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Jharkhand Poltics : BJP, JMM और Congress की अभी से 2029 के लिए जमीनी स्तर की राजनीति शुरू, समझिए पूरा समीकरण

Ranchi :  संगठन की नई टीम, जिला और प्रखंड स्तर की बैठकों से लेकर बूथ तक पहुंच बनाने की कोशिश तेज हो गई है. साथ ही रोजगार, आदिवासी अधिकार, SIR, जमीन और खनिज जैसे मुद्दों को भी राजनीतिक नरेटिव में जगह मिल रही है. सीधी बात करें तो अभी टिकट का खेल शुरू नहीं हुआ है. लेकिन राजनीतिक आधार मजबूत करने का काम जरूर शुरू हो गया है.
 

Ranchi :  झारखंड में साल 2029 में विधानसभा चुनाव होना है. यानी चुनाव होने में अभी करीब तीन साल बाकी है. लेकिन राजनीति में तीन साल बहुत लंबा वक्त नहीं होता. यही वजह है कि चुनावी बिगुल बजने से पहले ही पार्टियों ने जमीनी स्तर पर तैयारियां शुरू कर दी है.

 

संगठन की नई टीम, जिला और प्रखंड स्तर की बैठकों से लेकर बूथ तक पहुंच बनाने की कोशिश तेज हो गई है. साथ ही रोजगार, आदिवासी अधिकार, SIR, जमीन और खनिज जैसे मुद्दों को भी राजनीतिक नरेटिव में जगह मिल रही है. सीधी बात करें तो अभी टिकट का खेल शुरू नहीं हुआ है. लेकिन राजनीतिक आधार मजबूत करने का काम जरूर शुरू हो गया है.

 

वर्ष की शुरुआत से BJP ने बढ़ाई संगठनात्मक गतिविधियां

BJP में 2026 की शुरुआत संगठनात्मक बदलाव के साथ हुई. जनवरी में आदित्य साहू को झारखंड BJP का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. वहीं बाबूलाल मरांडी विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका में सरकार को घेर रहे हैं.

 

इसके बाद मार्च में BJP ने नई प्रदेश टीम बनाई. इसमें पूर्व सांसद गीता कोड़ा और आभा महतो को प्रदेश उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली. यानी संगठन में क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन बनाने की कोशिश की गई.

 

BJP यही नहीं रूकी. उसने अपने मोर्चों को भी एक्टिव किया. सितंबर में सन्नी टोप्पो को ST मोर्चा, सीमा सिंह को महिला मोर्चा और मनोज वाजपेयी महतो को OBC मोर्चा की जिम्मेदारी दी गई. इसका मतलब साफ है कि पार्टी सिर्फ बड़े नेताओं के भरोसे नहीं रहना चाहती, बल्कि अलग-अलग सामाजिक समूहों तक संगठन के जरिए पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है.

 

युवा और रोजगार पर बीजेपी की रणनीति

सरकारी नौकरी, भर्ती परीक्षा और छात्रों के मुद्दे पर पार्टी लगातार सरकार को घेर रही है. अगस्त में छात्र आंदोलन को लेकर BJP ने CBI जांच की मांग को जोरदार तरीके से उठाया. यानी पार्टी का फोकस अब सिर्फ पारंपरिक राजनीतिक मुद्दे पर नहीं है. युवा, जॉब और प्रतियोगी परीक्षाओं जैसे मुद्दे भी 2029 की तैयारी का हिस्सा बन रहे हैं.

 

JMM के सामने परंपरागत आधार मजबूत बनाए रखना चुनौती

सत्ता में रहने के बावजूद JMM के सामने अपने पारंपरिक जनाधार को मजबूत बनाए रखने की चुनौती है. पार्टी ने बूथ से लेकर जिला स्तर तक संगठन को एक्टिव करने पर जोर दिया है. SIR और जनगणना जैसे मुद्दों को लेकर भी कार्यकर्ताओं को ग्राउंड पर सक्रिय करने की कोशिश हुई है.

 

JMM ने कई जिलों में संगठनात्मक बदलाव भी किए. पूर्वी सिंहभूम में नई जिला कमेटी बनी. वहीं दूसरे जिलों में भी संगठन विस्तार और युवा मोर्चे को मजबूत करने की गतिविधियां तेज हुईं. यानी JMM का ग्राउंड गेम भी सिर्फ रांची तक सीमित नहीं है. पार्टी का फोकस लोकल नेटवर्क पर है.

 

JMM का सबसे बड़ा राजनीतिक हथियार :  ट्रायबल (Tribal) और क्षेत्रीय मुद्दे (Regional issues)

MMDR Amendment Bill 2026 के खिलाफ JMM ने खासकर कोल्हान में कैंपेन की तैयारी की. पार्टी इसे आदिवासी अधिकार, जमीन और प्राकृतिक संसाधनों से जोड़कर जनता तक ले जा रही है. कोल्हान में इसका महत्व इसलिए ज्यादा है, क्योंकि यहां ट्रायबल पॉलिटिक्स का चुनावी असर काफी बड़ा है.

