सुमो ने नीतीश से पूछा- दागी मंत्रियों से कैसे आएगा सुशासन?
सवा दो घंटे पहले पहुंच गये थे राष्ट्रपति भवन
राष्ट्रपति जी को भेंट करने के लिए प्रस्तावित सिदो मुर्मू के फ़ोटो चित्र को हमारे आग्रह पर कला मंदिर,बिस्टुपुर, जमशेदपुर के हेड एवं पुराने मित्र अमिताभ घोष के सहयोग से अनुप कुमार सिंह, अस्सिस्टेंट प्रोफेसर, अरका जैन विश्वविद्यालय ने बनाया था. 26 अगस्त 2022 को हम चार लोग गेट नंबर 38 से करीब 3.30 बजे राष्ट्रपति भवन को प्रवेश कर गए. भवन के अंदर स्वागत कक्ष में करीब 3.45 बजे रिपोर्ट किया.फोटो शूट का भी मिला मौका
काफी समय बाकी होने के कारण चारों व्यक्ति सिदो मुर्मू के फोटो- फ्रेम के साथ राष्ट्रपति भवन के फ्रंट और इधर उधर फोटो शूट एवं वीडियोग्राफी की. मुलाकात कक्ष के पास इंतजार के लिए संध्या 4.35 को चायपान के लिए बैठाए गए. आखिर संध्या 5.30 बजे मुलाकात कक्ष में दाखिल हुए. महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने बड़ी नम्रता, आत्मीयता के साथ मुस्कुराते हुए हम लोगों का स्वागत किया. जोहार किया. हम लोगों ने भी उत्साह के साथ जोहार किया. गुलदस्ता देते हुए उनको बधाई और शुभकामनाएं दी. 6 पत्रों का संयुक्त ज्ञापन-पत्र और सेंगेल पुस्तक तथा संताली भाषा विजय का टर्निंग प्वाइंट पुस्तक भी भेंट किया. महामहिम के दाएं-बाएं खड़े होकर गुलदस्ता के साथ फोटो खिंचवाया. तत्पश्चात संताल हूल के महानायक सिदो मुर्मू का फोटो फ्रेम देते हुए दूसरा फोटो उनके साथ खिंचवाया. तत्पश्चात जैसे ही ज्योति का परिचय कराया महामहिम ने कहा-अच्छा मैया भी आयी है. जब छोटी सी थी तब देखा था. तिलका तो मिलता रहा है. खुशनुमा माहौल में बातचीत शुरू हुई. ज्ञापन पत्र के रूप में प्रस्तुत 6 पत्रों में से सर्वप्रथम महान शहीद सिदो मुर्मू और संताल हूल (1855-1856) पर प्रकाश डालते हुए उनको यथोचित सम्मान और स्थान देने के मांग के साथ ज्ञापन पत्र में लिखे 11 बिंदुओं को बिंदुवार बताया.सिदो मुर्मू और संताल हूल को मिले सम्मान
अंग्रेजों के खिलाफ "नोट्स ऑन इंडियन हिस्ट्री बाय कार्ल मार्क्स" में कार्ल मार्क्स (1818 -1883), जर्मन दार्शनिक, अर्थशास्त्री, इतिहासकार, राजनीतिक सिद्धांतकार ने कहा है कि अंग्रेजों के खिलाफ स्वतंत्रता के लिए प्रथम जनक्रांति-संताल हूल (30 जून 1855) से बुलंद हुआ था. अंग्रेजों के खिलाफ हुए उस महान विद्रोह को संथाल हूल के नाम से जाना जाता है. हमारी नजर में यह भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम है. अतएव आपसे आग्रह है महानायक वीर शहीद सिदो मुर्मू को और संथाल हूल को यथोचित सम्मान दिया जाए. जिनके नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ महान संताल विद्रोह 30 जून 1855 के खूनी क्रांति का उद्घोष हुआ था. सालखन इन प्रस्तावों को रखा. संथाल हूल के महानायक वीर शहीद सिदो मुर्मू के प्रस्तावित