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झारखंड: अपराध की दुनिया छोड़ चुके सफेदपोशों का खौफनाक अंत, पढ़ें स्पेशल क्राइम स्टोरी

Ranchi : झारखंड में अपराध और राजनीति का रिश्ता नया नहीं है. बीते दो दशकों में कई ऐसे नाम सामने आए, जिन्होंने कभी अपराध की दुनिया में दहशत का पर्याय बनकर पहचान बनाई, फिर कथित तौर पर अपराध से तौबा कर राजनीति या सामाजिक जीवन की मुख्यधारा में कदम रखा.


 
लेकिन उनकी नई पारी लंबी नहीं चल सकी - कुछ को चुनावी मैदान में चुनौती मिली, तो कुछ को गोलियों ने सदा के लिए खामोश कर दिया. इन हत्याओं ने न सिर्फ कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए, बल्कि यह भी सोचने पर मजबूर किया कि क्या अपराध की दुनिया से बाहर निकलना इतना आसान है?


विक्रम शर्मा: जमशेदपुर की हालिया घटना

 

हाल के दिनों में जमशेदपुर में कुख्यात अपराधी विक्रम शर्मा की गोली मारकर हत्या ने एक बार फिर राज्य को झकझोर दिया. बताया जाता है कि उन्होंने भी अपराध की दुनिया से दूरी बनाकर सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रियता बढ़ाने की कोशिश की थी.सीसीटीवी फुटेज और योजनाबद्ध तरीके से की गई इस वारदात ने यह संकेत दिया कि पुराने नेटवर्क और आपराधिक दुश्मनियां आसानी से खत्म नहीं होतीं.

 

राजेंद्र साहू: लातेहार की घटना

लातेहार जिले में राजेंद्र साहू की हत्या ने भी इसी बहस को और तेज कर दिया. स्थानीय स्तर पर प्रभाव रखने वाले राजेंद्र साहू का नाम पहले विवादों और दबंग छवि से जोड़ा जाता रहा, लेकिन बाद के समय में वे सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय बताए जाते थे.

 

उनकी हत्या के पीछे भी पुरानी रंजिश, वर्चस्व की लड़ाई और स्थानीय समीकरणों को कारण माना गया. इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा किया कि क्या अपराध की पृष्ठभूमि छोड़ने के बाद भी व्यक्ति पूरी तरह सुरक्षित हो पाता है.

 

रघुनाथ महतो: चुनावी रंजिश या पुरानी दुश्मनी?

झारखंड के गिरिडीह जिले में 2016 में पूर्व विधायक रघुनाथ महतो की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. वे कभी आपराधिक छवि के लिए चर्चित रहे, लेकिन बाद में राजनीति में सक्रिय होकर विधायक बने. उनकी हत्या उस समय हुई जब वे अपने समर्थकों के बीच थे. पुलिस जांच में चुनावी रंजिश और पुरानी दुश्मनी जैसे एंगल सामने आए. इस घटना ने साफ कर दिया कि राजनीति में आने के बाद भी पुराने रिश्ते और दुश्मनियां पीछा नहीं छोड़तीं.

 


रमेश सिंह मुंडा: उग्रवाद से मुख्यधारा तक

रांची जिला के तमाड़ क्षेत्र से विधायक रहे रमेश सिंह मुंडा की 2008 में उग्रवादियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी. माना जाता है कि उनका अतीत भी संघर्षों और विवादों से भरा रहा, लेकिन वे लोकतांत्रिक राजनीति में सक्रिय थे. उनकी हत्या ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या पूर्व पृष्ठभूमि के कारण वे निशाने पर थे या यह राजनीतिक संदेश देने की कोशिश थी? इस घटना ने राज्य की सुरक्षा व्यवस्था पर भी गंभीर प्रश्न उठाए.


पलामू के बॉबी खान और विनोद सिंह का मामला

पलामू जिला में बॉबी खान और विनोद सिंह के नाम भी ऐसे ही मामलों में चर्चा में रहे. स्थानीय स्तर पर दोनों की पहचान पहले दबंग छवि वाले व्यक्तियों के रूप में रही, लेकिन बाद के वर्षों में उन्होंने कथित तौर पर अपराध से दूरी बनाकर सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में सक्रियता बढ़ाई.


हालांकि  उनकी हत्या की घटनाओं ने यह संकेत दिया कि पुराने विवाद और आपसी रंजिश खत्म नहीं हुई थी. पुलिस जांच में वर्चस्व की लड़ाई और पुरानी दुश्मनी जैसे कारणों की चर्चा सामने आई. इन घटनाओं के बाद इलाके में कानून-व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठे थे.

