Jamshedpur (Ratan Singh) : आज के डिजिटल युग में भी परंपरा के नाम पर अंधविश्वास का बोलबाला है. झारखंड में कुछ ऐसी ही पुरानी परंपरा है जिसमें दर्द और चीख सुनाई देती है. इन्हीं में से एक विचित्र परंपरा है आदिवासी समुदाय का चिड़ी दाग. जमशेदपुर से सटे हुए आदिवासी क्षेत्र में पेट संबंधी रोग ठीक करने के नाम पर बच्चों के पेट में गर्म सलाखों से दागा जाता हैं. वर्ष के पहले महीने में मकर संक्रांति के दूसरे दिन को आदिवासी समाज अखंड जात्रा कहते हैं. अखंड जात्रा के अहले सुबह गांव में अलग-अलग कस्बे में महिलाएं अपने बच्चे को लेकर स्थानीय एक पुरोहित के घर में आती हैं. जहां पुरोहित जमीन पर बैठकर लोहा या तांबे की सींक को लकड़ी की आग में गर्म करते हैं. इसके बाद एक-एक बच्चों के पेट में मंत्रोच्चार के साथ चार बार दागा जाता है. इसे भी पढ़ें : जमशेदपुर">https://lagatar.in/jamshedpur-devotees-take-a-dip-of-faith-in-rivers-on-makar-sankranti/">जमशेदपुर
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: शहर का पहला नेचुरोपैथी सेंटर खुला, सभी बीमारियों का होगा इलाज इसको लेकर करनडीह निवासी पुरोहित छोटू सरदार बताते हैं कि उनके दादा, परदारा चिड़ी दाग की परंपरा निभाते आ रहे हैं. इसको लेकर मान्यता है कि चिड़ी दाग से पेट का जो नस बढ़ जाता है, वो ठीक हो जाता है. चिड़ी दाग से पेट दर्द नहीं होता है. इसके अलावा पैर, कमर दर्द के लिए भी चिड़ी दाग दिया जाता है. पुरोहित का मानना है कि इस तरह की बीमारी में दवा से अंदर का इलाज होता है लेकिन चिड़ी दाग से ऊपर से नस का इलाज हो जाता है. वहीं ग्रामीण महिलाएं बताती हैं कि उन्हें अपनी इस परंपरा पर पूरा विश्वास है, ऐसा करने से उनके बच्चे का स्वास्थ्य ठीक रहता है और पेट से संबंधित कोई बीमारी नहीं होती. आदिवासी समाज के जानकारों का मानना है कि अब लोग ज्यादा जागरूक हो गए है. पहले के मुकाबले काफी कम लोग ही चिड़ी दाग के लिए पुरोहितों के पास आते है. अब ज्यादातर लोग अस्पतालों का ही रुख करते है. [wpse_comments_template]
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असहनीय पीड़ा से चीख उठते है बच्चे
परंपरा के अनुसार सुबह-सुबह सबसे पहले पुरोहित के घर के आंगन में लकड़ी जलाई जा रही है. इस आग में तांबे की सींक को गर्म किया जा रहा है. पुरोहित एक कटोरी में सरसो तेल लेकर बैठते है. इसके बाद आये हुए बच्चों को अपने पास बुलाकर अपनी उंगलियों पर सरसों तेल लेकर कुछ बुदबुदाते (मंत्र पढ़ते) है और अलग-अलग उंगलियों से जमीन पर उसी तेल से निशाना बनाते है. उसके बाद बच्चे को लिटाकर उसकी नाभि के आसपास तेल लगाकर गर्म सींक से दागा जाता है. इससे बच्चों की चीख निकलती है और असहनीय पीड़ा भी उन्हें झेलना पड़ता है. बच्चों के साथ-साथ बड़े भी अपने दर्द का निवारण करने के लिए पहुंचते है. लोगों का विश्वास है ऐसा करने से पेट समेत शरीर के अन्य जगहों का दर्द ठीक हो जाता है. इसमें 21 दिन के बच्चे से लेकर बड़े को भी चिड़ी दाग दिया जाता है.
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