स्केच फ़ोटो, जो ईस्ट इंडिया कंपनी में 1834 से 1861 में कार्यरत अंग्रेज अफसर वाल्टर स्टेन्होप शेरविल द्वारा पेंसिल स्केच के रूप में चित्रांकित किया गया है और यह 23 फरवरी 1856 को इलस्ट्रेटेड लंदन न्यूज़ के पेज 200 में प्रकाशित हुआ था, उसे मानक चित्र के रूप में स्वीकार करने, इसका प्रचार प्रसार व्यापक रूप में करने. बाद में संताल हूल के अन्य नायकों कान्हू मुर्मू, चांद मुर्मू, भैरव मुर्मू, फूलो मुर्मू, झानो मुर्मू आदि को भी स्थापित करने की मांग की गयी.सिदो मुर्मू की आदमकद प्रतिमा पार्लियामेंट में लगे
बिरसा मुंडा की तरह सिदो मुर्मू के आदमकद मूर्ति को भारत के पार्लियामेंट में स्थापित करने, देश की राजधानी दिल्ली में एक प्रमुख मार्ग का नाम सिदो मुर्मू मार्ग रखने, संथाल हूल के इतिहास को सच्चे अर्थों में पुनर्जीवित करने के लिए एक विशाल अध्ययन केंद्र और संग्रहालय को सिदो मुर्मू रिसर्च एनड स्टडी सेंटर के रूप में स्थापित करने, सिदो मुर्मू और बिरसा मुंडा के वंशजों के लिए दो अलग-अलग ट्रस्ट का गठन करने. जिसमें भारत सरकार और संबंधित राज्य सरकारों द्वारा प्रति ट्रस्ट कम से कम एक सौ करोड़ रूपयों का पूंजी अंशदान प्रदान किया करने ताकि गरीबी और फटेहाल जीवन जी रहे दोनों वंशजों के लोगों को न्याय, सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास और सम्मान मिल सके.आदिवासी बहुल क्षेत्रों में लगे बिरसा मुंडा व सिदो मुर्मू की प्रतिमा
बिरसा मुंडा और सिदो मुर्मू का आदमकद मूर्ति यथासंभव आदिवासी बहुल क्षेत्रों में सर्वत्र लगाने, सिदो मुर्मू के गांव-भोगनाडीह और बिरसा मुंडा के गांव-उलीहातू को दुनिया के नक्शे में सम्मानपूर्वक हाईलाइट करने, अंग्रेजों के खिलाफ ऐतिहासिक संथाल विद्रोह को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रथम दर्जा प्रदान करने. यह 1857 के सिपाही विद्रोह से आगे और बिरसा मुंडा के उलगुलान- 1895-1900 से आगे हुआ था. सिदो मुर्मू और बिरसा मुंडा के नाम से देश में वीरता पुरस्कार प्रदान करने, झारखंड के देवघर में नवनिर्मित अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का नाम सिदो मुर्मू एयरपोर्ट रखने, सिदो मुर्मू के नेतृत्व में हुए संताल हूल ने अंग्रेजों को जहां 22 दिसम्बर, 1855 को “संताल परगना” (क्षेत्रीय आज़ादी) और “संताल परगना टेनेंसी एक्ट” बनाने को मजबूर किया था. उसी प्रकार अनेक संगठनों के सहयोग से निर्मित "संताली भाषा मोर्चा" के जनांदोलन ने 22 दिसम्बर, 2003 को संताली भाषा को 8वीं अनुसूची में शामिल कराया। दोनों ही जीत मातृभूमि और मातृभाषा की महान ऐतिहासिक उपलब्धियां हैं. अतः 22 दिसंबर को देश में "हासा-भाषा जीतकर माहा (विजय दिवस)" का अवकाश सम्मान/उचित सम्मान प्रदान किया जाय. दूसरे विषय पर आदिवासी स्वशासन व्यवस्था या ट्राईबल सेल्फ रुल सिस्टम पर चर्चा हुई. जिसके बारे