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Jamshedpur : पोड़ेहांसा में जुटे 60 मौजा के माझी बाबा व सामाजिक प्रतिनिधि

  • युवाओं से नशा छोड़कर शिक्षा से जुड़ने की अपील
Jamshedpur (Sunil Sharma) : पारगना आखड़ा, पोंडेहासा में 60 मौजा के माझी बाबा एवं परानिक, गोडेत एवं सामाजिक बुद्धि जीवियों की एक आवश्यक बैठक हुई. जिसमें आदिवासी पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था, रीति रिवाज, पूजा पद्धति, धर्म, संस्कृति, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार एवं जल जंगल जमीन को बचाते हुए समाज का संवैधानिक अधिकार तथा समाज का सर्वांगीण विकास के मुद्दे पर चर्चा किया गया. परगना बाबा दासमत हांसदा ने कहा कि आदिवासी समाज अपने पारंपरिक स्वास्थ्य शासन व्यवस्था के तहत संचालित होते आ रहे हैं एवं अपनी भाषा, संस्कृति, पूजा पद्धति, जन्म से मरण तक का विधि विधान, अलिखित रूप में पूर्वजों ने कई हजारों वर्षों पूर्व समाज को दिया है. जिसका आज भी पालन किया जा रहा है. कहा कि आज आदिवासी समाज की युवा पीढ़ी नशे की शिकार हो रही है. जिससे भविष्य में समाज की पारंपरिक व्यवस्था प्रभावित होने की संभावना है. आदिवासी अगर दूसरे धर्म की पूजा पद्धति, धर्म संस्कृति का अनुपालन करेंगे वह अपने संवैधानिक हक अधिकार और समाजिक मान्यताओं से वंचित हो जाएंगे. निश्चित रूप से वैसी स्थिति में आदिवासी समुदाय भी हिंदू, मुस्लिम, सिख, इसाई धर्मों में गिने जाएंगे. इसलिए आदिवासियों को अपने समाजिक परंपरा रीति रिवाज, पूजा पद्धति, रूढ़ी प्रथा, पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के अंतर्गत अपने आप को संचालित होने का प्रयास करना चाहिए. इसलिए उन्होंने समाज की युवा पीढ़ी का आह्वान किया कि वह नशा छोड़कर शिक्षा को अपनाए. इसे भी पढ़ें : Ghatshila">https://lagatar.in/ghatshila-there-is-a-rise-in-paddy-planting-laborers-are-falling-short-for-planting/">Ghatshila

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रक्षा बंधन पर गोम्हा पर्व मनाते हैं आदिवासी

आदिवासी समाज की ओर से रविवार को गोम्हा पर्व मनाया गया. इस दौरान सभी ने "करम देवता" की पूजा अर्चना की तथा देवता से अच्छी वर्षा तथा अच्छी फसल होने के लिए कामना की. मांझी बाबा दुर्गा चरण मुर्मू ने बताया कि आदिवासी समाज रक्षाबंधन नहीं मनाते हैं. क्योंकि आदिवासी परिवार में भाई-बहन में प्राचीन काल से प्यार भरा एक अटूट रिश्ता चलते आ रहा है जो आदिवासी समाज को श्रेष्ठ समाज की पंक्ति में लेकर आते हैं. बैठक में मुख्य रूप से देश पारानिक बाबा दुर्गा चरण मुर्मू, माझी बाबा बिंदे सोरेन, सुखराम किस्कू, लेदेम मुर्मू, वीरसिंह बास्के, वकील हांसदा, शंकर बेशरा, भुगलू मुर्मू, निवाई हेंब्रम, सुशील हसदा, गोपी हांसदा, मनोज हसदा, पालूराम हेंब्रम, सुनील हसदा, सागेन हांसदा, उपेन्द्र मुर्मू, कुशाल हांसदा, रेंटा मुर्मू, सालखू सोरेन, हलधर सोरेन आदि काफी संख्या में पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था के लोग मौजूद थे. [wpse_comments_template]

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