 


गढ़वा के जाटू खान की हत्या


गढ़वा जिला में जाटू खान का नाम भी इसी संदर्भ में लिया जाता है. बताया जाता है कि उन्होंने अपराध की दुनिया से दूरी बनाकर शांतिपूर्ण जीवन और राजनीतिक गतिविधियों की ओर रुख किया था. लेकिन उनकी हत्या ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या अपराध की दुनिया छोड़ने के बाद भी व्यक्ति पूरी तरह सुरक्षित हो पाता है?

 

बदलते समीकरण और बढ़ता खतरा

झारखंड के कई जिलों - रांची, धनबाद, पलामू, हजारीबाग, बोकारो और गिरिडीह में ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहां अपराध की दुनिया में सक्रिय रहे लोग बाद में किसी राजनीतिक दल से जुड़ गए या चुनावी मैदान में उतरने की तैयारी करने लगे. कुछ ने सामाजिक कार्यों के जरिए अपनी छवि बदलने की कोशिश की. लेकिन जैसे ही वे प्रभावशाली होने लगे, पुराने प्रतिद्वंद्वी सक्रिय हो गए.

 

पुलिस अधिकारियों का मानना है कि अपराध से राजनीति में आने वाले लोगों के लिए सबसे बड़ा खतरा उनके पुराने ‘कनेक्शन’ होते हैं. कई बार वे खुद को सुरक्षित मान लेते हैं, लेकिन आपराधिक गिरोहों के बीच बदले की भावना या वर्चस्व की लड़ाई उन्हें निशाना बना देती है.

 

राजनीतिक संरक्षण और आपराधिक पृष्ठभूमि


विशेषज्ञों का कहना है कि झारखंड जैसे खनन और ठेका आधारित अर्थव्यवस्था वाले राज्य में स्थानीय स्तर पर दबंगई और राजनीतिक प्रभाव का सीधा संबंध रहा है. जब कोई अपराधी राजनीति में प्रवेश करता है, तो उसे राजनीतिक संरक्षण भी मिलता है. लेकिन यही संरक्षण प्रतिद्वंद्वियों की नजर में चुनौती बन जाता है.

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, चुनावी  राजनीति में ‘मजबूत’ उम्मीदवार की तलाश में कई दल ऐसे चेहरों को भी मौका देते हैं, जिनकी पृष्ठभूमि विवादित रही हो. हालांकि समय के साथ कुछ लोग वास्तव में मुख्यधारा में आकर सामाजिक कार्यों में लग जाते हैं, लेकिन उनके अतीत की परछाईं पूरी तरह मिट नहीं पाती.

 

गैंगवार और बदले की राजनीति


धनबाद-झरिया कोयलांचल क्षेत्र में गैंगवार का लंबा इतिहास रहा है. यहां कोयला कारोबार और ठेकेदारी को लेकर कई आपराधिक गिरोह सक्रिय रहे. इनमें से कुछ चेहरों ने राजनीति में दखल देने की कोशिश की, लेकिन उन्हें प्रतिद्वंद्वी गिरोहों का सामना करना पड़ा. कई मामलों में हत्या के पीछे आर्थिक हित, पुरानी रंजिश और राजनीतिक महत्वाकांक्षा का मिश्रण देखने को मिला.
पलामू और गढ़वा क्षेत्र में भी उग्रवाद, आपराधिक गतिविधियों और स्थानीय राजनीति का जटिल समीकरण रहा है. यहां भी ऐसे उदाहरण सामने आए, जहां पूर्व आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति की हत्या कर दी गई, भले ही वह सक्रिय राजनीति में आ चुका हो.

 

कानून-व्यवस्था पर सवाल

इन घटनाओं के बाद हर बार पुलिस ने सख्त कार्रवाई का दावा किया. कई मामलों में आरोपियों की गिरफ्तारी भी हुई, लेकिन यह सवाल आज भी कायम है कि क्या ऐसे लोगों को पर्याप्त सुरक्षा मिलती है? क्या अपराध से राजनीति में आने वाले लोगों की निगरानी या पुनर्वास की कोई ठोस व्यवस्था है?


कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई व्यक्ति अपराध छोड़कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होता है, तो उसे सुरक्षा और पुनर्वास का अवसर मिलना चाहिए. लेकिन इसके लिए जरूरी है कि वह पूरी तरह आपराधिक नेटवर्क से दूरी बनाए और कानून के दायरे में रहे.

 

समाज के लिए संदेश


इन हत्याओं ने समाज को एक मिश्रित संदेश दिया है. एक ओर यह दिखाता है कि अपराध की दुनिया से बाहर निकलना जोखिम भरा हो सकता है, दूसरी ओर यह भी कि पुरानी दुश्मनी और अवैध नेटवर्क आसानी से खत्म नहीं होते.

 


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