में वे पहले से वाकिफ थे. तीसरे विषय के रूप में 10 अगस्त 2022 को प्रेषित पत्र के आधार पर चर्चा किया ताकि पांचवी अनुसूची आदि को प्रभावी तरीके से क्रियान्वित किया जा सके. उनको बताया गया कि जस्टिस एके पटनायक (सुप्रीम कोर्ट), बीजी वर्गीस, इंडियन एक्सप्रेस और हिंदुस्तान टाइम्स के पूर्व संपादक, वी किशोर चंद्र देव, पूर्व केंद्रीय आदिवासी मंत्री और के आर नारायणन, पूर्व राष्ट्रपति द्वारा पांचवी अनुसूची के संदर्भ में व्यक्त किए गए चिंताओं पर प्रकाश डाला. महामहिम ने कहा कि इनको ठीक से रिव्यू कर सफल बनाना है. उन्होंने अपनी डायरी में इन चारों महानुभाव का नाम लिखा. हमलोगों की मुलाक़ात के बाद पीए संगमा के पुत्र मेघालय के मुख्य मंत्री कॉनराड संगमा भी महामहिम राष्ट्रपति से मिले. परममित्र स्वर्गीय संगमा की याद ताजा हो गई जो हमारे आग्रह पर 12.8.2012 को रांची के पास नगड़ी गांव की भूमि अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन में साथ देने आये थे. पीए संगमा साहब हमारी आग्रह पर रीगल मैदान, जमशेदपुर में संताली भाषा मोर्चा जनसभा और मनोहरपुर विधानसभा चुनाव में साथ देने आए थे.सालखन ने राष्ट्रपित के समक्ष रखे ये सुझाव
संविधान में शामिल पांचवी अनुसूची आदि को प्रभावपूर्ण तरीके से लागू करने हेतु ढेवर कमीशन- 1961 की तरह अनुच्छेद- 339 के तहत एक विशेष उच्च स्तरीय आदिवासी कमीशन का गठन किया जाए. जो लगभग 6 महीनों के भीतर कोई ठोस और व्यवहारिक सुझाव प्रस्तुत कर सके. आदिवासी स्वशासन व्यवस्था या TSRS में सुधार और जनतंत्र एवं संविधान लागू करने हेतु भी एक उच्चस्तरीय कमेटी का गठन करने, प्रकृति पूजक आदिवासियों को सरना धर्म कोड की मान्यता देने, जनगणना में शामिल करने, बिहारी, बंगाली, ओड़िया उप-राष्ट्रीयता को स्थापित करने के लिए बने बिहार, बंगाल, ओड़िशा की तरह आदिवासी (झारखंडी) उप-राष्ट्रीयता की रक्षा और समृद्धि के लिए बने झारखंड प्रदेश को बचाना भी जरूरी है. क्योंकि आज झारखंड लुटने-मिटने की कगार पर खड़ा है. आदिवासी उप-राष्ट्रीयता की समृद्धि के लिए झारखंड प्रदेश में सर्वाधिक बड़ी आदिवासी भाषा- संताली , जो आठवीं अनुसूची में भी शामिल है, को झारखंड की प्रथम राजभाषा का दर्जा देने, महामहिम को 30 अप्रैल 2022 को पूर्व घोषित संताली राजभाषा रैली, रांची को अंतिम क्षणों में रोक देने की झारखंड सरकार की षडयंत्रकारी कार्रवाई की जानकारी दी गई. असम अंडमान के झारखंडी आदिवासी संताल, मुंडा, उरांव, हो, खड़िया, भूमिज आदि को अनुसूचित जनजाति ST का दर्जा देने, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संज्ञान में उपरोक्त तमाम अहम आदिवासी मुद्दों को गंभीरता से प्रस्तुत कर सहयोग लेने की मांग की गयी. महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सभी तथ्यों, विचारों को सुनने के साथ अपनी सकारात्मक प्रतिक्रिया और