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नक्सलियों का नेटवर्क तोड़ने में कामयाब झारखंड पुलिस, अपराधी संगठनों पर शिकंजा कसना अभी चुनौती, पढ़ें क्राइम स्टोरी

Ranchi News :  नक्सलवाद के कमजोर पड़ते ही अपराध की दुनिया में एक नया खालीपन पैदा हुआ और इस खाली जगह को संगठित आपराधिक गिरोहों ने भरना शुरू कर दिया. अब बंदूक जंगल में नहीं, बल्कि शहर, कारोबार, जमीन, कोयला, बालू, कंस्ट्रक्शन साइट और ठेकेदारी के बीच दिखाई दे रही है. यही वजह है कि नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक बढ़त बनाने वाली झारखंड पुलिस के सामने अब संगठित अपराध सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है.
 
आईजी अभियान नरेंद्र सिंह
  • 193 अपराधी गिरफ्तार, 63 हथियार और 274 गोलियां बरामद
  • 47 अपराधी जिला बदर, 9 पर लुकआउट नोटिस
  • बड़े सरगनाओं पर कार्रवाई के बाद भी रंगदारी, जमीन कब्जे और लेवी का खेल बदस्तूर जारी

Ranchi News :  झारखंड में कभी नक्सलवाद पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती हुआ करता था. जंगलों में बंदूक की गूंज और नक्सली दस्तों की मौजूदगी ने लंबे समय तक पूरे इलाकों में खौफ कायम रखा. वक्त बदला, रणनीति बदली और पुलिस के ऑपरेशन ने नक्सली नेटवर्क की कमर तोड़ दी. कई बड़े कमांडर मारे गए, गिरफ्तार हुए या संगठन छोड़कर मुख्यधारा में लौट आए.

 

लेकिन नक्सलवाद के कमजोर पड़ते ही अपराध की दुनिया में एक नया खालीपन पैदा हुआ और इस खाली जगह को संगठित आपराधिक गिरोहों ने भरना शुरू कर दिया. अब बंदूक जंगल में नहीं, बल्कि शहर, कारोबार, जमीन, कोयला, बालू, कंस्ट्रक्शन साइट और ठेकेदारी के बीच दिखाई दे रही है. यही वजह है कि नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक बढ़त बनाने वाली झारखंड पुलिस के सामने अब संगठित अपराध सबसे बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है.अपराध की दुनिया का नया उसूल साफ है. पहले खौफ पैदा करो, फिर वसूली करो और उस पैसे से अपना नेटवर्क मजबूत करो.

 

प्रिंस खान गैंग, राहुल दुबे गैंग, राहुल सिंह गैंग, अखिलेश सिंह गैंग, अमन साहू गैंग, सुजीत सिन्हा गैंग, डब्लू सिंह गैंग और पांडे गिरोह समेत कई आपराधिक नेटवर्क के नाम अलग-अलग मामलों में सामने आते रहे हैं. बड़े सरगनाओं पर कार्रवाई के बावजूद इनके नेटवर्क को पूरी तरह खत्म करना पुलिस के लिए आसान नहीं है.

 

193 अपराधी गिरफ्तार, फिर भी चुनौती बरकरार

झारखंड पुलिस मुख्यालय के जनवरी से जुलाई 2026 तक के आंकड़ों के अनुसार, संगठित आपराधिक गिरोहों के खिलाफ अभियान में 193 अपराधियों को गिरफ्तार किया गया. इनके पास से 63 हथियार और 274 गोलियां बरामद हुईं. वहीं 47 अपराधियों को जिला बदर किया गया, जबकि 9 के खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया.

 

आंकड़े पुलिस की कार्रवाई की तस्वीर जरूर दिखाते हैं, लेकिन दूसरी तरफ रंगदारी, फायरिंग और जमीन कब्जे की घटनाएं यह भी बताती हैं कि अपराध का नेटवर्क अभी पूरी तरह बेनकाब नहीं हुआ है.यानी मामला सिर्फ अपराधी को पकड़ने का नहीं है. असली सवाल यह है कि जिस सिस्टम और पैसे के दम पर अपराधी दोबारा खड़े हो जाते हैं, उस पूरी जड़ को कैसे काटा जाए.

 

अब अपराधी की जेब पर वार करेगी पुलिस

पुलिस ने भी अब अपना तरीका बदलने की तैयारी शुरू कर दी है. सिर्फ अपराधी की गिरफ्तारी नहीं, बल्कि उसकी आर्थिक ताकत पर चोट करने की रणनीति तैयार की जा रही है.संगठित अपराधियों की चल-अचल संपत्ति, बैंक खाते, आर्थिक लेन-देन और वित्तीय नेटवर्क की जानकारी जुटाई जा रही है. यह पता लगाने की कोशिश हो रही है कि अपराध से कमाया गया पैसा कहां जा रहा है और किन कारोबारों में लगाया जा रहा है.

