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झारखंड की सेहत ही खराबः 19,125 करोड़ का कोई हिसाब-किताब नहीं, अब तक यूटिलिटि सर्टिफिकेट भी जमा नहीं

सीएजी रिपोर्ट से खड़े हो रहे सवाल आखिर इस भ्रष्टाचार और लापरवाही की जिम्मेदारी कौन लेगा? Pravin Kumar Ranchi: झारखंड की स्वास्थ्य सेवाओं की जर्जर हालत पर सीएजी की रिपोर्ट ने बड़ा पर्दाफाश किया है. सरकारी योजनाओं में घोटाले, कोविड फंड की बर्बादी, दवाओं की कमी और मातृत्व लाभ में गड़बड़ियां हर तरफ अनियमितताओं का बोलबाला है. सीएजी की रिपोर्ट में कहा गया है कि चिकित्सकों और दवाओं की कमी, कोविड फंड का सही उपयोग न होना, आयुष्मान भारत और अबुआ स्वास्थ्य योजना के क्रियान्वयन में धांधली जैसे मुद्दे अराजक व्यवस्था को दर्शने के लिए काफी है. झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था सुधार की सख्त जरूरत है. सरकार अगर जल्द ही आवश्यक कदम नहीं उठाती, तो राज्य की जनता को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिलने में और ज्यादा कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा. इसे भी पढ़ें -झारखंड">https://lagatar.in/the-world-trusts-jharkhands-economy-fdi-reached-90-crores-in-the-financial-year-2023-24/">झारखंड

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जरूरी दवाओं की भारी किल्लत

राज्य के सरकारी अस्पतालों में हालात इतने खराब हैं कि 65% से 95% तक जरूरी दवाएं उपलब्ध ही नहीं थीं. सरकार के दावे खोखले साबित हो रहे हैं और मरीजों को इलाज के लिए दर-दर भटकना पड़ रहा है. रिपोर्ट कहती है कि एक ओर जहां अस्पताल, इंडोर, ओपीडी, आईसीयू में जरूरी और आपातकालीन दवाओं की कमी है. वहीं झारखंड में दवा खरीद के लिए बनाए गए कॉर्पोरेशन के पास 1395.67 करोड़ रुपये रहने के बावजूद 2016 से 2022 तक दवा और उपकरणों की खरीद पर सिर्फ 279.39 करोड़ (20%) खर्च हो पायी. कॉरपोरेशन 77% से 88% आवश्यक दवा नहीं खरीद पाया. नतीजा यह हुआ कि अस्पतालों में दवाओं की कमी रही.

कोविड फंड घोटाला: पैसा आया, लेकिन खर्च नहीं हुआ

केंद्र ने कोविड-19 प्रबंधन के लिए 483.54 करोड़ रुपये जारी किए, राज्य को 272.88 करोड़ रुपये जोड़ने थे. लेकिन कुल 756.42 करोड़ रुपये में से सिर्फ 137 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके. नतीजा-आरटी-पीसीआर लैब, ऑक्सीजन प्लांट और अस्पतालों की बुनियादी सुविधाएं अधूरी रह गईं. सरकारी लापरवाही का खामियाजा जनता भुगत रही है.

19,125 करोड़ रुपये का कोई हिसाब नहीं

वित्तीय अनियमितताओं का आलम यह है कि 2023-24 में विभिन्न विभागों को दिए गए 19,125.88 करोड़ रुपये की राशि का कोई उपयोगिता प्रमाण पत्र तक जमा नहीं किया गया. यानी सरकारी खजाने से पैसा निकला, लेकिन गया कहां इसका कोई रिकॉर्ड नहीं. क्या ये पैसा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया? ऑडिट रिपोर्ट ने एक और बड़ी गड़बड़ी यह पकड़ी गई है कि झारखंड मेडिकल एंड हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट एंड प्रोक्योरमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने 2018-19 और 2021-22 में प्रतिबंधित कंपनी से 9.55 करोड़ की दवा खरीद की है.

मातृत्व लाभ योजना में खुली लूट

बोकारो और धनबाद में मातृत्व लाभ योजना में खुला खेल खेला गया. चार महीने के अंदर ही एक ही महिला को दो बार लाभ दे दिया गया और हर बार 1,500 रुपये की अनुग्रह राशि दी गई. यह सिर्फ एक उदाहरण है, असल में इस तरह की अनगिनत गड़बड़ियां हो रही हैं.

आयुष्मान भारत और अबुआ स्वास्थ्य योजना में धांधली

हेमंत सरकार की ‘अबुआ स्वास्थ्य योजना’ के नाम पर गरीबों को ठगा जा रहा है. योजना की शर्तें ऐसी रखी गईं कि सिर्फ बड़े कॉरपोरेट अस्पतालों को फायदा मिले, जबकि ग्रामीण इलाकों के अस्पतालों को इससे बाहर कर दिया गया. क्या सरकार सिर्फ बड़े अस्पतालों को फायदा पहुंचाना चाहती है? गरीबों के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं सिर्फ एक दिखावा बनकर रह गई है.

निजी अस्पतालों की मौज, सरकारी सिस्टम फेल

सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली ने निजी अस्पतालों की चांदी कर दी है. सरकारी सिस्टम पूरी तरह फेल हो चुका है और आम जनता को इलाज के लिए महंगे निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ रहा है. अगर सरकार ने जल्द ही जरूरी कदम नहीं उठाए, तो झारखंड की जनता को बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं से भी वंचित रहना पड़ेगा. सवाल यह है कि आखिर इस भ्रष्टाचार और लापरवाही की जिम्मेदारी कौन लेगा? इसे भी पढ़ें -अंतर्राष्ट्रीय">https://lagatar.in/jharkhand-remains-an-international-identity-more-than-one-crore-foreign-guests-visited-the-state/">अंतर्राष्ट्रीय

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