प्रतिबद्धता जाहिर की. सहृदयता के साथ सभी आदिवासी समुदाय, दलित, वंचितों, गरीबों को न्याय और सम्मान दिए जाने के संकल्प को सच बनाने की कोशिश पर जोर दिया. आदिवासी सेंगेल अभियान के 5 प्रदेशों (झारखंड, बंगाल, बिहार, उड़ीसा, असम) में निरंतर चालू समाज सुधार के कार्यक्रमों को यूट्यूब के माध्यम से देखने का अनुभव बताया. थोड़ा दुख भी जाहिर किया कि आदिवासी समाज में नशापान, अंधविश्वास, ईर्ष्या- द्वेष, डायन-प्रथा आदि कारणों से समाज को क्षति हो रही है. प्रधानमंत्री से मिलने का सुझाव दिया. महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 35 मिनट का बहुमूल्य समय दिया. बातों को गंभीरता से सुनी. अपनी चिंताओं को भी जाहिर की. द्रौपदी मुर्मू जैसे रायरंगपुर, मयूरभंज, ओड़िशा में थी, वैसे ही झारखंड में राज्यपाल के रूप में भी रही हैं. अब देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद में भी वही द्रोपदी मुर्मू हैं जो सहज, सरल, विनम्र, सच्चा और आत्मीयता के साथ मिलने वाली प्रतिमूर्ति हैं. मुलाकात के समापन पर तिलका ने बताया कि ज्योति ने आपके चुनावी महत्व के लिए 20 जुलाई 2022 के हिंदुस्तान टाइम्स, राष्ट्रीय खबर कागज में लेख लिखा है. महामहिम ने कहा-मुझे देना, मैं पढ़ूंगी. सालखन मुर्मू का कहना है कि सिदो मुर्मू और संथाल हूल को स्थापित करने की दिशा में यह मुलाकात एक मील का पत्थर साबित हुआ है.एक ही गांव के हैं सालखन मुर्मू और द्रौपदी मुर्मू
सालखन मुर्मू का द्रौपदी मुर्मू के साथ राजनीतिक और संताली भाषा आंदोलन के दौरान करीब से काम करने का अनुभव रहा है. जब ओड़िशा के मयूरभंज जिले से भाजपा से दो बार लोकसभा का सांसद हे तब वे उसी लोकसभा क्षेत्र के भीतर रायरंगपुर विधानसभा क्षेत्र से बीजेपी से विधायक रही हैं. हमारे जीवन के दो बड़े लक्ष्यों में 1 संताली भाषा की समृद्धि के लिए संताली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल कराने और 2 झारखंड प्रदेश के निर्माण में योगदान करने के संघर्ष के दौरान द्रोपदी मुर्मू का सहयोग मिलता रहा है. अनेक संताली भाषा प्रेमियों और संगठनों का अमरेला संगठन "संताली भाषा मोर्चा" के नेतृत्व में गतिशील आंदोलन में भी उनका अहम योगदान रहा है. कुछ दुर्लभ फोटो जिसमें ओडिशा के तत्कालीन राज्यपाल एमएम राजेंद्रन और उड़िशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से मुलाकात और भुवनेश्वर के सूचना प्रसारण हॉल में संताली भाषा मोर्चा के बैनर तले मंच में भाषण देते हुए दिखाई देती है. मेरी अध्यक्षता में बंगाल के झाड़ग्राम में 1992 साल को गठित "संताली भाषा मोर्चा" ने 1998 से जोर पकड़ा. जब हम प्रथम बार 12वीं लोकसभा के सदस्य बने और यह आंदोलन अंततः 22 दिसंबर 2003 को संताली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल कराकर अपनी मंजिल को प्राप्त कर सका है. मेरे नेतृत्व में स्थापित संताली भाषा मोर्चा को ओड़िशा से तत्कालीन विधायकगण द्रौपदी मुर्मू रायरंगपुर, कंदरा सोरेन बैसिंघा, राज किशोर दास अब मोरुडा से विधायक, निरंजन हेंब्रोम कुल्याणा, लखन सोरेन बहलदा के साथ आसेका राउलकेला, खेरवाड़ जुमीद कटक (राम चन्द्र माझी, बैजू मुर्मू) आदिम ओअर जरपा भुबनेश्वर (किशुन सोरेन)आदि संगठनों का विशेष योगदान रहा है.