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कैसे रूके अवैध खनन-परिवहन? खान विभाग के पास न अफसर, न गाड़ी, न सर्वेयर, सुरक्षा राम भरोसे

खान विभाग का तंत्र फेल है. संसाधनों की कमी है. राज्य के 24 जिलों में जिला खनन पदाधिकारियों के पास अपना सरकारी वाहन तक नहीं है. जांच और निरीक्षण के लिए किराये के वाहनों पर निर्भर हैं. राज्य में 37 माइनिंग इंस्पेक्टर हैं. इस हिसाब से 24 जिलों में औसतन दो से भी कम इंस्पेक्टर उपलब्ध हैं.
 
AI से तैयार सांकेतिक तस्वीर

Ranchi: झारखंड का खान एवं भूतत्व विभाग सरकार को राजस्व देने वाले प्रमुख विभागों में है. वाणिज्यकर के बाद खान विभाग का राजस्व संग्रह में दूसरा स्थान है. आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार खनन से राज्य के अपने गैर-कर राजस्व में करीब 85 प्रतिशत हिस्सेदारी आती है. वित्तीय वर्ष 2025-26 में विभाग ने 3,885.11 करोड़ रुपये के लक्ष्य के विरुद्ध 4,013.53 करोड़ रुपये राजस्व जुटाया. चालू वित्तीय वर्ष के लिए 4,500 करोड़ रुपये का लक्ष्य है.

 

इसके बावजूद फील्ड में खान विभाग का तंत्र फेल है. संसाधनों की कमी है. राज्य के 24 जिलों में जिला खनन पदाधिकारियों के पास अपना सरकारी वाहन तक नहीं है. जांच और निरीक्षण के लिए किराये के वाहनों पर निर्भर हैं. राज्य में 37 माइनिंग इंस्पेक्टर हैं. इस हिसाब से 24 जिलों में औसतन दो से भी कम इंस्पेक्टर उपलब्ध हैं.

 

सबसे बड़ी कमी सर्वे के स्तर पर है. विभाग के पास अपना एक भी सर्वेयर नहीं है. जबकि लीज क्षेत्र की सीमा, स्वीकृत क्षेत्र से बाहर खनन और वास्तविक उत्खनन की मात्रा का पता लगाने में सर्वेयर की भूमिका महत्वपूर्ण होती है. सर्वे की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होने से लीज क्षेत्रों की नियमित निगरानी होती ही नहीं.

 

बिहार में खनन विभाग का अपना पुलिस बल

पड़ोसी राज्य बिहार में खनन विभाग के लिए अलग सुरक्षा और प्रवर्तन व्यवस्था का प्रावधान है. खनन विभाग पुलिस, सेवानिवृत्त रक्षा कर्मियों और अर्द्धसैनिक बलों को खान पुलिस के रुप में नियुक्त करती है. इससे अवैध खनन या खनिज परिवहन की सूचना मिलने पर विभाग कार्रवाई करती है. बिहार में खान विभाग के अफसर कभी-कभी राज्य पुलिस की मदद जरुर लेते हैं, लेकिन निर्भर नहीं रहते.

 

झारखंड में स्थिति अलग है. यहां जिला खनन पदाधिकारी को कार्रवाई के लिए स्थानीय पुलिस या जिला पुलिस से फोर्स मांगना पड़ता है. जिला स्तर की पुलिसिंग में भ्रष्टाचार है, जवानों की कमी भी है. इसलिए समय पर फोर्स मिलता ही नहीं है. बिना पुलिस के छापेमारी करना यानी जान का खतरा, जिसे कोई भी माइनिंग अफसर उठाना नहीं चाहते. 

 

ओडिशा में इंस्पेक्टर के साथ सर्वेयर भी

पड़ोसी राज्य ओडिशा में खनन निगरानी के लिए अलग प्रशासनिक और तकनीकी ढांचा उपलब्ध है. माइनिंग अधिकारियों और इंस्पेक्टरों के साथ सर्वेयर की व्यवस्था भी है. खनन वाले बड़े जिलों में फील्ड स्तर पर अलग-अलग अधिकारियों और तकनीकी कर्मचारियों की टीम काम करती है. लीज क्षेत्र की सीमा और खनन की मात्रा की जांच के लिए सर्वे और तकनीकी संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है.

 

इसके मुकाबले झारखंड में माइनिंग इंस्पेक्टरों की संख्या कम है और अपना सर्वेयर तक नहीं है. वाहन की कमी अलग समस्या है. ऐसे में अधिकारियों पर राजस्व वसूली के साथ अवैध बालू, कोयला, बॉक्साइट, पत्थर और ग्रेनाइट खनन रोकने की दोहरी जिम्मेदारी है, जिसे निभाना संभव ही नहीं है.

 

कमाई वाले विभाग का फील्ड तंत्र कमजोर

खनन विभाग के सामने चुनौती केवल राजस्व बढ़ाने की नहीं है. अवैध खनन और परिवहन रोकना भी उतना ही जरूरी है. पर्याप्त अधिकारी, वाहन, सर्वेयर और अपना पुलिस बल नहीं होने से विभाग की फील्ड कार्रवाई प्रभावित हो रही है. 

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