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जमशेदपुर : निरपेक्ष व्यक्ति सदैव शांत एवं संतुष्ट रहता है : निर्विशेषानन्द तीर्थ

Jamshedpur (Anand Mishra) : जमशेदपुर के सर्किट हाउस एरिया स्थित आत्मीय वैभव विकास केन्द्र में चल रहे संध्याकालीन प्रवचन के अंतिम दिन शनिवार को स्वामी निर्विशेषानन्द तीर्थ ने बताया कि वास्तव में हम किसी भी कार्य को नहीं करते हैं. संपूर्ण सृष्टि तीन प्रकार के गुणों से निर्मित है. हमारा शरीर, इन्द्रियां, मन, बुद्धि और अहंकार सभी प्रकृति की रचना है. हम सभी क्रियाओं के साक्षी हैं. इसलिए भगवद्गीता के चौदहवें अध्याय गुणत्रय विभाग योग में तीनों गुण एवं उसके प्रभावों का वर्णन किया गया है। ये तीन गुण हैं -सत्व, रजस एवं तमस. सत्व गुण ज्ञान में लगाता है. शास्त्रों के अध्ययन एवं ध्यान आदि के सुख की ओर प्रेरित करता है. इसी प्रकार रजो गुण लोभ उत्पन्न करता है. रजोगुण की अधिकता वाला व्यक्ति इच्छाओं की पूर्ति के सदैव क्रियाशील रहता है. उसमें भेद बुद्धि होती है. तमोगुण के कारण आलस, निद्रा एवं मोह उत्पन्न होता है. इसे भी पढ़ें : जमशेदपुर">https://lagatar.in/jamshedpur-13-panchayats-of-the-district-are-without-buildings-running-in-rented-buildings/">जमशेदपुर

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प्रत्येक व्यक्ति जन्म के साथ ही तीनों गुणों के प्रभाव में रहता है. स्वामी जी ने कहा कि ऐसा नहीं है कि तामसिक या राजसिक प्रवृत्ति का व्यक्ति सात्विक नहीं बन सकता. तमो गुण की अधिकता को हम रजोगुण के द्वारा कम कर सकते हैं. इसी प्रकार रजोगुण के प्रभाव को हम सतोगुण के द्वारा कम कर सकते हैं. तमोगुण को क्रियाशीलता के द्वारा कम किया जा सकता है. इसी प्रकार रजोगुण के प्रभाव को कम करने के लिए सात्विक आहार, सात्विक पुस्तकों को पढ़ना एवं सात्विक लोगों की संगति में रहना चाहिए. इस सृष्टि में सब कुछ तीन गुणों से ही बना है, किन्तु हमें इसके बंधन से मुक्त होने का अभ्यास करना चाहिए. इसे भी पढ़ें  : मुठभेड़">https://lagatar.in/comrades-ran-away-leaving-naxalite-injured-in-encounter-angels-became-security-forces/">मुठभेड़

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उन्होंने कहा कि जब किसी व्यक्ति में सात्विक गुण बढ़ जाता है तो इसके कारण भी बन्धन होता है. वह सात्विकता के बंधनों में बंध जाता है. इसलिए अंततः सात्विक गुणों के बंधन से निकलना चाहिए. इसके लिए शरणागति आवश्यक है. शरणागति के लिए निरपेक्षता आवश्यक है. निरपेक्षता का अर्थ है किसी से भी, कभी भी कोई अपेक्षा नहीं रखना. इस प्रकार का निरपेक्ष व्यक्ति सदैव शान्त एवं संतुष्ट रहता है. भागवतम् में श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो अपेक्षाओं से दूर है, सदा संतुष्ट है एवं किसी से भी वैर-भाव नहीं रखता है, मैं उसके चरणों की धूली के लिए उसके पीछे -पीछे दौड़ता हूं. इस प्रकार हम इन विचारों को बार-बार सुनकर, पढ़कर और इनके ऊपर विचार करके अपने जीवन में अपनाते हैं तो हम जीवन को श्रेष्ठ बना सकते हैं. इस प्रकार साधना शिविरम् के अन्तर्गत छह दिवसीय प्रवचन श्रृंखला का आज संपन्न हुई. आगामी 17 अक्टूबर को कॉलेज विद्यार्थियों के लिए कार्यक्रम का आयोजन किया गया है. [wpse_comments_template]

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