मयूरभंज के उपरबेड़ा में है पैतृक गांव
मयूरभंज जिला का उपरबेड़ा में द्रौपदी मुर्मू का पैतृक गांव है. हमारा भी पैतृक गांव है. यद्यपि हमारा जन्म और परवरिश करनडीह, जमशेदपुर झारखंड में हुआ है. चूंकि हमारे पिताजी 1907 में टाटा स्टील कंपनी की स्थापना के उपरांत जमशेदपुर में रच -बस गए थे. ऊपरबेड़ा गांव का जिक्र इसलिए क्योंकि मयूरभंज जिला के रायरंगपुर सब-डिवीजन मुख्यालय से ऊपरबेड़ा गांव को पहुंचने के पहले एक नदी "बूढा बड़ोंग" आता है. जिसपर आजादी से लेकर सन 2000 तक कोई पुल का निर्माण नहीं हो सका था. जबकि मयूरभंज जिला से अनेक आदिवासी सांसद, विधायक, मंत्री बने मगर पुल का निर्माण नहीं किया जा सका था. ऊपरबेड़ा ग्राम से ही कार्तिक चंद्र माझी, पूर्व मंत्री और भवेंद्र माझी विधायक रह चुके थे. शायद यह पुनीत कार्य हमारे और द्रौपदी मुर्मू के नसीब में था. हम दोनों ने तत्कालीन जिला के कलेक्टर डीके सिंह के सहयोग और सांसद विधायक फंड से इसको बनाने में सफलता हासिल की. अभी 23 जुलाई 2022 को द्रौपदी मुर्मू के राष्ट्रपति चुनाव जीतने की संभावना की खुशी में ऊपरबेड़ा के ग्रामीणों के साथ गर्व और प्रसन्नता को बांटने पत्नी सुमित्रा मुर्मू के साथ गांव गया था. तब ग्रामीणों ने दिल से दो दशक पूर्व नदी में बने पुल बनाने का श्रेय देते हुए कृतज्ञता और प्रसन्नता प्रकट की.alt="" width="601" height="400" />
झारखंड प्रदेश के गठन के बाद राजनीति में सक्रिय हुये सालखन
बिरसा मुंडा जी के जन्मदिन पर 15 नवंबर 2000 को झारखंड प्रदेश के गठन के उपरांत हम पूरी तरह झारखंड की राजनीति में सक्रिय हो गए. झारखंड में पूर्व मंत्री बंधु तिर्की, विधायक चमरा लिंडा, आदिवासी झारखंड जनाधिकार मंच, आदिवासी छात्र संघ, आदिवासी अधिकार मोर्चा, झारखंड बचाओ आंदोलन, अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद, नगड़ी बचाओ आंदोलन, केंद्रीय सरना समिति आदि के बैनर तले राज्य गठन के शुरू से अब तक सक्रिय रहे हैं. बीच में जदयू झारखंड प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुका हूं.द्रौपदी मुर्मू 2015 में बनीं थी राज्यपाल
