26 जनवरी भारत के लिए सिर्फ़ एक तारीख नहीं, बल्कि यह उस संवैधानिक चेतना का प्रतीक है जिसमें लोकतंत्र, समानता और न्याय की आत्मा बसती है. गणतंत्र दिवस हमें यह याद दिलाता है कि सत्ता का असली स्रोत जनता है और शासन का उद्देश्य जनता का कल्याण. ऐसे में झारखंड जैसे नवगठित राज्य की राजनीति को गणतंत्र के आईने में देखना बेहद ज़रूरी हो जाता है. झारखंड, जो 15 नवंबर 2000 को अस्तित्व में आया, आज अपने गठन के 25 वर्षों से अधिक का सफ़र तय कर चुका है. इस दौरान इसकी राजनीति ने उम्मीद, संघर्ष, अस्थिरता, प्रयोग और आत्ममंथन सब कुछ देखा है.
झारखंड राज्य का जन्म ही राजनीतिक संघर्ष की कोख से हुआ. अलग राज्य की मांग दशकों पुरानी थी, जिसकी जड़ें आदिवासी अस्मिता, प्राकृतिक संसाधनों पर अधिकार और क्षेत्रीय उपेक्षा में थीं. बिहार से अलग होकर बने इस राज्य से यह उम्मीद थी कि यहां की राजनीति स्थानीय आकांक्षाओं को प्राथमिकता देगी, आदिवासी समाज को निर्णायक भूमिका मिलेगी और विकास की दिशा दिल्ली या पटना नहीं, बल्कि रांची से तय होगी. लेकिन गणतंत्र की इन अपेक्षाओं को व्यवहार में उतारना इतना आसान नहीं रहा.
राज्य गठन के बाद शुरुआती वर्षों में झारखंड की राजनीति अस्थिरता का पर्याय बन गई. 2000 से 2005 के बीच सरकारें बनीं, टूटीं, बदलीं. कभी जोड़-तोड़, कभी दलबदल राजनीति का केंद्र जनहित से अधिक सत्ता प्रबंधन बनता चला गया. यह वही दौर था जब लोकतंत्र की संस्थागत मजबूती की जगह राजनीतिक अवसरवाद हावी दिखाई दिया. गणतंत्र की भावना, जिसमें स्थिर सरकार और जवाबदेह शासन की कल्पना की गई थी, वह कमजोर पड़ती दिखी.
2005 के बाद अपेक्षा जगी कि राजनीतिक स्थिरता विकास का रास्ता खोलेगी. भाजपा नेतृत्व में बनी सरकार ने इंफ्रास्ट्रक्चर, सड़क और औद्योगिक निवेश की बात की. लेकिन झारखंड की राजनीति में विकास की बहस हमेशा संसाधनों के सवाल से जुड़ी रही. खनिज संपदा से भरपूर राज्य होते हुए भी गरीबी, बेरोजगारी और विस्थापन की समस्या जस की तस बनी रही. गणतंत्र का वादा था कि संसाधनों पर पहला अधिकार जनता का होगा, लेकिन जमीन अधिग्रहण, खनन लीज और कॉरपोरेट हितों के टकराव ने राजनीति को बार-बार कठघरे में खड़ा किया.
2010 से 2014 का दौर भी राजनीतिक अस्थिरता से मुक्त नहीं रहा. राष्ट्रपति शासन, अल्पकालिक सरकारें और गठबंधन की मजबूरियां झारखंड की पहचान बनती चली गईं. इस दौरान जनता के मन में यह सवाल गहराता गया कि क्या राज्य गठन का सपना सिर्फ सत्ता के नए केंद्र बनाने तक सीमित रह गया है. गणतंत्र की भावना, जिसमें जनता की भागीदारी और नीति निर्माण में पारदर्शिता होनी चाहिए थी, वह अपेक्षाकृत कमजोर रही.
2014 में एक बार फिर पूर्ण बहुमत की सरकार बनी और स्थिरता की उम्मीद जगी. इस दौर में केंद्र और राज्य में एक ही पार्टी की सरकार होने का लाभ झारखंड को मिलने की बात कही गई. योजनाएं आईं, निवेश सम्मेलन हुए, बड़े-बड़े दावे किए गए. लेकिन जमीन स्तर पर आदिवासी अधिकार, स्थानीय नियोजन नीति और रोजगार जैसे मुद्दे लगातार राजनीति के केंद्र में बने रहे. पेसा कानून, सीएनटी-एसपीटी एक्ट जैसे संवेदनशील सवालों पर सरकारों का रुख राजनीति को दो हिस्सों में बांटता रहा, एक तरफ विकास की भाषा, दूसरी तरफ अस्मिता की चिंता.
