Ranchi: भूमि सुधार और गरीबों के हक की दिशा में वर्षों से कार्यरत जाने-माने गांधीवादी विचारक पीवी राजगोपाल इन दिनों विश्व शांति पुरस्कार को लेकर चर्चा में हैं. उन्हें यह पुरस्कार जापान सरकार की ओर से आगामी 23 मई को टोक्यो में दिया जाएगा. भूमि सुधार की दिशा में वह किन कदमों को जरूरी मानते हैं. गांवों के बढ़ते शहरीकरण को वह किस नजरिये से देखते हैं? भूमि संबंधी कानूनों को लेकर वह क्या सोचते हैं? ऐसे ही कई बिंदुओं पर पीवी राजगोपाल ने दैनिक शुभम संदेश के प्रमुख संवाददाता प्रवीण कुमार से खुलकर बात की. पेश हैं बातचीत के मुख्य अंश...
सवाल : गांवों के शहरीकरण को आप किस तरह देखते हैं?
जवाब : आज लोग गांव छोड़ कर शहरों की ओर आ रहे हैं. पिछले 40 वर्षों में 93 हजार गांव बर्बाद हो चुके हैं. अगर हम इसी तरह उद्योग, सुपरबाजार और फ्लाईओवर बनाने पर जोर देते रहे तो ज्यादा से ज्यादा लोगों को गांव छोड़ कर शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों में रहने को मजबूर होना पड़ेगा. गांव की सभ्यता संस्कृति नष्ट हो जाएगी. कोरोना काल में केंद्र सरकार चाहती थी कि लोग अपने घर वापस जाएं. लेकिन उनके पास घर भी नहीं था. गांवों को उजाड़कर शहर बसाने की प्रक्रिया भारत को कमजोर कर रही है. यह झारखंड पर भी लागू होता है. झारखंड के गांवों को समृद्ध किए बिना राज्य का विकास नहीं हो सकता. सवाल : देश में लाखों लोग के पास अपना घर नहीं है. आप इसे कैसे देखते हैं?
जवाब : भारत में करीब चार करोड़ लोगों के पास खुद की जमीन तक नहीं है. करीब 30 फीसदी ऐसे लोग हैं जो खेती से जुड़े हैं, लेकिन उनके पास कृषि योग्य भूमि नहीं है. वे बड़े-बड़े जमीदारों की जमीनों पर फसल उगाते हैं. मुख्यमंत्रियों और मुख्य सचिवों की खुद की कृषि भूमि है. जमीन उनके पास है जिनका खेती से कोई लेना-देना नहीं है. आवासीय भूमि विधेयक का प्रारूप सभी राज्य सरकारों को भेजा गया था. हर किसी को कम से कम 10 डिसमिल आवासीय भूमि मिलनी ही चाहिए. देश में ऐसे लोग भी हैं जिनकी जमीन खनन, बिजली परियोजना, राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव संरक्षण के नाम पर चली गई है. वन्य अधिकार अधिनियम को सशक्त रूप से लागू किया जाए, जिससे लोगों को उनकी खोई जमीन मिल सके. आप देख सकते हैं कि नया भूमि अधिग्रहण कानून भी किसानों के हित की बात नहीं करता. उसमें भी कहा जा रहा है किसानों को उनकी जमीन के बदले चार गुना ज्यादा मुआवजा दिलाया जाएगा. इसमें एक तरह से ग्रामीणों से कहा जा रहा है कि जमीन के पैसे लो और शहरों में जाओ, वहां झुग्गियों में रहो. सरकार की इस सोच के चलते हजारों गांव बर्बाद हो रहे हैं. सवाल : क्या आपको लगता है कि गरीबों को देने के लिए सरकार के पास पर्याप्त जमीन है?
जवाब : जी हां बिल्कुल, लेकिन यह सरकार की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह किसे जमीन देना चाहती है और किसे नहीं. अभी तक देश में हजारों एकड़ जमीन उद्योगपतियों को दी जा चुकी है. लेकिन किसानों को देने के लिए उनके पास जमीन नहीं है. वैसे भी हम किसानों के लिए कोई नई जमीन नहीं मांग रहे हैं. हम तो बस उपलब्ध जमीन को सुनियोजित करने की बात कर रहे हैं. [wpse_comments_template]
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