द्रौपदी मुर्मू 2015 में ओड़िशा के मयूरभंज से झारखंड प्रदेश की राज्यपाल बनकर झारखंड में पदार्पण किया था. उनके साथ हमारे पुराने संपर्क और सामीप्य तो था ही, झारखंड आ जाने से फिर निकटता से आदिवासी मुद्दों पर चर्चा करने, सहयोग करने का अवसर प्राप्त हुआ. सर्वप्रथम उन्हें 22, 23, 24 दिसंबर 2015 को हमारे नेतृत्व में होने वाली संताली भाषा मोर्चा और आदिवासी सेंगेल अभियान, ऑल इंडिया संताली ईजुकेशन काउंसिल के तत्वाधान में आयोजित राष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन, करनडीह, जमशेदपुर में मुख्य अतिथि के रुप में आमंत्रित किया. उन्होंने सहर्ष स्वीकृति प्रदान किया. परंतु आदिवासी स्वशासन व्यवस्था के नाम पर कार्यरत कुछ एक संगठन के अनावश्यक विरोध और व्यवधान के कारण उन्हें यह कार्यक्रम स्थगित करना पड़ा. परंतु राष्ट्रीय आदिवासी सम्मेलन, सिदगोड़ा- जमशेदपुर के टाउन हॉल में पूर्वी सिंहभूम जिला प्रशासन के सहयोग से ऐतिहासिक सफल रहा. तत्पश्चात संताली भाषा को झारखंड की प्रथम राजभाषा बनाने के प्रस्ताव में उनकी खुशी और स्वीकृति, संताल हूल के महानायक सिदो मुर्मू के वंशज रामेश्वर मुर्मू की संदिग्ध हत्या (12.6.2020) पर सीबीआई जांच की अनुशंसा, टीएसी का संवैधानिक संरचना और क्रियान्वयन, सीएनटी/ एस पी टी कानून की सुरक्षा आदि पर उनसे मंत्रणा करने का अवसर मिलता रहा है.सीएनटी/एसपीटी कानून के संरक्षण में रही ठोस भूमिका
राज्यपाल कार्यकाल में सीएनटी/एसपीटी कानून की सुरक्षा से जुड़ा संकट का एक मामला बड़ा अहम बन गया था. परंतु उन्होंने आदिवासी जनजीवन और शहीदों के बलिदान से बने सीएनटी/एसपीटी कानूनों की रक्षा में ऐतिहासिक भूमिका निभाकर अहम योगदान किया है. साहस का परिचय दिया है. सीएन टी/एसपीटी कानून के संरक्षण पर मेरी भी ठोस भूमिका रही है. जिसे मैं उद्धृत करना चाहूंगा. जब रघुवर दास सरकार ने cnt/spt विरोधी संशोधनों को गैर कानूनी तरीके से पारित कर दिया था, तब खासकर आदिवासी समाज में एक सुनामी सा भूचाल आ गया था. किंतु राजनीतिक दल 2019 की चुनाव में इस संकट को भंजाने की रणनीति पर कार्यरत थे. परंतु हमारे नेतृत्व में आदिवासी सेंगेल अभियान और डॉ. कर्मा उरांव के नेतृत्व और दयामणि बरला के नेतृत्व आदि में कार्यरत अनेक आदिवासी जनसंगठनों ने जोरदार जन आंदोलन किया. सेंगेल ने रांची में तीन बड़ी जनसभाओं का आयोजन किया. राज्य भर में जन-जागरण मोटरसाइकिल रैली निकाली गयी. सिमडेगा से रांची तक चिलचिलाती धूप में 177 किलोमीटर का पद यात्रा की. जबकि जेएमएम, बीजेपी, कांग्रेस, आजसू आदि बड़ी पार्टियां 2019 की चुनाव में इस मुद्दे को ले जाने की तैयारी कर रहे थे. सेंगेल 17.5.2017 को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को रांची के विशाल जनसभा में बुलाकर रघुवर सरकार पर जोरदार हमला बोल दिया.alt="" width="601" height="400" />
मजबूरन संशोधन बिल पर हस्ताक्षर करना पड़ा