 

संताल परगना में भी मुकाबला काफी दिलचस्प रहेगा. यह क्षेत्र JMM का पारंपरिक प्रभाव वाला इलाका माना जाता है. जबकि भाजपा यहां लंबे समय से अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश करती रही है. ऐसे में अगले तीन साल में पंचायत, प्रखंड और बूथ स्तर पर संगठन की सक्रियता अहम भूमिका निभा सकती है.

 

कांग्रेस की चुनौती : सहयोगी रहते हुए अपना आधार मजबूत करना

कांग्रेस की स्थिति दोनों प्रमुख दलों से कुछ अलग है. पार्टी राज्य सरकार में झामुमो की सहयोगी है. लेकिन वर्ष 2029 के लिए उसे अपना स्वतंत्र राजनीतिक आधार भी मजबूत करना होगा.  केशव महतो कमलेश प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं.

 

वर्ष 2026 में कांग्रेस ने राजनीतिक मामलों की समिति का गठन किया और जिला स्तर पर भी संगठनात्मक नियुक्तियां कीं. पार्टी फिलहाल संगठन को सक्रिय करने और स्थानीय स्तर पर अपनी मौजूदगी मजबूत करने की दिशा में आगे बढ़ रही है. 

 

अलग-अलग क्षेत्रों में अलग राजनीतिक मुद्दे

अब अगर पूरे झारखंड का राजनीतिक परिदृश्य देखें तो अलग-अलग क्षेत्र में अलग-अलग चुनावी राजनीति है. कोल्हान में आदिवासी अधिकार, जमीन से जुड़े मुद्दे और खनिज संसाधन मुख्य चिंताएं हैं. संताल इलाके में आदिवासी राजनीति और स्थानीय पहचान का मुद्दा अहम है.

 

पलामू-गढ़वा में रोजगार, विकास और स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता मिल सकती है. चतरा-हजारीबाग बेल्ट में शिक्षा, नौकरी, माइनिंग और विकास महत्वपूर्ण कारक हैं. वहीं, गिरिडीह-बोकारो बेल्ट में उद्योग, रोजगार, विस्थापन और शहरी विकास से जुड़ी राजनीति अहम होगी. 

 

गिरिडीह में बदला राजनीतिक परिदृश्य

गिरिडीह की राजनीति में सितंबर 2026 में बड़ा बदलाव आया. झामुमो के वरिष्ठ नेता और मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद क्षेत्र की राजनीति में नए समीकरण बनने की संभावना पर चर्चा तेज हुई है. वह गिरिडीह सदर विधानसभा क्षेत्र से विधायक थे. उनके निधन का स्थानीय संगठन और क्षेत्रीय राजनीति पर क्या प्रभाव पड़ता है, यह आने वाले समय में देखने वाली बात होगी.

 

युवा मतदाता बनेंगे महत्वपूर्ण कारक

 वर्ष 2026 में भर्ती परीक्षाओं और रोजगार को लेकर छात्रों का आंदोलन सामने आया. भाजपा ने इन आंदोलनों और रोजगार से जुड़े सवालों को राज्य सरकार के खिलाफ प्रमुख राजनीतिक मुद्दे के रूप में उठाया.  अब आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि झामुमो और कांग्रेस युवाओं को सिर्फ मतदाता मानती है या उन्हें राजनीतिक संगठनों और अभियानों में सक्रिय भागीदार बनाती है. 

 

अभी चुनाव नहीं, संगठन निर्माण की तैयारी

वर्ष 2029 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है और अभी कोई औपचारिक चुनावी अभियान शुरू नहीं हुआ है. लेकिन राजनीतिक दलों की मौजूदा गतिविधियां बताती हैं कि चुनाव से पहले संगठन को मजबूत करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.

 

 कौन-सी पार्टी जिला और प्रखंड स्तर पर कितनी बैठकें करती है, किस दल की बूथ समितियां कितनी सक्रिय रहती हैं, कौन नए सामाजिक समूहों को अपने साथ जोड़ता है, स्थानीय नेताओं को कितनी भूमिका मिलती है और कौन-से मुद्दे लगातार जनता के बीच उठाए जाते हैं, इन सबका प्रभाव आने वाले वर्षों की राजनीति पर पड़ सकता है.

 

फिलहाल भाजपा का जोर संगठन, युवा और विभिन्न सामाजिक समूहों तक पहुंच बढ़ाने पर दिखाई दे रहा है. झामुमो अपने आदिवासी और क्षेत्रीय जनाधार के साथ बूथ स्तर के संगठन तथा जमीन और खनिज जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित कर रहा है. वहीं कांग्रेस के सामने अपने स्वतंत्र संगठन और राजनीतिक आधार को मजबूत करने की चुनौती है.

 

 इस लिहाज से 2029 का चुनाव अभी दूर जरूर है, लेकिन उसकी जमीनी तैयारी 2026 से ही शुरू हो चुकी है. आने वाले तीन वर्ष राजनीतिक दलों के लिए संगठन विस्तार, जनसंपर्क और मुद्दों को मजबूत करने का समय होंगे. चुनाव के समय राजनीतिक तस्वीर क्या रूप लेगी, यह इन्हीं तैयारियों और बदलते राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेगा. तो 2029 अभी दूर है, लेकिन गेम शुरू हो चुका है.

 

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