं कि जनप्रतिनिधि और पुलिस एक दूसरे के सौतन है. कहा-सुनी होती रहती है. यह अकाट्य सत्य है. यदि आज आप दारोगा के पक्ष में खड़े होंगे तो कल ऐसा ना हो जाए कि जयराम महतो के समर्थन में पूरा झारखंड खड़ा हो जाएगा?
केस-मुकदमा से कोई भी क्रांतिकारी राजनीतिक आदमी डरता नहीं बल्कि उससे जूझता है. यह आप समझ कर चलें कि दारोगा का पद कोई भारी भरकम चीज नहीं है. झारखंड पुलिस एसोसिएशन आप अपना कर्तव्य निभाएं और निष्पक्ष होकर प्रदेश का कानून व्यवस्था संभालने का काम करें. जयराम महतो ने ऐसा कोई काम नहीं किया जिससे वह माफी मांगे और उसकी गिरफ्तारी हो?
मैं इस नई पीढ़ी के बच्चों को एक दर्दनाक घटना बताना चाहता हूं, जो मुझे बार-बार मेरे दिमाग को विचलित करते रहती है. वह घटना है 1990 का, जब झारखंड आंदोलन चल रहा था. मेरे झारखंड आंदोलनकारी साथी रामदास सोरेन, दुलाल भूईंया, गोपाल बनर्जी, प्रमोद लाल को गिरफ्तार कर सीतारामडेरा थाना (जमशेदपुर) में उल्टा टांग करके पिटाई की जा रही थी. उन्हें छुड़ाने के लिए मैं जबरदस्ती थाना में घुस गया. उस समय मैं सांसद था. मैने वहां का नजारा देखा, जमशेदपुर के विभिन्न थाना के चार दारोगा को बुलाया गया था. थाना में एक भी झारखंडी पुलिस नहीं था. सभी के सभी बिहार के रहने वाले थे, जिन्हें झारखंड नाम से घृणा थी. वे झारखंड शब्द सुनना नहीं चाहते थे.
उल्टा टांग कर जब उन्हें डंडा से पिटाई की जा रही थी तो दारोगा कहते थे- झारखंड मांगोगे... बोलो साले... झारखंड मांगोगे, जंगली कहीं का... यही उनके शब्द होते थे. मां- बहन की तो अलग से गालियां पड़ती थी.
मेरे वहां पहुंचने पर पिटाई बंद हो गई और थाने में जो भी पुलिस पदाधिकारी थे, वे सब भाग खड़े हुए. एक घंटे के बाद फिर थाना प्रभारी लौट के आया और आंदोलनकारी साथियों को जेल भेजने की प्रक्रिया पूरी की. दारोगा को मैंने खरी-खरी सुनाया जरुर लेकिन मैं एक जनप्रतिनिधि ( सांसद) होने के कारण वह सर - सर ही कहते रहा.
झारखंड राज्य बनने के बाद दुलाल भुईयां और रामदास सोरेन विधायक बने, झारखंड राज्य के मंत्री भी बने. यह तो झारखंड राज्य का दुर्भाग्य है कि एक माननीय जनप्रतिनिधि जयराम महतो को थाना प्रभारी गाली-गलौज करें और बाकी माननीय लोग चुप क्यों? आज झारखंड में प्रजातांत्रिक मूल्यों का खुलेआम बेइज्जत और हनन हो रहा है. गाली-गलोज करना झारखंड के रीति-रिवाज, सभ्यता, जीवन शैली और परंपरा में नहीं रहा है.
सर्वविदित है कि उपनिवेशवाद, शोषण, दमन, अन्याय के खिलाफ झारखंड राज्य का निर्माण हुआ. झारखंड बनकर 26 साल हो गए. अब लगता है कि शोषक, दमनकारी लोग प्रशासन में रहकर एक झारखंडी माननीय विधायक जयराम महतो पर अपना फन उठा रहे हैं. यह झारखंडियों के लिए गंभीर चिंता का विषय है. जागो भाई जागो.
मैं माननीय मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को जानकारी देना चाहता हूं कि 1983 में जुगसलाई के तत्कालीन विधायक तुलसी रजक पर पश्चिम सिंहभूम जिला के मनोहरपुर थाना प्रभारी ने अभद्र व्यवहार किया था, तो उस समय के बिहार मुख्यमंत्री ने तत्काल कार्रवाई करते हुए थाना प्रभारी को निलंबित किया था. मैं झारखंड सरकार से मांग करता हूं कि ऐसे थाना प्रभारी पर अविलंब कार्रवाई करें.
डिस्क्लेमरः लेखक झारखंड आंदोलनकारी और पूर्व सांसद हैं और यह टिप्पणी उनके फेसबुक एकाउंट से साभार लिया गया है.