परंतु संवैधानिक प्रक्रिया के कारण लगभग 200 जन संगठनों, जनप्रतिनिधियों के आग्रह के बावजूद राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू के हाथ बंधे हुए थे. उनकी अनिच्छा के बावजूद उन्हें सीएनटी/एसपीटी में प्रस्तावित संशोधन बिल पर हस्ताक्षर करना एक मजबूरी बन चुकी थी. तब हमने स्व. सोहेल अनवर पूर्व महाधिवक्ता , डॉ केरुबिम तिर्की के सहयोग से 17.11.2016 तारीख को मान्य झारखंड उच्च न्यायालय में रघुवर दास सरकार के खिलाफ एक मुकदमा दायर कर दिया. जिसमें रघुवर दास के नेतृत्व में बनी टीएसी को गैरकानूनी प्रमाणित करने का दावा पेश कर दिया. क्योंकि खुद झारखंड सरकार की ओर से टीएसी की कमेटी में शामिल होने के अधिसूचना-मानदंड का उल्लंघन किया गया था. जिसके अनुसार टीएसी के कुल 20 सदस्यों में से 15 आदिवासी विधायक, 2 शिक्षाविद, 2 कानून के ज्ञाता और 1 आदिम जनजाति ही टीएसी के सदस्य बन सकते थे. अत: रघुवर दास इस नियमावली के तहत खुद सदस्यता पाने के भी योग्य नहीं थे. परंतु स्वयं टीएसी के अध्यक्ष बनकर एक गैर कानूनी टीएसी की ओर से गैर कानूनी संशोधन टीएसी में 3.11.2016 को पारित कराने को प्रथम दृष्टया दोष सिद्ध हो जाता था. इसी अहम तथ्य पर आधारित हमारा मुकदमा संख्या 6595/ 2016 तिथि 17.11.2016 को आधार बनाकर हमने राज्यपाल को राजभवन में 6.3.2017 को मिलकर पत्र से जानकारी प्रदान करते हुए सुरक्षात्मक कार्रवाई की मांग की. जिसपर राज्यपाल द्रोपदी मुर्मू ने मुख्य सचिव, झारखंड को स्पष्टीकरण के लिये पत्र संख्या: 883 तिथि 15.3.2017 से जवाब मांगा. जो अनुत्तरित रह गया. अत: झारखंड सरकार को सीएनटी/ एसपीटी कानून पर गौर करना पड़ा और गैरकानूनी संशोधन वापस लेना पड़ा. परंतु राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने जनभावना, कानूनों के ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, आदिवासी प्रेम, साहस का परिचय देकर दोनों कानून को पंगु होने से बचाने का ऐतिहासिक काम किया है. श्रेय उन्हीं को जाता है. अन्यथा टीएसी और झारखंड विधानसभा में पारित विधेयक को हस्ताक्षर करने से उन्हें कैसे कोई रोक सकता था ? और न उसके लिए उन्हें दोष भी दिया जा सकता था. क्योंकि सर्वाधिक आदिवासी विधायक तब भी और अब भी टीएसी और झारखंड विधानसभा में मौजूद हैं.राज्यपाल का कार्यकाल समाप्त होने के बाद तीन बार मिले सालखन
झारखंड में राज्यपाल के कार्यकाल के समापन के बाद उनके रायरंगपुर निवास में तीन बार मुलाकात हुई. आदिवासी सेंगेल अभियान के मयूरभंज जिला कार्यकर्ताओं के साथ रायरंगपुर में 18.11.2021 के प्रशिक्षण बैठक के बाद उनसे मुलाकात की थी. तब देखा उनके निवास में वे अकेली थी. बहुत साधारण परिवेश और सरलता के साथ मिली थी. बिल्कुल लगता नहीं था कि वे पूर्व राज्यपाल और ओड़िशा सरकार में मंत्री रह चुकी थी. उनका कुशलक्षेम पूछा और सेंगेल द्वारा आदिवासी समाज में सुधार हेतु जन जागरण के कार्यों की जानकारी प्रदान की. उस दिन हमारे साथ बुधन मरांडी, नरेंद्र हेंब्रोम, सुगदा किस्कू, सुमित्रा मुर्मू आदि मौजूद थे. दूसरी बार 18.4.2022 को एक घंटा से ज्यादा समय उद्देश्यमूलक बातचीत हुई. आदिवासी