झारखंड, असम और बांग्लादेश
Shyam Kishore Choubey आषाढ़ तपने के बाद सावन ने हिमालय से लेकर किष्किंधा तक, केदारनाथ से लेकर दिल्ली, रांची, वायनाड तक ऐसा पानी-पानी कर दिया कि ‘विकास’ को बाल्टियों से उलीचना पड़ा. इसी दौर में विश्वपटल पर एक प्रलयंकारी घटना बांग्लादेश में तख्तापलट के रूप में सामने आयी. पिछली जनवरी में पांचवीं बार वहां की वजीरेआजम बनीं शेख हसीना वाजेद को बहुत हड़बड़ी में पांच अगस्त की दोपहर महज दो सूटकेस लेकर भारत भागना पड़ा. उनकी कई कहानियां हैं. आयरन लेडी बनने से लेकर तंगहाल बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था ऊंचाइयों पर ले जाने तक, विपक्षी नेताओं को जेलबंद कर चुनाव जीतने तक और काफी हद तक तानाशाह बन जाने तक, पाकिस्तान, चीन, श्रीलंका, नेपाल और म्यांमार जैसे अमित्र देशों से घिरे भारत से मित्रता निभाने तक. अवामी लीग लीडर हसीना को सत्ता से बेदखल करने का प्रत्यक्ष तौर पर युवाओं का आरक्षण विरोधी प्रचंड आंदोलन बांग्लादेश में चल रहा था, जिसे उनके द्वारा दुश्मनी की हद तक विरोधी बनाये जा चुके बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के अलावा 2007 में नागरिक शक्ति नामक राजनीतिक दल के संस्थापक नोबेल प्राइज विजेता मशहूर अर्थशास्त्री मोहम्मद यूनुस का परोक्ष समर्थन प्राप्त था. उन्हीं यूनुस को फिलहाल अंतरिम सरकार चलाने की जवाबदेही सौंपी गई है, जबकि हसीना के इस्तीफे और देश छोड़ने के साथ उनकी प्रबल प्रतिद्वंद्वी पूर्व प्रधानमंत्री बीएनपी चीफ खालिदा जिया की जेल से रिहाई कर दी गई. ये वही हसीना वाजेद हैं, जिनके देश से बंगाल, झारखंड, बिहार, असम आदि में व्यापक पैमाने पर घुसपैठियों के घुस आने की खबरें सियासी माहौल में सालोंसाल से तैरती रही हैं. झारखंड में अगले कुछ ही महीनों में विधानसभा का चुनाव होनेवाला है और देश की सत्ता पर लगातार तीसरी मर्तबा काबिज किंतु झारखंड में विपक्ष की भूमिका अदा कर रही भाजपा बांग्लादेशी घुसपैठ को बड़ा एजेंडा बनाये हुए है. मुख्तसर सी चर्चा असम की. छह अगस्त को खबर आयी कि पूर्वी और पश्चिमी कार्बी आंगलोंग जिलों में ‘अवैध रूप से बसे लोगों’को बेदखल करने की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों की सुरक्षाबलों से झड़प हुई. झड़प इस हद तक हुई कि हवा में ही सही, सुरक्षा बलों को गोलियां दागनी पड़ी. नौ सुरक्षाबलों सहित 44 लोग घायल हुए. ‘अवैध रूप से बसे लोग’ हैं कौन आखिर? बांग्लादेश से असम की 263 किमी सीमा मिलती है. उसी असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा झारखंड में भाजपा के चुनाव सह प्रभारी हैं और संतालपरगना में घुसपैठ तथा मतांतरण मामला वे जोरदारी से उठाते हैं. यह कहना ठीक नहीं होगा कि पहले असम को संभालें, लेकिन घुसपैठ गंभीर समस्या है, जिससे सभी को मिलजुलकर निपटना होगा. केंद्र सरकार को विशेष ध्यान देना होगा, क्योंकि बांग्लादेश से अपनी तकरीबन 4,096 किमी सीमा लगी हुई है, जबकि सभी पड़ोसियों संग हमारी 15 हजार किलोमीटर से अधिक तक की सीमाएं जुड़ी हुई हैं. इतनी बड़ी सीमाओं की निगरानी कतई आसान नहीं है, लेकिन करनी तो पड़ेगी. झारखंड में बांग्लादेशी नहीं हैं, यह नहीं कहा जा सकता. 