Jamshedpur : 25 सितंबर 1916 को उत्तर प्रदेश की पवित्र भूमि मथुरा में जन्मे पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जन्म कुंडली देखकर एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की थी कि यह बालक महान विद्वान और विचारक होगा. एक अग्रणी राजनेता एवं निःस्वार्थ सेवाव्रती होगा. बचपन में ही उनके भाई की असामयिक मृत्यु और बाद में उनकी बहन का नहीं रहना, उनके जीवन को एक नया मोड़ दिया. पिलानी में विशेष योग्यता के साथ उन्होने इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण की. कानपुर में सनातन धर्म कॉलेज से प्रथम श्रेणी से बीए पास किया और एमए के लिए आगरा चले गए. अपने मित्र बलवंत महाशब्दे की प्रेरणा से 1937 में वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में शामिल हो गए. आगरा में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सेवा के दौरान उनका परिचय नानाजी देशमुख और भाऊ जुगड़े से हुआ.
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भारतीय जनसंघ के प्रथम महासचिव बने दीनदयाल
भारतीय जनसंघ की स्थापना डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा वर्ष 1951 में किया गया एवं दीनदयाल उपाध्याय को प्रथम महासचिव नियुक्त किया गया. वे लगातार दिसंबर 1967 तक जनसंघ के महासचिव बने रहे. उनकी कार्यक्षमता, खुफिया गतिविधियों और परिपूर्णता के गुणों से प्रभावित होकर डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी उनके लिए गर्व से सम्मानपूर्वक कहते थे कि ‘यदि मेरे पास दो दीनदयाल हों, तो मैं भारत का राजनीतिक चेहरा बदल सकता हूं’. दीनदयाल उपाध्याय के अन्दर की पत्रकारिता तब प्रकट हुई जब उन्होंने लखनऊ से प्रकाशित होने वाली मासिक पत्रिका ‘राष्ट्रधर्म’ में वर्ष 1940 के दशक में कार्य किया. अपने आरएसएस के कार्यकाल के दौरान उन्होंने एक साप्ताहिक समाचार पत्र ‘पांञजन्य’ और एक दैनिक समाचार पत्र ‘स्वदेश’ शुरू किया था. जनसंघ के राष्ट्रजीवन दर्शन के निर्माता दीनदयाल का उद्देश्य स्वतंत्रता की पुर्नरचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्व-दृष्टि प्रदान करना था.
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दीनदयाल को जनसंघ की आर्थिक नीति का रचनाकार बताया
उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानववाद जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी. दीनदयाल को जनसंघ की आर्थिक नीति का रचनाकार बताया जाता है. स्वातंत्रय के इस युग में मानव कल्याण के लिए अनेक विचारधारा को पनपने का अवसर मिला है. इसमें साम्यवाद, पूंजीवाद, अन्त्योदय, सर्वोदय आदि मुख्य हैं, किन्तु चराचर जगत को सन्तुलित, स्वस्थ व सुंदर बनाकर मनुष्य मात्र पूर्णता की ओर ले जा सकने वाला एकमात्र प्रक्रम सनातन धर्म द्वारा प्रतिपादित जीवन – विज्ञान, जीवन–कला व जीवन–दर्शन है.
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एक महान चिंतक थे पंडित दीनदयालय उपाध्याय
संस्कृति निष्ठा दीनदयाल द्वारा निर्मित राजनैतिक जीवन दर्शन का पहला सूत्र है उनके शब्दों में- “भारत में रहने वाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाले मानव समूह एकजन हैं. उनकी जीवन प्रणाली, कला, साहित्य, दर्शन सब भारतीय संस्कृति है. इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है. इस संस्कृति में निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा. पंडित दीनदयाल उपाध्याय एक महान चिंतक थे. उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानव दर्शन जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी. पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद के दर्शन पर श्रेष्ठ विचार व्यक्त किए हैं. उन्होंने अपनी पुस्तक एकात्म मानववाद (इंटीगरल ह्यूमेनिज्म) में साम्यवाद और पूंजीवाद, दोनों की समालोचना की गई है. एकात्म मानववाद में मानव जाति की मूलभूत आवश्यकताओं और सृजित कानूनों के अनुरुप राजनीतिक कार्रवाई हेतु एक वैकल्पिक सन्दर्भ दिया गया है. दीनदयाल उपाध्याय का मानना है कि हिन्दू कोई धर्म या संप्रदाय नहीं, बल्कि भारत की राष्ट्रीय संस्कृति हैं. 11 फरवरी, 1968 को पंडित दीनदयाल उपाध्याय की रहस्यमय तरीके से मौत हो गई.
एके श्रीवास्तव, अध्यक्ष, जमशेदपुर सिटीजन फोरम
एवं कार्यकारी अध्यक्ष धर्म यात्रा महासंघ झारखंड
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