स्वशासन व्यवस्था या ट्राईबल सेल्फ रुल सिस्टम (TSRS) पर गंभीर चर्चा की गई. द्रौपदी मुर्मू को TSRS की वंशवाद पर आधारित पारंपरिक खामियों पर चर्चा करते हुए उनके विचारों को साझा किया. उन्होंने दृढ़ता के साथ कहा समय के साथ समाज सुधार अनिवार्य है. आदिवासी समाज में व्याप्त बुराइयों को पहचान कर उन्हें दूर करना भी समय और समाज की मांग है. उस दिन मुलाकात में शामिल सेंगेल महिला मोर्चा की ओडिशा प्रदेश अध्यक्ष मालहो मार्डी ने आत्मीयता के साथ उनसे आग्रह किया कि वे चूंकि अब राज्यपाल से कार्यमुक्त हो चुके हैं, आदिवासी समाज को समय देकर सहयोग करें. तब द्रौपदी मुर्मू ने सरलता से सहयोग करने का आश्वासन दिया. हम सब को बहुत अच्छा लगा. हमारे साथ सुमित्रा मुर्मू, तिलका मुर्मू, चंदन कुमार सोरेन, मल्हो मार्डी, घनश्याम टुडू आदि थे.राष्ट्रपति उम्मीदवार की घोषणा पर भी हुई थी मुलाकात
तीसरी मुलाकात 22 जून 2022 को हुई. जो अद्भुत और असाधारण मुलाकात थी. क्योंकि 21 जून 2022 की संध्या को उन्हें एनडीए की ओर से भारत के राष्ट्रपति के उम्मीदवार बनाने की घोषणा हो चुकी थी. अचानक मयूरभंज जिला और खासकर उनके निवास स्थान रायरंगपुर में एक खुशी का तूफान समुद्र की लहरों की तरह उफान भरने लगा था. गाजा-बाजा के साथ लोग नाचते-गाते खुशियां मनाने लगे थे. मानो क्षेत्र में हर कोई अब भारत का राष्ट्रपति बन जाएगा. 22 जून 2022 को उनके रायरंगपुर निवास के पास भारी भीड़ थी. गाड़ियों का काफिला भरा था. केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात हो चुका था. मीडिया के स्थानीय, राजकीय और राष्ट्रीय प्रतिनिधि भी हाजिर थे. पत्नी सुमित्रा मुर्मू के साथ द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात हुई. फूल का गुलदस्ता दिया. बधाई और शुभकामनाएं दी. फ़ोटो लिया. पहले की तरह सरलता और विनम्रता से बधाई स्वीकार की. पूछा बेटा तिलका मुर्मू क्यों नहीं आया. द्रौपदी मुर्मू को 30 अप्रैल 22 को रांची में विमोचित सेंगेल पुस्तक भेंट किया. जो टीएसआरएस के सुधार पर केंद्रित है. उनके साथ फोटो खिंचवाया और अपने साथी कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर जमशेदपुर वापस लौट गए. द्रौपदी मुर्मू उसी दिन संध्या को भुवनेश्वर होते हुए दिल्ली के लिए प्रस्थान कर गईं. उनसे मिलकर बहुत खुशी, गर्व, सम्मान और संतोष के अनुभूति का अनुभव हुआ कि चलो अपना एक बहुत करीबी, परिचित देश का राष्ट्रपति बनेगा. एक नया इतिहास बनेगा. इसे भी पढ़ें : जिंदगी">https://lagatar.in/daughter-ankita-lost-the-battle-with-life-amidst-political-statements-family-members-hope-for-justice-from-the-government/">जिंदगीसे जंग हार गई बेटी अंकिता, सियासी बयानों के बीच परिजनों को सरकार से न्याय की आस [wpse_comments_template]

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