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान जब पाकिस्तान को हराकर भारत ने बांग्लादेश की स्थापना कराई थी, उस दौर में तकरीबन एक करोड़ शरणार्थी भारत आए थे. बाद के दिनों में भी काम की तलाश में अनेक बांग्लादेशी आते रहे. बिलाशक इनमें से अनेक संताल परगना में भी आते रहे होंगे, क्योंकि इस परगने की सीमाएं बरास्ता बंगाल बांग्लादेश के करीब हैं. बंगाल की 2,216 किमी सीमा बांग्लादेश से जुड़ती है. ऐसे ही, एक अनुमान के अनुसार साढ़े चार लाख झारखंडी बांग्लादेश में दशकों से रह रहे हैं. अवैध तरीके से सीमा पार कर आ बसने या बस जाने का जुगाड़ करनेवालों की शिनाख्त तो की ही जानी चाहिए. झारखंड में हर राजनीतिक गुण-धर्म की सरकारें रही हैं. इसलिए घुसपैठ का दोष किसी एक पर मढ़ना कतई जायज नहीं होगा. सियासी फायदे के लिए ऐसा किया जाता है तो लोकशाही का तकाजा है कि कल के गये यह अगले का भी सिरदर्द साबित होगा. बांग्लादेश की सुप्रीम कोर्ट के न्याय निर्णय के बावजूद ’71 के संग्रामियों के वारिसों के नाम पर शेख हसीना ने आरक्षण का विष वृक्ष पुराने ढर्रे पर पोषित करते रहने का जो दुस्साहस किया, उसका परिणाम जगजाहिर है. अपने पिता और बांग्लादेश के संस्थापक शेख मुजीबुर्रहमान, मां और तीन भाइयों की 1975 में विरोधियों द्वारा हत्या के बाद छह वर्षों तक भारत में निर्वासित सा जीवन बितानेवाली हसीना का 1981 में ढाका में अपार भीड़ ने खैरमकदम किया था. प्रायः 43 वर्षों बाद ठीक विपरीत गुस्सैल मजमों के डर से 76 की उम्र में उनको घर-बार, शान-ओ-शौकत छोड़कर निकल भागने की मोहलत मिल गई, यही क्या कम है? ... और अंत में: सरयू राय चार अगस्त को जदयू के हो गये. भाजपा त्यागकर 2019 में उन्होंने बतौर निर्दलीय उम्मीदवार भाजपा के स्टॉलवार्ट नेता, तत्कालीन मुख्यमंत्री रघुवर दास को हराया था. बदले सियासी हालात में उन्होंने आजसू, एनसीपी और एक निर्दलीय विधायक संग मिलकर पांच विधायकों का भारतीय लोकतांत्रिक मोर्चा बनाया, लेकिन उसका अस्तित्व नजर नहीं आया. फिर उनकी पहचान भारतीय जनतंत्र मोर्चा नामक राजनीतिक संगठन के संयोजक के तौर पर बनी. इसी के बैनर तले वे हालिया लोकसभा चुनाव धनबाद से लड़ना चाहते थे, लेकिन विधानसभा चुनाव आते-आते वे तीर छापी हो गये. झारखंड में जदयू अस्तित्व का संकट झेल रहा है. जदयू के प्रतीक पुरुष और सरयू के घनिष्ठ मित्र नीतीश कुमार ने दिल से साथ दिया तो बहुत संभव है कि इस बार के भी विधानसभा चुनाव में सरयू का तीर जमशेदपुर में चल जाए, राज्य में जदयू का जो होना होगा सो होगा. डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. [wpse_comments_template]
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