 

 150 से ज्यादा प्रोफाइल तैयार, गैंगस्टर नेटवर्क पर सीधा फोकस

अब तक लगभग 150 लोगों की विस्तृत प्रोफाइल तैयार की जा चुकी है, जो कुख्यात अपराधी गिरोहों से जुड़े बताए जा रहे हैं. जांच के दायरे में प्रमुख गैंग नेटवर्क शामिल हैं जिनमें राहुल सिंह गिरोह, राहुल दुबे नेटवर्क, प्रिंस खान गैंग, सुजीत सिन्हा गैंग और अमन साव का नेटवर्क और पांडेय गिरोह शामिल है. इनमें गुर्गों के साथ-साथ संरक्षण देने वाले लोग और कई मामलों में पारिवारिक सदस्य भी जांच के घेरे में हैं. एटीएस की टीमें सीधे वर्तमान और पूर्व अपराधियों के घर पहुंचकर भौतिक सत्यापन कर रही हैं, ताकि गैंगस्टर नेटवर्क की आर्थिक जड़ों तक पहुंचा जा सके.

 

 आईजी अभियान नरेंद्र सिंह ने क्या कहा

आईजी अभियान नरेंद्र सिंह के मुताबिक संगठित अपराध से जुड़े अपराधियों के साथ उनके सहयोगियों की भी जानकारी जुटाई जा रही है. आर्थिक मदद करने वाले, लॉजिस्टिक सपोर्ट देने वाले, ठिकाना उपलब्ध कराने वाले और किसी दूसरे तरीके से मदद करने वालों की पहचान की जा रही है.पुलिस एक ऑनलाइन डिजिटल डेटाबेस भी तैयार कर रही है. इसमें अपराधियों के आपराधिक रिकॉर्ड के साथ उनके सहयोगियों, संपत्ति, बैंक खातों और पूरे नेटवर्क की जानकारी एक जगह दर्ज होगी.

 

आईजी अभियान के मुताबिक मकसद सिर्फ एक अपराधी को गिरफ्तार करना नहीं है, बल्कि उसके पूरे नेटवर्क तक पहुंचना है. यानी एक को पकड़कर कहानी खत्म नहीं होगी, बल्कि यह पता लगाया जाएगा कि उसके पीछे कौन है, पैसा कौन दे रहा है और हथियार से लेकर ठिकाने तक की व्यवस्था कौन कर रहा है.

 

बड़े नाम गए, लेकिन रंगदारी की कहानी खत्म नहीं हुई

अमन साहू और सुजीत सिन्हा जैसे बड़े नामों के खिलाफ कार्रवाई हुई. अमन सिंह की जेल में हत्या हुई और डब्लू सिंह के आत्मसमर्पण के बाद उम्मीद जगी कि रंगदारी और लेवी के नेटवर्क पर लगाम लगेगी.लेकिन अपराध की दुनिया में एक कहावत है. एक दरवाजा बंद होता है तो दूसरा खोलने की कोशिश शुरू हो जाती है.यही तस्वीर झारखंड में भी दिखाई दे रही है. पुराने नाम कमजोर पड़े तो नए चेहरे सामने आने लगे. फिलहाल राहुल दुबे, राहुल सिंह और प्रिंस खान जैसे गिरोहों के नाम कंस्ट्रक्शन साइट, औद्योगिक इलाकों और कारोबारियों से जुड़ी रंगदारी की घटनाओं में सामने आते रहे हैं.

 

धनबाद में प्रिंस खान का खौफ

धनबाद और वासेपुर में प्रिंस खान का नाम लंबे समय से संगठित अपराध और रंगदारी से जुड़े मामलों में सामने आता रहा है. कारोबारियों और ठेकेदारों को धमकी देने से लेकर रेलवे टेंडर और निर्माण से जुड़े कारोबार तक में उसके नेटवर्क का नाम सामने आया है.अपराध का तरीका भी बदला है. पहले धमकी, फिर खौफ और उसके बाद रंगदारी. पहले फोन आता है, फिर फरमान सुनाया जाता है और उसके बाद रकम नहीं देने पर अंजाम भुगतने की धमकी.”यही वह मॉडल है, जिसके जरिए संगठित अपराध अपना दबदबा कायम रखने की कोशिश करता है. जमीन अब अपराध की सबसे बड़ी कमाई का जरिया?