2019 के बाद झारखंड की राजनीति ने एक नया मोड़ लिया. गठबंधन सरकार के साथ ‘अबुआ राज’ और सामाजिक न्याय की राजनीति को नई शब्दावली मिली. आदिवासी पहचान, स्थानीयता और कल्याणकारी योजनाओं को सत्ता के विमर्श के केंद्र में लाने की कोशिश हुई. यह वह दौर था जब राजनीति ने फिर से यह दावा किया कि झारखंड का शासन मॉडल उसकी सामाजिक संरचना के अनुरूप होगा. गणतंत्र की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण था, क्योंकि इसमें हाशिये पर खड़े वर्गों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करने की बात की गई.
हालांकि, राजनीति सिर्फ नीतियों से नहीं चलती, बल्कि नैतिकता और संस्थागत संतुलन से भी चलती है. झारखंड की राजनीति इस मोर्चे पर भी लगातार परीक्षा में रही है. राज्य में कई मुख्यमंत्री कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए. भ्रष्टाचार के आरोप, जांच एजेंसियों की कार्रवाई, राजभवन और निर्वाचित सरकार के बीच टकराव इन सबने लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच संतुलन के सवाल को बार-बार उठाया. झारखंड में 25 वर्षो में अब तक मुख्यमंत्री पद पर कुल 12 बार शपथ ली गई है.
01. बाबूलाल मरांडी (कार्यकाल: 15 नवंबर 2000 से 17 मार्च 2003). झारखंड के पहले मुख्यमंत्री, राज्य गठन के समय.
02. अर्जुन मुंडा (पहली बार)- कार्यकाल: 18 मार्च 2003 से 2 मार्च 2005
03. शिबू सोरेन (पहली बार) - कार्यकाल: 2 मार्च 2005 से 12 मार्च 2005.
04. अर्जुन मुंडा (दूसरी बार) - कार्यकाल: 12 मार्च 2005 से 18 सितंबर 2006
05. मधु कोड़ा - कार्यकाल: 18 सितंबर 2006 से 28 अगस्त 2008
06. शिबू सोरेन (दूसरी बार)- कार्यकाल: 28 अगस्त 2008 से 8 जनवरी 2009
07. अर्जुन मुंडा (तीसरी बार)- कार्यकाल: 8 जनवरी 2009 से 13 जुलाई 2013
08. हेमंत सोरेन (पहली बार)- कार्यकाल: 13 जुलाई 2013 से 28 दिसंबर 2014
09. रघुवर दास- कार्यकाल: 28 दिसंबर 2014 से 29 दिसंबर 2019- झारखंड के एकमात्र मुख्यमंत्री जिन्होंने पूरा पांच साल का कार्यकाल पूरा किया.
10. हेमंत सोरेन (दूसरी बार)- कार्यकाल: 29 दिसंबर 2019 से 31 जनवरी 2024
11. चंपई सोरेन- कार्यकाल: 2 फरवरी 2024 से 3 जुलाई 2024
12. हेमंत सोरेन (तीसरी बार)- कार्यकाल: 4 जुलाई 2024 से वर्तमान, जनवरी 2026 तक.
26 जनवरी 2026 तक आते-आते झारखंड की राजनीति एक चौराहे पर खड़ी दिखती है. एक तरफ 25 वर्षों का अनुभव है, दूसरी तरफ अधूरी आकांक्षाएं. शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार जैसे बुनियादी मुद्दे आज भी राजनीति के केंद्र में हैं, लेकिन समाधान की गति अपेक्षा से धीमी है. आदिवासी बहुल राज्य होने के बावजूद आदिवासी नेतृत्व और नीति-निर्माण के बीच दूरी का सवाल अब भी प्रासंगिक है. शहरीकरण और औद्योगीकरण की प्रक्रिया ने नए अवसर तो दिए हैं, लेकिन सामाजिक असमानता की खाई भी चौड़ी की है.
गणतंत्र दिवस के अवसर पर झारखंड की राजनीति का मूल्यांकन करते हुए यह स्वीकार करना होगा कि लोकतंत्र यहां जीवित है, बहस है, विरोध है, चुनाव हैं. सत्ता बदलती है, सरकारें गिरती-बनती हैं यह सब लोकतंत्र की सक्रियता का प्रमाण है. लेकिन साथ ही यह भी सच है कि गणतंत्र की आत्मा केवल चुनावों तक सीमित नहीं हो सकती. वह नीति, नियत और नीयत में भी झलकनी चाहिए.
झारखंड के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि राजनीति सत्ता केंद्रित होने के बजाय समाज केंद्रित बने. खनिज संपदा से मिलने वाला लाभ स्थानीय लोगों तक पहुंचे, विकास विस्थापन का पर्याय न बने.


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