Jamtara : देश डिजिटल इंडिया, जनधन और हर नागरिक तक सरकारी योजनाओं का दावा कर रहा है. लेकिन जामताड़ा जिले के नारायणपुर प्रखंड मुख्यालय से महज 2 किलोमीटर दूर स्थित रघुनाथपुर गांव की तस्वीर इन दावों की हकीकत बयां कर रही है. 20 वर्षीय बिबिनी हांसदा अपनी गोद में छह माह के मासूम बच्चे को लेकर आज भी अपने आधार कार्ड बनवाने के लिए दफ्तरों में भटक रही हैं. विडंबना यह है कि आज तक उनका आधार कार्ड नहीं बन पाया है.

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बिबिनी के ससुर ऑफिसर हेम्ब्रम बताते हैं कि परिवार ने कई बार नारायणपुर, करमाटांड़ सहित अलग-अलग केंद्रों पर आधार कार्ड बनवाने का प्रयास किया, लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन और निराशा ही हाथ लगी. उनका आरोप है कि करीब एक वर्ष पहले एक व्यक्ति ने आधार कार्ड बनवाने के नाम पर तीन हजार रुपये लिया. पैसे लिया लेकिन आधार नही बना और जिसको लेकर आज भी आधार कार्ड के लिए भटकने को मजबूर है.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब प्रखंड मुख्यालय से महज दो किलोमीटर दूर रहने वाली महिला तक प्रशासन की मूलभूत सेवा नहीं पहुंच पा रही है, तो दूर-दराज के गांवों की स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है.
सरकारी मंचों पर डिजिटल व्यवस्था, ऑनलाइन सुविधा और आम नागरिकों तक सेवाएं पहुंचाने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं. लेकिन जमीनी सच्चाई यह है कि एक मां अपने छह माह के बच्चे को गोद में लेकर पहचान की लड़ाई लड़ रही है. यह केवल एक आधार कार्ड का मामला नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनहीनता और प्रशासनिक उदासीनता का आईना है.
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