 

संगठित अपराध का सबसे गंभीर पहलू अब जमीन कारोबार से जुड़ता दिखाई दे रहा है. पलामू, गढ़वा, लातेहार, रांची, खूंटी और जमशेदपुर समेत कई इलाकों में जमीन विवाद और कब्जे के मामलों में आपराधिक तत्वों की भूमिका के आरोप सामने आते रहे हैं.आरोप है कि कमजोर और गरीब जमीन मालिकों पर दबाव बनाया जाता है. हथियार का डर दिखाकर जमीन खाली कराने या जबरन समझौता कराने की कोशिश होती है. इसके बाद वही जमीन ऊंची कीमत पर बेचकर मोटी रकम कमाने का खेल चलता है.

 

यानी जमीन अब सिर्फ जमीन नहीं रही. यह अपराध की अर्थव्यवस्था का एक अहम हिस्सा बनती जा रही है.अपराध से आया पैसा जमीन में लगता है, जमीन से पैसा बनता है और उसी पैसे से फिर हथियार, आदमी और नेटवर्क तैयार होता है. यही वह दुष्चक्र है, जिसे तोड़ना पुलिस के लिए सबसे बड़ी चुनौती है.

 

पुलिस की भूमिका पर भी उठते रहे हैं सवाल

जमीन कब्जे के मामलों में स्थानीय स्तर पर पुलिस से मिलीभगत के आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं. कई पीड़ित आरोप लगाते हैं कि प्रभावशाली लोगों और अपराधियों के दबाव में उनकी शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं होती.

 

 कोयला, बालू और पत्थरों से भी अपराधी वसूली कर रहे हैं करोड़ों की लेवी

जमीन के बाद कोयला, बालू और पत्थर का कारोबार भी संगठित अपराधियों के लिए बड़ा आर्थिक क्षेत्र बनता जा रहा है.धनबाद, रामगढ़, लातेहार, पलामू चतरा और बोकारो जैसे इलाकों में लेवी और रंगदारी के मामले सामने आते रहे हैं. ट्रांसपोर्टर, आउटसोर्सिंग कंपनियां, ठेकेदार और कंस्ट्रक्शन कंपनियां अपराधियों के निशाने पर रहती हैं.कहीं काम बंद कराने की धमकी दी जाती है, कहीं वाहनों को निशाना बनाया जाता है और कहीं फायरिंग के जरिए दहशत पैदा की जाती है.

  
 
सोशल मीडिया भी बना अपराधियों का हथियार

अब अपराधियों ने सोशल मीडिया को भी अपने प्रचार और दहशत के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है. हथियार, महंगी गाड़ियों और दबदबे वाले वीडियो के जरिए अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की जाती है. यह सिर्फ दिखावा नहीं है. इसके पीछे इलाके में अपना रौब और रसूख कायम करने की कोशिश भी होती है. जितना खौफ, उतनी आसान रंगदारी. यही अपराधियों का नया डिजिटल फॉर्मूला बनता जा रहा है.

 

डिजिटल डेटाबेस से खुलेगा पूरे नेटवर्क का राज

 पुलिस अब अपराधियों की बिखरी हुई जानकारी को एक जगह जोड़ने की तैयारी में है.कौन अपराधी किस गैंग से जुड़ा है. उसकी संपत्ति कहां है. बैंक खाते कौन से हैं. किन लोगों से संपर्क है. कौन आर्थिक मदद करता है. कौन वाहन और हथियार उपलब्ध कराता है. कौन ठिकाना देता है. इन तमाम जानकारियों को डिजिटल डेटाबेस में जोड़ा जाएगा.

 

 नक्सलियों के बाद अब गैंगस्टरों से आर-पार की लड़ाई

नक्सली नेटवर्क और संगठित अपराध में फर्क है. नक्सली जंगल और ग्रामीण इलाकों में संगठन के जरिए प्रभाव कायम करते थे. नए दौर के अपराधी शहर, कारोबार, जमीन और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए अपना नेटवर्क बढ़ा रहे हैं.हालांकि कुछ जानकारो ने बताया कि जिस दिन अपराधी की बंदूक के साथ उसकी कमाई का रास्ता भी बंद हो गया, उसी दिन उसके नेटवर्क की असली कमर टूटेगी.

 

193 गिरफ्तारियां, 63 हथियार, 274 गोलियां, 47 जिला बदर और 9 लुकआउट नोटिस पुलिस की कार्रवाई की तस्वीर जरूर पेश करते हैं. लेकिन लगातार सामने आती रंगदारी, फायरिंग और जमीन कब्जे की घटनाएं बता रही हैं कि जंग अभी बाकी है.अब असली इम्तिहान यह है कि पुलिस अपराधियों को पकड़ने के साथ-साथ उनके फाइनेंसर, मददगार, संपत्ति और पूरे नेटवर्क तक कितनी तेजी से पहुंचती है.

 


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