Koushlendra Batohi
Jamshedpur : ऐसे तो कहा जाता है कि भारतवर्ष उत्सवों एवं पर्व-त्योहारों का देश है. उसमें भी बिहार एवं इससे लगे हुए प्रदेशों में छठ पर्व का अपना विशेष महत्व है. छठ पर्व उत्साह एवं उपासना का उत्सव है. यह संस्कृति, कला, गीत, संगीत, हर्ष एवं परंपराओं का अद्भुत संगम है. यह एक सामूहिकता एवं सामाजिकता का जीता-जागता उदाहरण है. जितने भी पर्व-त्योहार मुख्यतः मनाए जाते हैं, उनमें छठ में उपासना का एक अलग तरीका है. यह पूर्णतः प्रकृति से जुड़ा हुआ पर्व है.
नई फसलों के आने से होती है शुरुआत
चार दिवसीय यह उपासना दीपावली के अगले सप्ताह से शुरू होती है. जब किसान के खेत की पहली फसल आनी प्रारंभ होती है यह पर्व शुरू होता है. किसान आह्लादित रहते हैं. गन्ने का मौसम शुरू होता है एवं यह किसान की आर्थिक संपन्नता का द्योतक है. उनके खून-पसीने से सींची हुई फसल, ऊर्जा के स्वरूप सूर्य की उपासना में लगती है. एक तरफ से सूर्य को मानव जीवन को प्रज्वलित करने के लिए, किसान की उम्मीदों को जगाने के लिए उन्हें धन्यवाद देने का का पर्व है. आप इस पर्व में प्रयोग होने वाले सामग्री पर ध्यान देंगे तो इसकी महत्ता की एवं प्रकृति से जुड़ाव का एहसास होगा.
मानव जीवन के अस्तित्व का प्रतीक है पर्व
नदी के तट पर उसके बहते हुए जल में खड़ा होकर सूर्य की आराधना करते हुए अर्घ्य देना मानव जीवन के अस्तित्व का प्रतीक है. नदी जीवन के प्रवाह का प्रतीक है. मानव रूपी जीवन भी नदी की धारा की तरह समस्त अच्छे बुरे अनुभवों को समाहित करते हुए चलता है और इस धारा के बीच में खड़ा होकर सूर्य की रोशनी का इंतजार हर एक अंधकार के बाद उजाले का प्रतीक है. सूर्य सत्य हैं. हम इनके डूबते हुए स्वरूप की भी अराधना करते हैं, जो अनूठा है. डूबता सूर्य मानवता है. कितना भी इंसान उजाले में हो, प्रभावशाली हो, उसका डूबना सत्य है और उसके अस्त होने पर उसके द्वारा किया गया सहयोग, उपकार को याद करना, धन्यवाद का प्रतिबिंब है.
परमात्मा से स्वयं के सीधे जुड़ाव का प्रतीक
यह सफाई का पर्व है, पवित्रता की उपासना है. इस समय ऋतु परिवर्तन का समय होता है. ठंड आने वाली होती है इसलिए नदी, सामाजिक स्थल, रास्ते, पगडंडियां, तालाब समस्त जल स्रोतों की सफाई सामूहिक रूप से समाज द्वारा की जाती है. यह पर्व की पवित्रता के साथ-साथ आने वाले मौसम में जीवन जीने के तौर-तरीकों को आसान करता है. अगर हम सनातन धर्म के और त्योहारों को तुलनात्मक दृष्टि से देखेंगे तो छठ एक ऐसा त्योहार है जिसमें कोई अलग से विशेष पूजा पद्धति नहीं है. कोई मूर्ति नहीं है, किसी पुरोहित की जरूरत नहीं है. यह परमात्मा से स्वयं के सीधे जुड़ाव का प्रतीक है.
यह भी वोकल फॉर लोकल की तरह
यह भी वोकल फॉर लोकल की तरह ही है. इस उपासना के प्रसाद ठेकुआ सबके यहां बनता है. यह समानता का द्योतक है. गाय का घी, गुड़, आटा, चावल की खीर सब किसान के यहां पैदावार से सीधे प्रयोग होने वाली वस्तुएं हैं और यह गांव के स्तर पर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने से सहायक होती हैं. पूजन सामग्री से भी आप उन समस्त चीजों को पायेंगे जो स्थानीय स्तर पर उत्पन्न होती हैं और हमारे सामाजिक बनावट में कहीं न कहीं सबकी भागीदारी को निश्चित करती है. यह पूर्णत: गांव, शहर की आर्थिक गतिविधियों के साथ साथ सामाजिकता के स्तर पर सामूहिकता का आह्वान करता है. बांस के काम करने वाले लोग समाज के स्तर पर सबसे निचले पायदान पर होते हैं परन्तु अर्घ्य देने वाला सूप वही बनाते हैं और यह त्योहार उनके लिए उल्लास, उमंग लेकर आता है.
समाज के स्तर पर जागृति का संदेश
अगर हम परिवार के स्तर पर देखेंगे तो स्त्री, पुरुष, बच्चे सबकी कहीं न कहीं सहभागिता होती है और यह जोड़ने बहुत बड़ा संदेश होता है. यह समाज के आत्मनिर्भरता का भी प्रतीक है. परिवार के साथ-साथ हर स्तर पर आत्मनिर्भरता का संकल्प है. त्योहार के रूप में समाज को सामाजिकता के साथ-साथ सामूहिक रूप से आत्मनिर्भरता एवं व्यक्ति के अनवरत विकास का प्रतीक है. छठ प्रकृति की आराधना का एक ऐसा पर्व है जो समाज की जीवंतता पर आधारित होते हुए व्यक्ति को सामूहिकता की तरफ ले जाता हैं. (
लेखक एनआईटी जमशेदपुर में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं) [wpse_comments_template]
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