Singh पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन अभी तक भाजपा में शामिल नहीं हुए हैं, पर झामुमो में वे रहेंगे, इसकी गुंजाइश नहीं दिखती. उन्होंने अपने सोशल मीडिया के बायो से झामुमो की पहचान हटा दी है. सरकार में मंत्री हैं, यह भी नहीं बताया है. वे दिल्ली पहुंचे हुए हैं. उनके साथ झामुमो के जिन विधायकों के नाम चर्चा में थी, उन्होंने खुल कर खुद को झामुमो के साथ रहने का ऐलान कर दिया है. कुल मिलाकर अब चंपाई सोरेन अकेले नजर आ रहे हैं. भाजपा में जाएंगे भी, तो शायद अकेले हीं. और अगर वह ऐसा करते हैं, तो उनकी वहां क्या हैसियत होगी, यह समझने और देखने वाला है. झारखंड और कोल्हान में झामुमो की सांगठनिक पैठ और तीर कमान सिंबल की अहमियत के बारे में झामुमो के तमाम नेता जानते हैं. इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में सीता सोरेन पाला बदलते हुए भाजपा में गयीं थी. भाजपा में शामिल होने से पहले सीता सोरेन ने परिवार और दल पर अपनी अनदेखी का आरोप भी लगाया. भाजपा ने सीता सोरेन को दुमका संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ाया, लेकिन वे हार गयीं. हारने के बाद सीता सोरेन ने भाजपा नेताओं पर ही असहयोग का आरोप लगाया. उधर सिंहभूम में कांग्रेस से भाजपा में शामिल होकर गीता कोड़ा भी चुनाव हार गयीं. झामुमो की जोबा मांझी से उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा. वोटरों ने दोनों को नकार दिया. वह भी तब, जब वोटरों के सामने भाजपा के सबसे बड़े ब्रांड नरेंद्र मोदी का चेहरा था. यह सही है कि चंपाई सोरेन कोल्हान में सरायकेला से छह बार चुनाव जीते हैं, लेकिन इससे भी बड़ा सच यह है कि कोल्हान में उनके विधानसभा चुनाव से बाहर उनकी बिसात कमजोर है. ऊपर से उनके बेटों के कारनामे हैं, सो अलग. इनमें सबसे खास- चंचल और उसकी चंचलता चंपाई सोरेन के लिए सबसे घातक है. तह में झांकने का प्रयास करें, तो ‘चंचल की चंचलता’ ने ही चंपाई सोरेन को आज इन हालात तक पहुंचा दिया है. गौर कीजिए, हेमंत सोरेन जब जेल जा रहे थे, तब उन्होंने चंपाई सोरेन के नाम को आगे किया.
जाहिर है, हेमंत ने उन पर सबसे अधिक भरोसा जताया. बाद में हुआ क्या ? भरोसा टूटा कैसे? इन सबके पीछे ‘चंचल की चंचलता’ खासी चर्चा में हैं. झामुमो के लोग बताते हैं, चंपाई सोरेन के कार्यकाल में चंचल ने एक नयी लॉबी तैयार की.. इसमें किसी को दिक्कत नहीं थी. दिक्कत तब हुई, जब चंचलता बढ़ती चली गयी और हेमंत के विश्वसनीय तमाम सलाहकार, पार्टी नेताओं और ब्यूरोक्रेट्स को किनारे कर दिया गया और कड़वाहट बढ़ती चली गयी. कई को कई मौके पर अपमानित भी किया गया.खैर, पांच माह बाद हेमंत सोरेन जेल से जमानत पर छूटे. क्या चंपाई सोरेन को यह नहीं पता था कि 2019 में किसके नाम पर वोट मिला था. झामुमो को सबसे अधिक सीटें मिली थी. पता था, वह पद भी छोड़ना चाहते थे, लेकिन ‘चंचलता’ यहां भी हस्तक्षेप कर गयी. और वह ना तो पद छोड़ने को तैयार हुए ना ही कामकाज के तरीकों को बदलने को राजी थे. ‘चंचलता’ हर जगह हावी रही. यहां तक कि इंडिया गठबंधन की पार्टियां जिस नये कानून का विरोध करती रही है, उसके लागू होने पर स्वागत में अखबारों में पहले पन्ने का विज्ञापन जारी कर दिया गया. संभव है एक राज्य के तौर पर यह सही हो पर पार्टी के तौर पर ! चंपाई सोरेन को इस बात की तकलीफ है कि वह मुख्यमंत्री थे, लेकिन विधायक दल की बैठक की जानकारी उन्हें नहीं थी. शायद वह भूल गये, जब इंडिया गठबंधन के तमाम विधायकों ने हस्ताक्षर कर दिये थे और हेमंत सोरेन ने बिना किसी से पूछे चंपाई सोरेन का नाम कागज पर लिख दिया था. तब कौन सा लोकतांत्रिक तरीके से विधायक दल के नेता का चुनाव हुआ था?
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